महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया है। मुंबई, नवी मुंबई, पुणे, नागपुर, पिंपरी चिंचवड और नासिक सहित राज्य के अधिकांश प्रमुख नगर निगम अब भाजपा के नियंत्रण में हैं। यह जीत केवल स्थानीय चुनावों का परिणाम नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक धुरी में आए बदलाव का संकेत है।
एकतरफा जीत के आंकड़े
29 नगर निगमों में से 17 पर भाजपा ने अकेले जीत हासिल की है, जबकि महायुति गठबंधन को 8 अन्य निगमों में सफलता मिली है। कुल मिलाकर 25 नगर निगमों में महायुति के मेयर होंगे। कुल 2,869 सीटों में से भाजपा ने 1,420 सीटें जीती हैं, जो किसी भी एक पार्टी के लिए अभूतपूर्ण है।
शिंदे गुट की शिवसेना को 375 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 329 सीटों पर सिमट गई। उद्धव ठाकरे की शिवसेना को मात्र 175 सीटें मिलीं, जबकि अजित पवार की NCP 160 और शरद पवार की NCP (SP) को केवल 40 सीटें मिलीं। AIMIM ने 125 सीटें जीतकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
6 साल की रणनीति का परिणाम
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, यह जीत रातोंरात नहीं मिली है। इसकी तैयारी 6 साल पहले 2019 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से शुरू हो गई थी। 24 अक्टूबर 2019 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा 105 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली थीं।
देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी थी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की मांग पर अड़कर गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर 28 नवंबर को मुख्यमंत्री बन गए। तभी से भाजपा ने शिवसेना को तोड़ने और महाराष्ट्र में अपने दम पर खड़ी पार्टी बनने की रणनीति बनाई।
भाजपा सूत्रों के अनुसार, पहला लक्ष्य एकनाथ शिंदे के माध्यम से शिवसेना को विभाजित कर कमजोर करना था, साथ ही शिंदे को भी अत्यधिक मजबूत न होने देना। दूसरा उद्देश्य अजित पवार के जरिए शरद पवार की NCP को तोड़ना और फिर विभाजित पार्टी को सीधी लड़ाई में पराजित करना था।
तीन क्षेत्रों में व्यापक सफलता
भाजपा ने बाल ठाकरे की शिवसेना के गढ़ मुंबई-ठाणे, शरद पवार की NCP के गढ़ पश्चिम महाराष्ट्र (पुणे, सोलापुर, कोल्हापुर) और कांग्रेस के प्रभाव वाले विदर्भ, तीनों क्षेत्रों में विरोधी दलों को चुनौती देकर जीत हासिल की। अब पार्टी ऐसी स्थिति में है जहां उसे सहयोगियों की आवश्यकता नहीं रह गई है।
BMC में ऐतिहासिक बदलाव
एशिया के सबसे धनी नगर निगम बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में 25 वर्षों में पहली बार शिवसेना का मेयर नहीं होगा। 227 सीटों वाले BMC में भाजपा-शिंदे शिवसेना गठबंधन ने 118 सीटें जीतीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना 72 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 24 सीटें मिलीं।
BMC का 2025-26 के लिए बजट लगभग 74,427 करोड़ रुपये है, जो हिमाचल, अरुणाचल और गोवा जैसे राज्यों के बजट से अधिक है। पिछले 10 वर्षों में निगम ने मुंबई के विकास के लिए 2.19 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं।
शिंदे ठाणे तक सीमित
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपने गढ़ ठाणे तो जीते, लेकिन आसपास के वसई-विरार, मीरा-भायंदर, नवी मुंबई और कल्याण डोंबिवली में हार गए। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर के अनुसार, “शिंदे की राजनीतिक पहुंच अब ठाणे तक सीमित हो गई है। मुंबई में उन्हें मात्र 28 सीटें मिलीं और वे तीसरे स्थान पर रहे।”
उद्धव का मुंबई गढ़ डगमगाया
उद्धव ठाकरे भाजपा से मुंबई हार गए, लेकिन शिंदे को पीछे छोड़ने में सफल रहे। शिंदे साउथ मुंबई के मूल शिवसेना मतदाताओं में पैठ नहीं बना पाए। उद्धव ने हिंदुत्व के बजाय मराठी और मुंबई के मुद्दों को केंद्र में रखा। भाई राज ठाकरे के साथ गठबंधन कर मराठी बनाम गैर-मराठी का मुद्दा उठाया।
हालांकि, 66 सीटें जीतकर उद्धव ने अपनी पार्टी को पूर्णतः समाप्त होने से बचा लिया। विशेषज्ञों के अनुसार, शिवसेना (उद्धव) अब केवल मुंबई की पार्टी रह गई है।
