Airport Operators Own Airlines: क्या अब Adani जैसी कंपनियां उड़ाएंगी अपनी एयरलाइन? सरकार के बड़े प्लान से बदल सकता है एविएशन सेक्टर

Airport Operators Own Airlines

भारत का एविएशन सेक्टर जल्द ही एक बड़े बदलाव का गवाह बन सकता है। Airport Operators Own Airlines को लेकर केंद्र सरकार नियमों में बदलाव पर विचार कर रही है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो देश के बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर जैसे अडानी ग्रुप (Adani Group) और GMR Airports अपनी एयरलाइंस भी शुरू कर सकेंगे। माना जा रहा है कि इस कदम का उद्देश्य भारतीय विमानन बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और यात्रियों के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराना है।

सरकार क्या बदलाव करने जा रही है?

वर्तमान नियमों के अनुसार दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट का संचालन करने वाली कंपनियां किसी भी एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकतीं। अब Civil Aviation Ministry इस नियम में बदलाव पर विचार कर रही है। यदि प्रस्ताव को कानून मंत्रालय और केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलती है, तो एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को एयरलाइन शुरू करने या उसमें बहुमत हिस्सेदारी रखने की अनुमति मिल सकती है। यह बदलाव भारत की India Aviation Policy और Aviation Reforms के तहत सबसे बड़े सुधारों में से एक माना जा रहा है।

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Airport Operators Own Airlines से किसे होगा सबसे बड़ा फायदा?

अगर यह नीति लागू होती है तो सबसे अधिक फायदा देश के दो सबसे बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को मिल सकता है।

 

Adani Group

अडानी ग्रुप की कंपनी Adani Airport Holdings वर्तमान में भारत के आठ एयरपोर्ट का संचालन करती है। इनमें प्रमुख हैंमुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु, नवी मुंबई (निर्माणाधीन)यदि नियमों में बदलाव होता है, तो अडानी ग्रुप पहली बार अपनी एयरलाइन शुरू करने या किसी एयरलाइन में बड़ी हिस्सेदारी लेने की स्थिति में आ सकता है। अडानी ग्रुप पहले से ही देश के सबसे बड़े निजी पोर्ट ऑपरेटर, प्रमुख ऊर्जा कंपनी और दूसरे सबसे बड़े सीमेंट उत्पादकों में शामिल है। एयरलाइन कारोबार में प्रवेश से समूह की मौजूदगी भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में और मजबूत हो सकती है।

 

GMR Airports

GMR Airports भी इस बदलाव से बड़ा लाभ उठा सकती है। कंपनी दिल्ली, हैदराबाद, गोवा समेत भारत के कई प्रमुख एयरपोर्ट का संचालन करती है। यदि नई नीति लागू होती है तो GMR भी भविष्य में अपनी एयरलाइन लॉन्च करने या किसी मौजूदा एयरलाइन में नियंत्रक हिस्सेदारी लेने पर विचार कर सकती है।

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सरकार यह फैसला क्यों लेना चाहती है?

सरकार का मानना है कि भारतीय Airline Industry India में प्रतिस्पर्धा काफी सीमित हो गई है। वर्तमान में घरेलू बाजार का लगभग 90% हिस्सा IndiGo और Air India के पास है। बीते कुछ वर्षों में

  • Jet Airways बंद हो गई। 
  • Go First का परिचालन बंद हो गया। 
  • Vistara का Air India में विलय हो गया। 
  • AirAsia India भी Tata Group का हिस्सा बन गई। 

अब केवल IndiGo, Air India, Akasa Air, SpiceJet और कुछ क्षेत्रीय एयरलाइंस ही बाजार में सक्रिय हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि नए खिलाड़ी बाजार में आएं ताकि यात्रियों को अधिक विकल्प मिल सकें।

 

क्या इससे IndiGo और Air India की बादशाहत टूटेगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एयरपोर्ट ऑपरेटर्स एयरलाइन शुरू करते हैं, तो इससे लंबे समय में भारतीय एविएशन सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। हालांकि, इसका असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि दुनिया भर में Airbus और Boeing के विमानों की भारी कमी बनी हुई है। दोनों कंपनियों के पास पहले से हजारों विमानों की लंबी वेटिंग है। ऐसे में नई एयरलाइन शुरू होने के बावजूद विमानों की डिलीवरी में कई साल लग सकते हैं।

 

क्या इस बदलाव से नए विवाद भी खड़े हो सकते हैं?

