ईरान में गिराए गए अमेरिकी लड़ाकू विमान के एक क्रू मेंबर को बचाने की कहानी अब सामने आ रही है, और इसमें कई ऐसे मोड़ हैं जो इसे बेहद रोमांचक बना देते हैं। Donald Trump ने इस पूरे ऑपरेशन को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है, जिसमें बताया गया कि कैसे एक छोटा सा रेडियो मैसेज भी अमेरिकी एजेंसियों के लिए शक की वजह बन गया था।
एक मैसेज ने क्यों बढ़ाई चिंता?
यह घटना तब शुरू हुई जब F-15E Strike Eagle विमान ईरान के दक्षिण-पश्चिम इलाके में गिर गया। विमान में मौजूद दोनों क्रू मेंबर इजेक्ट हो गए, लेकिन वे अलग-अलग जगहों पर उतर गए।
पायलट को तो जल्दी बचा लिया गया, लेकिन दूसरे अधिकारी – जो वेपन्स सिस्टम्स ऑफिसर थे – कई घंटों तक लापता रहे। इसी दौरान उन्होंने एक छोटा सा रेडियो संदेश भेजा – “God is good” (भगवान अच्छा है)।
यह सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों को शक हुआ। शुरुआत में यह मैसेज “Power be to God” जैसा सुनाई दिया, जिससे एजेंसियों को लगा कि कहीं यह ईरान की तरफ से भेजा गया कोई जाल तो नहीं है। डर था कि कहीं दुश्मन इस तरह के संदेश से अमेरिकी सेना को फंसाने की कोशिश न कर रहा हो।

क्यों लगा कि यह जाल हो सकता है?
CIA और अन्य एजेंसियों को यह चिंता इसलिए भी हुई क्योंकि युद्ध के दौरान दुश्मन अक्सर गलत जानकारी फैलाकर जाल बिछाते हैं। अगर यह मैसेज फर्जी होता, तो बचाव के लिए जाने वाली टीम सीधे खतरे में आ सकती थी।
हालांकि बाद में उस अधिकारी को जानने वालों ने बताया कि वह बहुत धार्मिक स्वभाव का है, इसलिए ऐसा संदेश देना उसके लिए सामान्य बात थी। इसके बाद अधिकारियों को यकीन हुआ कि मैसेज असली है।
24 घंटे तक कैसे जिंदा रहा पायलट?
विमान गिरने के बाद वह अधिकारी घायल था और पूरी तरह अकेला था। वह पहाड़ों के बीच एक दरार (crevice) में छिपा रहा। आसपास हजारों ईरानी सैनिक और स्थानीय लोग उसकी तलाश कर रहे थे।
बताया गया कि ईरान की तरफ से उसे पकड़ने के लिए इनाम भी घोषित किया गया था। ऐसे में उसने बहुत सावधानी से अपनी लोकेशन छुपाकर रखी।
वह लगातार जगह बदलता रहा, ताकि कोई उसे पकड़ न सके। एक समय तो वह 7000 फीट ऊंची पहाड़ी पर चढ़ गया, ताकि पीछा कर रहे लोगों से बच सके।
कैसे हुआ संपर्क?
उसके पास एक सुरक्षित कम्युनिकेशन डिवाइस था, जिससे वह अमेरिकी सेना से संपर्क में रहा। उसने लोकेशन बताने वाले बीकन का इस्तेमाल बहुत कम किया, ताकि उसकी स्थिति दुश्मन को पता न चले।
इसी दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने अपनी खास तकनीक से उसकी लोकेशन ट्रैक की।
CIA की चालाकी – दुश्मन को कैसे भटकाया?
इस ऑपरेशन में CIA ने एक अहम भूमिका निभाई। एजेंसी ने ईरान के अंदर गलत जानकारी फैलानी शुरू कर दी।
उन्होंने यह अफवाह फैलाई कि पायलट को पहले ही ढूंढ लिया गया है और उसे जमीन के रास्ते निकाला जा रहा है। इसका मकसद था ईरानी सैनिकों को असली जगह से दूर रखना।
इस चाल से अमेरिकी सेना को समय मिला और बचाव की योजना को सही तरीके से लागू किया जा सका।
रात के अंधेरे में बड़ा ऑपरेशन
जब पायलट की सही लोकेशन मिल गई, तो अमेरिकी सेना ने एक बड़ा ऑपरेशन शुरू किया। इसमें करीब 200 स्पेशल फोर्सेज के जवान शामिल थे।
यह मिशन रात के समय किया गया, ताकि दुश्मन को भनक न लगे। इससे पहले अमेरिकी सेना ने उस इलाके में एक अस्थायी बेस भी बना लिया था।
बताया गया कि इस ऑपरेशन में अमेरिकी विमान ने ईरानी काफिलों पर हमले भी किए, ताकि वे बचाव क्षेत्र तक न पहुंच सकें।
इजरायल की भूमिका भी सामने आई
Israel ने भी इस मिशन में सीमित मदद दी। हालांकि उसने पायलट की लोकेशन ढूंढने में सीधा सहयोग नहीं किया, लेकिन उसने ईरानी सैनिकों की गतिविधियों की जानकारी दी।
इसके अलावा, इजरायली वायुसेना ने एक हमला भी किया, जिससे ईरानी सैनिकों की गति धीमी हो गई।
आखिरकार कैसे बचा पायलट?
इस पूरे ऑपरेशन के बाद अमेरिकी सेना उस अधिकारी तक पहुंची और उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। वह घायल था, लेकिन उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
सबसे बड़ी बात यह रही कि इस मिशन में कोई अमेरिकी सैनिक घायल या मारा नहीं गया।
Donald Trump ने इस ऑपरेशन को बेहद खास बताया और कहा कि यह पहली बार है जब दुश्मन के इलाके में फंसे दो अमेरिकी पायलटों को अलग-अलग जगहों से सफलतापूर्वक बचाया गया।
ईरान ने क्या कहा?
जहां अमेरिका इस मिशन को सफल बता रहा है, वहीं Iran ने इस दावे को खारिज कर दिया है।
ईरान के सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम जोलफाघरी ने कहा कि अमेरिकी ऑपरेशन पूरी तरह नाकाम रहा और इसे सिर्फ एक “धोखे की कोशिश” बताया।
निष्कर्ष:
यह घटना दिखाती है कि युद्ध के समय हर छोटी चीज कितनी बड़ी बन सकती है। एक छोटा सा मैसेज भी पूरे ऑपरेशन को रोक सकता था या उसे खतरे में डाल सकता था। लेकिन सही समय पर लिए गए फैसलों और रणनीति ने एक जान बचा ली।

