अनिल अग्रवाल का बड़ा आरोप: सबसे ऊंची बोली के बाद भी छिनी डील, कॉरपोरेट सिस्टम पर उठे बड़े सवाल

देश के कॉरपोरेट जगत में इन दिनों एक बड़ा विवाद चर्चा में है, जिसमें Anil Agarwal की कंपनी Vedanta Resources Limited और Jaiprakash Associates Ltd (JAL) का नाम सामने आ रहा है।वेदांता के चेयरमैन ने दावा किया है कि उनकी कंपनी को दिवालिया प्रक्रिया के तहत JAL के लिए सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया था, लेकिन बाद में इस फैसले को बदल दिया गया। इस पूरे मामले ने कॉरपोरेट गवर्नेंस और दिवालिया प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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क्या है पूरा मामला?
Jaiprakash Associates Ltd एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट कंपनी है, जो भारी कर्ज में डूबने के बाद जून 2024 में दिवालिया प्रक्रिया में गई थी। कंपनी पर करीब 57,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज था।
दिवालिया प्रक्रिया Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के तहत शुरू हुई, जहां कर्जदाताओं की समिति (CoC) ने कंपनी को बेचने के लिए बोली प्रक्रिया चलाई।
इस प्रक्रिया में कई बड़ी कंपनियों ने हिस्सा लिया, जिनमें वेदांता, Adani Enterprises Limited, Dalmia Cement (Bharat), Jindal Power Limited और PNC Infratech शामिल थीं।


वेदांता का दावा: “हमें विजेता बताया गया था”
Anil Agarwal ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पूरी बोली प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से हुई थी और अंत में उनकी कंपनी को सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया।

उनके अनुसार, अन्य कंपनियों के बाहर होने के बाद वेदांता सबसे आगे रही और उन्हें लिखित रूप में यह जानकारी दी गई कि उन्होंने बोली जीत ली है।

लेकिन कुछ दिनों बाद यह फैसला बदल दिया गया। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन कहा कि वह इस मुद्दे को सही मंच पर उठाएंगे।

 

अदानी समूह को मिली मंजूरी

इस पूरे मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब National Company Law Tribunal (NCLT) ने 17 मार्च को Adani Enterprises Limited की 14,535 करोड़ रुपये की बोली को मंजूरी दे दी।

इसके बाद वेदांता ने इस फैसले को चुनौती देते हुए National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) का दरवाजा खटखटाया।

हालांकि 24 मार्च को हुई सुनवाई में NCLAT ने NCLT के फैसले पर कोई रोक नहीं लगाई, लेकिन कर्जदाताओं की समिति से जवाब मांगा और अगली सुनवाई 10 अप्रैल तय की।

 

ज्यादा बोली के बावजूद क्यों हारी वेदांता?

रिपोर्ट्स के अनुसार, वेदांता की बोली लगभग 16,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक की थी, जो अदानी की बोली से ज्यादा थी।

फिर भी कर्जदाताओं ने Adani Enterprises Limited के प्रस्ताव को चुना। इसकी मुख्य वजह बताई गई –

  • ज्यादा अग्रिम नकद भुगतान (करीब 6,000 करोड़ रुपये)
  • कम समय में भुगतान पूरा करने का वादा (करीब 2 साल)

वहीं वेदांता की योजना में भुगतान का समय ज्यादा लंबा (करीब 5 साल) था।

CoC का कहना है कि बोली का चयन सिर्फ रकम के आधार पर नहीं होता, बल्कि उसकी व्यवहार्यता, समय और जोखिम जैसे कई पहलुओं को देखा जाता है।

 

वेदांता का कानूनी रुख

वेदांता ने NCLAT में दो अलग-अलग अपील दाखिल की हैं –

  1. रिजॉल्यूशन प्लान की वैधता को चुनौती
  2. CoC और NCLT के फैसले को चुनौती

वेदांता के वकीलों का कहना है कि कंपनी को सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया था, इसलिए फैसले में बदलाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

कर्जदाताओं का बचाव

कर्जदाताओं की समिति ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि पूरी प्रक्रिया IBC के नियमों के तहत हुई है।

उन्होंने साफ किया कि किसी भी बोली लगाने वाले को सिर्फ ऊंची कीमत देने के आधार पर जीत का अधिकार नहीं होता।

CoC के अनुसार, सभी कंपनियों को बराबर मौका दिया गया था और अंतिम फैसला कई फैक्टर को ध्यान में रखकर लिया गया।

 

जयप्रकाश समूह की संपत्तियां कितनी अहम?

Jaiprakash Associates Ltd के पास कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट और संपत्तियां हैं, जिनमें शामिल हैं –

  • ग्रेटर नोएडा और नोएडा में बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट
  • जेवर एयरपोर्ट के पास इंटरनेशनल स्पोर्ट्स सिटी
  • दिल्ली-एनसीआर में कमर्शियल स्पेस
  • होटल और हॉस्पिटैलिटी बिजनेस
  • सीमेंट प्लांट और लाइमस्टोन खदानें

इसके अलावा कंपनी की कई सहायक कंपनियों में हिस्सेदारी भी है, जिससे इसकी वैल्यू और बढ़ जाती है।

 

पुराने रिश्ते का जिक्र

Anil Agarwal ने इस मामले को Jaiprakash Gaur के साथ अपने पुराने अनुभव से भी जोड़ा।

उन्होंने बताया कि वर्षों पहले गौर ने उनसे अपने बिजनेस के भविष्य को लेकर बात की थी और इच्छा जताई थी कि कंपनी सही हाथों में जाए।

हालांकि उस समय वेदांता ने आगे नहीं बढ़ा, लेकिन दिवालिया प्रक्रिया में आने के बाद उन्होंने फिर से दिलचस्पी दिखाई।

 

‘धर्म’ और गीता का जिक्र

अग्रवाल ने अपने बयान में Bhagavad Gita का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वे इस मामले को बिना किसी लालच के आगे बढ़ाएंगे।

उनका कहना था कि अगर कोई चीज “धर्म” के अनुसार तय होती है, तो उसे बदला नहीं जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह संपत्ति उन्हें मिलती है तो यह ईश्वर की कृपा होगी, और अगर नहीं मिलती तो वह भी स्वीकार है।

 

आगे क्या होगा?

अब इस पूरे मामले की नजरें National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) पर टिकी हैं, जहां अगली सुनवाई में अहम फैसला आ सकता है।

यह मामला सिर्फ एक कंपनी के अधिग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की दिवालिया प्रक्रिया की पारदर्शिता और भरोसे से भी जुड़ा हुआ है।

अगर वेदांता के दावे सही साबित होते हैं, तो इससे भविष्य में होने वाली ऐसी प्रक्रियाओं पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर CoC का फैसला सही माना जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि केवल ऊंची बोली ही जीत की गारंटी नहीं है।

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