इस प्रस्ताव के साथ कुछ चिंताएं भी सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई कंपनी एयरपोर्ट भी चलाएगी और उसकी अपनी एयरलाइन भी होगी, तो वह

  • अपनी एयरलाइन को बेहतर स्लॉट दे सकती है। 
  • पार्किंग और ग्राउंड हैंडलिंग में प्राथमिकता दे सकती है। 
  • अन्य एयरलाइंस के साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठ सकते हैं। 

यही कारण है कि यदि सरकार नियमों में बदलाव करती है तो DGCA, Civil Aviation Ministry और अन्य नियामक संस्थाओं को मजबूत निगरानी व्यवस्था भी बनानी होगी।

 

दुनिया के दूसरे देशों में क्या व्यवस्था है?

अमेरिका में अधिकांश बड़े एयरपोर्ट सार्वजनिक स्वामित्व में हैं। वहां एयरपोर्ट की आय का उपयोग एयरलाइन कारोबार में नहीं किया जा सकता। यूरोप में संयुक्त स्वामित्व (Joint Ownership) की अनुमति तो है, लेकिन कड़े प्रतिस्पर्धा कानून (Antitrust Rules) के कारण यह मॉडल व्यावहारिक रूप से बहुत कम देखने को मिलता है। इसलिए यदि भारत यह बदलाव करता है तो यह वैश्विक स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन माना जाएगा।

 

भारत के एविएशन सेक्टर के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव?

भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा विमानन बाजार बन चुका है। सरकार का लक्ष्य 2047 तक देश में एयरपोर्ट की संख्या लगभग 350 तक पहुंचाने का है। वहीं International Air Transport Association (IATA) के अनुसार 2044 तक भारत में हवाई यात्रियों की संख्या 2024 के मुकाबले लगभग तीन गुना हो सकती है। इतनी तेज़ वृद्धि को देखते हुए सरकार चाहती है कि एयरलाइन सेक्टर में भी अधिक निवेश और प्रतिस्पर्धा बढ़े।

 

निष्कर्ष

Airport Operators Own Airlines को लेकर प्रस्तावित बदलाव भारतीय विमानन क्षेत्र के लिए एक बड़ा नीतिगत कदम साबित हो सकता है। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो Adani Group, GMR Airports जैसे बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर्स एयरलाइन कारोबार में उतर सकते हैं। इससे लंबे समय में प्रतिस्पर्धा बढ़ने, यात्रियों को अधिक विकल्प मिलने और भारतीय एविएशन सेक्टर को

नई गति मिलने की उम्मीद है। हालांकि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए मजबूत नियामकीय निगरानी भी उतनी ही जरूरी होगी।

सरकार का उद्देश्य भारतीय विमानन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, नए निवेश को आकर्षित करना और यात्रियों के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराना है।

फिलहाल दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट का संचालन करने वाली कंपनियां किसी भी एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकतीं।

इससे नई एयरलाइंस बाजार में आ सकती हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और लंबे समय में यात्रियों को बेहतर सेवाएं मिलने की संभावना है।

यदि प्रस्ताव लागू होता है तो Adani Group और GMR Airports जैसी कंपनियां अपनी एयरलाइन शुरू करने या किसी एयरलाइन में नियंत्रक हिस्सेदारी लेने की पात्र हो सकती हैं।

यदि नई एयरलाइंस बाजार में आती हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो लंबे समय में किराए पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि इसका प्रभाव विमान उपलब्धता, ईंधन लागत और बाजार की स्थिति जैसे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगा।