भारत की प्रमुख एयरलाइन एयर इंडिया एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, और इसी बीच एक अहम खबर सामने आई है। कंपनी के पहले पोस्ट-प्राइवेटाइजेशन सीईओ कैंपबेल विल्सन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, वे तुरंत कंपनी नहीं छोड़ेंगे, बल्कि तब तक अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे जब तक नया सीईओ नियुक्त नहीं हो जाता। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब एयर इंडिया अपने सबसे बड़े परिवर्तन कार्यक्रम के बीच है और कई चुनौतियों का सामना कर रही है।
पहले से तय था इस्तीफा
एयर इंडिया की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, विल्सन ने 2024 में ही अपने इस्तीफे की इच्छा जताई थी। इसके बाद से वे कंपनी को एक स्थिर स्थिति में लाने और नेतृत्व परिवर्तन को आसान बनाने पर काम कर रहे थे। कंपनी के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के साथ इस पर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि वे 2026 में पद छोड़ेंगे।
यह साफ है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया, बल्कि एक योजनाबद्ध बदलाव का हिस्सा है ताकि कंपनी की रणनीति और कामकाज पर कोई नकारात्मक असर न पड़े।
चुनौतीपूर्ण दौर में संभाली जिम्मेदारी
कैंपबेल विल्सन ने 2022 में एयर इंडिया की कमान संभाली थी, जब टाटा समूह ने इसे सरकार से अपने हाथों में लिया था। उस समय एयरलाइन की छवि एक कमजोर और पुराने ढांचे वाली सरकारी कंपनी की थी। ऐसे में विल्सन के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी – एयर इंडिया को एक आधुनिक और प्रतिस्पर्धी एयरलाइन में बदलना।
उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और एक बड़े परिवर्तन कार्यक्रम की शुरुआत की। इसमें कंपनी की ब्रांडिंग बदलने से लेकर नई तकनीक अपनाने और सेवा स्तर सुधारने तक कई कदम शामिल थे।

बड़े फैसले और रिकॉर्ड ऑर्डर
विल्सन के कार्यकाल में एयर इंडिया ने कई बड़े फैसले लिए। सबसे खास बात यह रही कि कंपनी ने विमानों की खरीद के लिए रिकॉर्ड स्तर के ऑर्डर दिए। इससे आने वाले वर्षों में एयर इंडिया के पास आधुनिक विमानों का बड़ा बेड़ा होगा।
इसके अलावा, कंपनी ने अपने ग्रुप स्ट्रक्चर में भी बदलाव किया। पहले जहां चार अलग-अलग एयरलाइंस थीं, उन्हें मिलाकर दो मुख्य ब्रांड – एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस – में समेटा गया। इससे संचालन में बेहतर तालमेल और लागत में कमी लाने की कोशिश की गई।
कई मुश्किलों से गुजरना पड़ा
हालांकि, यह सफर आसान नहीं रहा। विल्सन के कार्यकाल में एयर इंडिया को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इनमें कोरोना महामारी के बाद की सप्लाई चेन समस्याएं, विमानों की डिलीवरी में देरी और वैश्विक स्तर पर बढ़ती लागत शामिल हैं।
इसके अलावा, एक बड़ा झटका तब लगा जब एयर इंडिया की फ्लाइट AI 171 का हादसा हुआ, जिसमें 260 लोगों की जान चली गई। इस घटना ने न केवल कंपनी की छवि को नुकसान पहुंचाया, बल्कि सुरक्षा को लेकर सवाल भी खड़े किए। इसके बाद कंपनी को नियामक एजेंसियों की सख्त जांच का सामना करना पड़ा।
आर्थिक दबाव भी बना रहा
एयर इंडिया अभी भी आर्थिक रूप से पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में एयर इंडिया और उसकी लो-कॉस्ट यूनिट एयर इंडिया एक्सप्रेस को मिलाकर 9,800 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।
यह नुकसान उस समय का है जब कंपनी पहले से ही कई बदलावों पर खर्च कर रही थी। इसके अलावा, पाकिस्तान द्वारा एयरस्पेस बंद किए जाने और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी असर पड़ा।
सुधार के संकेत भी दिखे
हालांकि चुनौतियों के बीच कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले। एयर इंडिया के अधिकतर नैरो-बॉडी विमान अब नए या अपग्रेडेड हो चुके हैं। इन विमानों में यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं।
नई ब्रांडिंग और सेवा सुधार के कारण कंपनी की छवि में भी धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। कुछ नए वाइड-बॉडी विमान भी सेवा में शामिल किए गए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं देते हैं।
“टेस्ट मैच” जैसा बदलाव
कैंपबेल विल्सन अक्सर कहते थे कि एयर इंडिया का परिवर्तन एक “टेस्ट मैच” की तरह है, न कि “टी20” जैसा तेज खेल। उनका मतलब था कि यह बदलाव धीरे-धीरे लेकिन मजबूत तरीके से होगा।
उन्होंने यह भी कहा था कि 2027 तक एक नई और बदली हुई एयर इंडिया साफ तौर पर दिखाई देगी। हालांकि अब यह बदलाव उनकी अगुवाई में पूरा नहीं हो पाएगा।
नए सीईओ की तलाश
एयर इंडिया के बोर्ड ने नए सीईओ की तलाश के लिए एक समिति बनाई है। उम्मीद है कि आने वाले महीनों में नया नेतृत्व सामने आएगा।
दिलचस्प बात यह है कि भारत की दूसरी बड़ी एयरलाइन इंडिगो में भी हाल ही में सीईओ बदलने की खबर आई थी। ऐसे में देश की दो सबसे बड़ी एयरलाइंस जल्द ही नए नेतृत्व के साथ आगे बढ़ेंगी।
साझेदारियों पर जोर
विल्सन के कार्यकाल में एयर इंडिया ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने रिश्ते मजबूत किए। खासतौर पर सिंगापुर एयरलाइंस के साथ सहयोग बढ़ाया गया।
इसके अलावा, लुफ्थांसा जैसी अन्य वैश्विक एयरलाइंस के साथ भी साझेदारी को मजबूत किया गया, जिससे नेटवर्क और सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद मिली।
आगे की राह कैसी होगी?
एयर इंडिया का परिवर्तन कार्यक्रम अभी पूरा नहीं हुआ है। आने वाले वर्षों में नए विमानों की डिलीवरी, सेवा सुधार और लागत नियंत्रण जैसे कई अहम काम बाकी हैं।
साथ ही, वैश्विक हालात भी कंपनी के लिए चुनौती बने हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और एयरस्पेस प्रतिबंध जैसी समस्याएं भविष्य में भी असर डाल सकती हैं।