पवार बंधुओं की बड़ी हार
चुनाव के सबसे बड़े हारे अजित पवार हैं। उनकी NCP का एक भी मेयर नहीं बन रहा। कोऑपरेटिव के बड़े नेता और स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी पकड़ के लिए जाने जाने वाले अजित पवार की इस हार को बड़ी राजनीतिक मात माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अजित पवार के विवादास्पद बयानों से भाजपा नेतृत्व नाराज था। इसके अलावा, उनका चाचा शरद पवार के साथ हाथ मिलाना भाजपा को पसंद नहीं आया।
शरद पवार की NCP (SP) को तो और भी कम, केवल 40 सीटें मिलीं। राजनीतिक विशेषज्ञ राजेंद्र साठे कहते हैं, “शरद पवार के समर्थक तो हैं, लेकिन उनके अधिकांश सहयोगी अजित के साथ चले गए। पिछले विधानसभा चुनाव की हार के बाद वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए हैं।”
AIMIM की मजबूत उपस्थिति
असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने 125 सीटें जीतकर मुस्लिम वोट बैंक में अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन किया। संभाजीनगर और मालेगांव में पार्टी को बड़ी सफलता मिली। संभाजीनगर में 24 और मालेगांव में 21 सीटें जीतकर AIMIM ने साबित किया कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से उनकी ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मालेगांव में इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र (ISLAM) 84 में से 35 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। यहां शिंदे की शिवसेना को 18, समाजवादी पार्टी को 5 और कांग्रेस को मात्र 3 सीटें मिलीं। भाजपा केवल 2 सीटों पर सिमट गई।
कांग्रेस का सिमटता दायरा
विदर्भ में पारंपरिक प्रभाव रखने वाली कांग्रेस चंद्रपुर को छोड़कर हर जगह बुरी तरह हारी। लातूर में 70 में से 43 सीटें जीतकर पार्टी ने सांत्वना पाई। पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का यह गढ़ अभी भी कांग्रेस के पास है।
मुंबई में कांग्रेस को 24 सीटें मिलीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव) मुंबई में साथ लड़ते तो भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते थे। दलित वोट अभी भी कांग्रेस को मिलता है, जिससे दोनों पार्टियों को फायदा हो सकता था।
राज-उद्धव गठबंधन बेअसर
20 वर्षों बाद राज और उद्धव ठाकरे के एक साथ आने से सुर्खियां तो बनीं, मराठी मानुष का मुद्दा भी उछला, लेकिन वोट नहीं आए। शिवाजी पार्क में राज की सभा में भीड़ तो उमड़ी, लेकिन नासिक में वे सत्ता गंवा बैठे। MNS को केवल 13 सीटें मिलीं।
राजेंद्र साठे कहते हैं, “राज ठाकरे अच्छे भाषणों से भीड़ तो जुटा लेते हैं, लेकिन वोट नहीं ला पाते। हालांकि, यदि MNS उद्धव के साथ नहीं लड़ती तो उन्हें इतनी सीटें भी नहीं मिलतीं।”
फडणवीस की जीत की गारंटी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने निकाय चुनावों में स्वयं कमान संभाली और भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाई। संदीप सोनवलकर कहते हैं, “फडणवीस ने साबित कर दिया कि वे हर प्रकार का चुनाव जिता सकते हैं। अब भाजपा उन्हें हटाने का जोखिम नहीं ले सकती।”
भाजपा को संगठनात्मक मजबूती का भी लाभ मिला। पार्टी ने केवल 14 स्थानों पर गठबंधन किया और 15 स्थानों पर अकेले चुनाव लड़ा। नागपुर में गुटबाजी नहीं दिखी, जिससे पार्टी को बड़ी सफलता मिली।
लाडकी बहना योजना का प्रभाव
चुनाव से एक दिन पहले लाडकी बहना योजना के तहत महिलाओं के खातों में 1,500 रुपये भेजे गए। यह कदम भी चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ। भाजपा को पारंपरिक रूप से शहरी क्षेत्रों में मजबूत माना जाता है और इस बार भी यह साबित हुआ।
निष्कर्ष:
महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अब पूरे राज्य की पार्टी बन गई है। लोकसभा, विधानसभा और अब स्थानीय निकाय – तीनों स्तरों पर भाजपा का प्रभुत्व है। शिवसेना और NCP में विभाजन के बाद बंटे मतदाता अब भाजपा की ओर शिफ्ट हो चुके हैं। सहयोगी दलों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता सिमटती जा रही है।
