Apple ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी: CCI के नए जुर्माना नियम को बताया असंवैधानिक

iPhone निर्माता कंपनी Apple ने दिल्ली हाईकोर्ट में भारत के प्रतिस्पर्धा कानून में हाल में किए गए बदलावों को चुनौती दी है। ये बदलाव भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) को किसी कंपनी के वैश्विक टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाने की शक्ति देते हैं। यह इस नए नियम के खिलाफ पहली कानूनी चुनौती है, जिसमें पहले केवल भारत में कमाए गए टर्नओवर पर ही जुर्माना लगाया जा सकता था।


Apple का तर्क है कि संशोधित कानून उस पर 38 बिलियन डॉलर (लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपए) तक का जुर्माना लगा सकता है और यह कानून “स्पष्ट रूप से मनमाना, असंवैधानिक, पूरी तरह से अनुपातहीन और अन्यायपूर्ण” है।

Apple challenged in Delhi High Court

क्या है विवाद का मुद्दा

संशोधित प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत, CCI अब किसी कंपनी द्वारा “सभी उत्पादों और सेवाओं से प्राप्त वैश्विक टर्नओवर” के 10% तक का जुर्माना पूर्वव्यापी रूप से लगा सकता है। पहले, दंड केवल भारत में जांच के दायरे में आने वाले उत्पाद या सेवा से जुड़े “प्रासंगिक टर्नओवर” तक सीमित था।

 

Apple का कहना है कि नया ढांचा उसे भारी जुर्माने के खतरे में डाल सकता है और कंपनी ने जोर देकर कहा है कि पूर्वव्यापी दंड से बचने के लिए उसे अभी इस संवैधानिक चुनौती को दायर करना आवश्यक है।

 

Apple का उदाहरण: खिलौनों और स्टेशनरी की कहानी

Apple ने अपने तर्क को स्पष्ट करने के लिए एक सरल उदाहरण दिया है। कंपनी का कहना है कि जुर्माना केवल व्यवसाय के उस हिस्से पर लागू होना चाहिए जो कानून का उल्लंघन करता है, न कि पूरे वैश्विक संचालन पर।

 

टिम कुक के नेतृत्व वाली कंपनी ने एक काल्पनिक उदाहरण प्रस्तुत किया: मान लीजिए कोई कंपनी खिलौने और स्टेशनरी दोनों बेचती है, लेकिन केवल खिलौने ही कानून का उल्लंघन करते हैं। ऐसी स्थिति में, दंड केवल खिलौनों की बिक्री से प्राप्त राजस्व पर लागू होना चाहिए।

 

कंपनी ने कहा कि यदि खिलौना व्यवसाय से 100 रुपए की कमाई हुई है, तो स्टेशनरी व्यवसाय के 20,000 रुपए के टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाना अनुचित होगा, जबकि उल्लंघन केवल खिलौना खंड से संबंधित है।

 

CCI के गोपनीयता आदेश को भी दी चुनौती

Apple ने CCI के 3 मार्च 2025 के कॉन्फिडेंशियलिटी रिंग ऑर्डर को भी आंशिक रूप से “रद्द” करने की मांग की है। इस आदेश में Apple Inc और Apple Distribution International से वित्त वर्ष 2022 से 2024 के लिए ऑडिट किए गए “इंटरलिंक्ड फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स” प्रदान करने को कहा गया है, जिसमें संशोधित दंड नियमों को पूर्वव्यापी रूप से लागू किया जाना है।

 

याचिका के अनुसार, नए दंड उपाय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत “आनुपातिकता के सिद्धांत” का उल्लंघन करते हैं। कंपनी ने कहा कि “कानून आगे की ओर देखता है, पीछे की ओर नहीं…” और पूर्वव्यापी आवेदन के लिए स्पष्ट विधायी इरादे की आवश्यकता होती है।

 

Apple की अन्य मांगें

Apple ने कोर्ट से पेनाल्टी गाइडलाइन्स 3(7) और 8(1) को मनमाना और प्रतिस्पर्धा अधिनियम की शक्तियों से परे घोषित करने की मांग की है। साथ ही, कंपनी चाहती है कि कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और CCI को धारा 27(b), पेनाल्टी गाइडलाइन्स और टर्नओवर रेगुलेशन्स को लागू करने से रोका जाए।

 

कंपनी का तर्क है कि ये नियम न केवल असंवैधानिक हैं, बल्कि व्यापारिक न्याय के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं।

व्यापक प्रभाव: विदेशी कंपनियों के लिए चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत में काम करने वाली विदेशी कंपनियों और पर्याप्त विदेशी राजस्व वाली भारतीय कंपनियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। इससे प्रतिस्पर्धा मामलों में मौद्रिक देनदारी में काफी वृद्धि हो सकती है।

 

यह बदलाव विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए चिंता का विषय है, जिनका वैश्विक टर्नओवर बहुत अधिक है, लेकिन भारत में उनकी बिक्री तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है। यदि उल्लंघन केवल भारतीय बाजार में एक विशिष्ट उत्पाद या सेवा से संबंधित है, तो पूरे वैश्विक टर्नओवर पर जुर्माना लगाने से कंपनियों पर असंगत वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

 

कानूनी लड़ाई की स्थिति

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ को बुधवार को इस मामले को लेना था, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। अब यह मामला 3 दिसंबर को सुनवाई के लिए निर्धारित है। वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी Apple का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

 

यह मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून के विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। Apple की चुनौती का परिणाम न केवल कंपनी के लिए, बल्कि भारत में काम करने वाले सभी बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए एक मिसाल कायम करेगा।

 

पूर्वव्यापी कानून का विवाद

Apple की याचिका का एक प्रमुख बिंदु पूर्वव्यापी आवेदन का मुद्दा है। कंपनी का तर्क है कि नए नियमों को पुराने वित्तीय वर्षों पर लागू करना कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

 

भारतीय कानूनी परंपरा में, पूर्वव्यापी कानून आम तौर पर संदेह की दृष्टि से देखे जाते हैं, खासकर जब वे दंडात्मक प्रकृति के हों। संविधान के अनुच्छेद 20 में पूर्व-कानून के सिद्धांत की रक्षा की गई है, जो कहता है कि किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जो कार्य के समय कानून के तहत अपराध नहीं था।

 

Apple का तर्क है कि जब उसने अपने व्यावसायिक निर्णय लिए थे, तब वैश्विक टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं था। इसलिए, इन नियमों को पूर्वव्यापी रूप से लागू करना न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

 

प्रतिस्पर्धा कानून में बदलाव का इतिहास

भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून में यह बदलाव कई वर्षों की चर्चा और बहस के बाद आया है। नियामक अधिकारी लंबे समय से तर्क दे रहे थे कि केवल भारतीय टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाने से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर प्रभावी दंड नहीं लगाया जा सकता।

 

उदाहरण के लिए, यदि किसी वैश्विक तकनीकी दिग्गज का भारत में टर्नओवर अपेक्षाकृत कम है, लेकिन उसका प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार बाजार को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, तो केवल भारतीय टर्नओवर पर आधारित जुर्माना एक प्रभावी निवारक नहीं हो सकता।

 

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि वैश्विक टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाना भी समस्याग्रस्त हो सकता है, खासकर जब उल्लंघन केवल एक विशिष्ट बाजार या उत्पाद से संबंधित हो।

 

अन्य देशों में वैश्विक टर्नओवर का उपयोग

यूरोपीय संघ जैसे कुछ अन्य क्षेत्राधिकारों में वैश्विक टर्नओवर के आधार पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है। यूरोपीय आयोग ने Google, Apple और अन्य तकनीकी दिग्गजों पर अरबों डॉलर के जुर्माने लगाए हैं, जो उनके वैश्विक टर्नओवर के प्रतिशत पर आधारित थे।

 

हालांकि, इन मामलों में भी विवाद होते हैं और कंपनियां अक्सर इन जुर्मानों को चुनौती देती हैं। Apple को उम्मीद हो सकती है कि भारतीय अदालतें भी इसी तरह की सावधानी बरतेंगी।

 

व्यापार और नियामक संतुलन

यह मामला भारत में व्यापार-अनुकूल माहौल बनाने और प्रतिस्पर्धा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के बीच संतुलन खोजने की चुनौती को उजागर करता है।

 

एक ओर, सरकार विदेशी निवेश को आकर्षित करना चाहती है और भारत को व्यापार करने के लिए एक आसान स्थान बनाना चाहती है। दूसरी ओर, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़ी कंपनियां अपनी बाजार शक्ति का दुरुपयोग न करें और छोटे खिलाड़ियों और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जाए।

 

Apple का मामला इस संतुलन का परीक्षण करेगा और यह निर्धारित करने में मदद करेगा कि भारत का प्रतिस्पर्धा कानून ढांचा अंतरराष्ट्रीय मानकों और घरेलू आवश्यकताओं के साथ कैसे मेल खाता है।

 

निष्कर्ष:

Apple बनाम CCI का यह मामला भारत में प्रतिस्पर्धा कानून के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि अदालत Apple के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो यह सरकार को नियमों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है।

 

दूसरी ओर, यदि अदालत नए नियमों को बरकरार रखती है, तो यह CCI को प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं से निपटने में अधिक शक्ति देगा, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में व्यापार करना अधिक जोखिम भरा बना सकता है।

 

अगले कुछ महीनों में इस मामले का विकास न केवल Apple के लिए, बल्कि भारत में काम करने वाली सभी वैश्विक कंपनियों के लिए बारीकी से देखा जाएगा। 3 दिसंबर की सुनवाई इस महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई का पहला महत्वपूर्ण कदम होगा।