मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और वैश्विक तेल आपूर्ति में आई भारी बाधा के बीच अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल को लेकर अपने रुख में अस्थायी नरमी दिखाई है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने 30 दिनों की एक विशेष छूट (waiver) की घोषणा की है, जिसके तहत दुनिया के कुछ देश समुद्र में फंसे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को खरीद सकेंगे।

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार यह अनुमति केवल उन तेल कार्गो के लिए दी गई है जो 12 मार्च तक जहाजों में पहले से लोड हो चुके थे। यह अस्थायी लाइसेंस 11 अप्रैल की मध्यरात्रि (वॉशिंगटन समय) तक मान्य रहेगा।
इस फैसले का मुख्य उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करना है, क्योंकि युद्ध के कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं।

समुद्र में फंसे रूसी तेल को मिलेगी राहत
जानकारों के मुताबिक इस फैसले से लगभग 124 से 125 मिलियन बैरल रूसी मूल का कच्चा तेल बाजार तक पहुंच सकता है। यह तेल फिलहाल दुनिया भर में लगभग 30 अलग-अलग स्थानों पर समुद्र में जहाजों पर रुका हुआ है।
अगर इस तेल को रिफाइनरियों तक पहुंचने की अनुमति मिलती है तो वैश्विक बाजार में तुरंत आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे तेल की कीमतों पर दबाव कम पड़ने की उम्मीद है।
भारत को पहले ही दी जा चुकी थी छूट
ट्रंप प्रशासन ने इससे पहले 5 मार्च को एक अलग 30-दिन की छूट जारी की थी। उस फैसले के तहत भारत को भी समुद्र में फंसे रूसी तेल कार्गो खरीदने की अनुमति दी गई थी।
इससे भारतीय आयातकों को सीमित समय के लिए अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने का अवसर मिला। मौजूदा ऊर्जा संकट के बीच यह कदम भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए काफी अहम माना गया।
रूस पर प्रतिबंध की शुरुआत कब हुई?
रूसी तेल को लेकर पश्चिमी देशों की कड़ी नीति की शुरुआत 24 फरवरी 2022 के बाद हुई थी, जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया।
इस युद्ध के जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। रूस की आय का बड़ा हिस्सा तेल और गैस निर्यात से आता है, इसलिए इन क्षेत्रों को निशाना बनाया गया।
मार्च 2022 में अमेरिका ने अपने यहां रूसी कच्चे तेल, गैस और कोयले के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। वॉशिंगटन का कहना था कि इसका उद्देश्य रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक रूप से कमजोर करना है।
60 डॉलर का प्राइस कैप क्यों लगाया गया?
दिसंबर 2022 में अमेरिका, यूरोपीय संघ और G7 देशों ने मिलकर रूसी कच्चे तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल का प्राइस कैप लागू किया।
इस व्यवस्था का मकसद यह था कि दुनिया में तेल की आपूर्ति बनी रहे, लेकिन रूस को उससे बहुत ज्यादा मुनाफा न हो।
इन प्रतिबंधों के बाद रूस ने अपने तेल को भारी छूट के साथ एशियाई देशों को बेचना शुरू कर दिया। भारत और चीन इस दौरान रूसी तेल के बड़े खरीदार बनकर उभरे।
भारत को सस्ते तेल का फायदा
पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को नए खरीदारों की जरूरत थी। ऐसे में उसने भारत और चीन को कम कीमत पर तेल की पेशकश की।
भारत ने भी इस अवसर का फायदा उठाते हुए रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ा दिया। इससे भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता कच्चा माल मिला और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई।
हालांकि अमेरिका ने कई बार भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश भी की। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, ताकि रूसी तेल आयात पर दबाव बनाया जा सके।
मिडिल ईस्ट की जंग ने बदल दिया समीकरण
मौजूदा समय में मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को पूरी तरह हिला दिया है।
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच संघर्ष तेज होने के बाद Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है।
आम तौर पर दुनिया के कुल तेल उपभोग का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन युद्ध के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है।
जहाजों पर हमले और बढ़ता खतरा
रिपोर्टों के अनुसार इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले कम से कम 16 जहाजों पर हमले हो चुके हैं।
ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध जारी रहा तो ऐसे हमले आगे भी हो सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार पर बड़ा असर पड़ा है और कई शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग से गुजरने से परहेज करना शुरू कर दिया है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल
मध्य-पूर्व में संघर्ष शुरू होने से पहले यानी 28 फरवरी से पहले कच्चे तेल की कीमत लगभग 73 से 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी।
लेकिन युद्ध और आपूर्ति बाधित होने के कारण यह कीमत तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।
तेल की कीमतों में यह उछाल वैश्विक महंगाई और आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है, इसलिए कई देश बाजार को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिका ने रणनीतिक तेल भंडार भी खोला
ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अमेरिका ने एक और बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने घोषणा की है कि वह Strategic Petroleum Reserve (SPR) से लगभग 172 मिलियन बैरल कच्चा तेल बाजार में जारी करेगा।
यह कदम ईंधन की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है।
इसके अलावा International Energy Agency (IEA) के 32 सदस्य देशों ने भी मिलकर लगभग 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने का वादा किया है।
अमेरिका ने इस कदम को क्यों बताया अस्थायी?
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के अनुसार यह छूट बहुत सीमित और अस्थायी है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य केवल तत्काल आपूर्ति संकट को कम करना है, न कि रूस को आर्थिक फायदा पहुंचाना।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फैसला तब तक लागू रहेगा जब तक कि मध्य-पूर्व में तेल आपूर्ति सामान्य नहीं हो जाती।
ईरान के नए सुप्रीम लीडर का सख्त रुख
ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने भी अपने पहले बयान में साफ कहा है कि Strait of Hormuz को बंद रखा जाएगा।
इस बयान से यह संकेत मिलता है कि निकट भविष्य में इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के खुलने की संभावना कम है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
राष्ट्रीय हित बनाम प्रतिबंध की राजनीति
अमेरिका का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक बड़ी सच्चाई को भी सामने लाता है। अक्सर देशों की नीतियां सख्त सिद्धांतों के बजाय व्यावहारिक जरूरतों से तय होती हैं।
रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद जब वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने लगा, तो वॉशिंगटन को अपने रुख में अस्थायी बदलाव करना पड़ा।
इससे यह भी साफ हो गया कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता कई बार राजनीतिक प्रतिबंधों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
आगे क्या असर हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और Strait of Hormuz बंद ही रहता है, तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
ऐसी स्थिति में रूस जैसे तेल उत्पादक देशों को अपने निर्यात बढ़ाने का मौका मिल सकता है, जबकि भारत जैसे आयातक देश सस्ते तेल का फायदा उठा सकते हैं।

