एक सत्र, दो महाभियोग प्रस्ताव… लोकसभा अध्यक्ष के बाद विपक्ष के निशाने पर CEC ज्ञानेश कुमार, जानिए क्या है मामला ?

संसद में हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष के महाभियोग को लेकर लगभग 10 घंटे तक चली बहस के बाद अब विपक्ष एक बार फिर सरकार और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर नया मुद्दा उठाने की तैयारी में है। इस बार विपक्ष का निशाना देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) हैं। खबर है कि विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग जैसा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। इस पूरे प्रयास में सबसे सक्रिय भूमिका तृणमूल कांग्रेस (TMC) निभा रही है।


सूत्रों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया पूरी करने में लगी हुई है। कहा जा रहा है कि यह प्रस्ताव गुरुवार को पेश किया जा सकता है। हालांकि अभी यह पूरी तरह तय नहीं हुआ है कि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाएगा या राज्यसभा में।


तृणमूल कांग्रेस ने एहतियात के तौर पर दोनों सदनों के सांसदों के हस्ताक्षर जुटा लिए हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर किसी भी सदन में प्रस्ताव पेश किया जा सके।

CEC Gyanesh Kumar impeachment motion

विपक्ष ने जुटाए सांसदों के हस्ताक्षर
नियमों के अनुसार यदि किसी जज, मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाना हो तो संसद के सदस्यों के एक निश्चित संख्या में हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।


लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, जबकि राज्यसभा में प्रस्ताव पेश करने के लिए 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए।


बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस ने इस मामले में दोनों सदनों के लिए आवश्यक संख्या से ज्यादा समर्थन जुटा लिया है। जानकारी के मुताबिक पार्टी ने राज्यसभा के लगभग 60 सांसदों और लोकसभा के करीब 120 सांसदों के हस्ताक्षर हासिल कर लिए हैं।


इन हस्ताक्षरों में अधिकांश विपक्षी दलों के सांसद शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के दो प्रमुख नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। माना जा रहा है कि उन्होंने यह कदम इसलिए नहीं उठाया क्योंकि वे दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में हैं।


अभी तय नहीं हुआ किस सदन में आएगा प्रस्ताव
तृणमूल कांग्रेस ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव संसद के किस सदन में पेश किया जाएगा। यही कारण है कि पार्टी ने दोनों सदनों के सांसदों के हस्ताक्षर पहले ही करवा लिए हैं।


राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जिस सदन में राजनीतिक माहौल ज्यादा अनुकूल होगा, वहीं यह प्रस्ताव पेश किया जा सकता है।


अगर प्रस्ताव पेश किया जाता है और उसे स्वीकार कर लिया जाता है तो यह भारत के इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी।


मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए गए तीन आरोप
तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ तीन मुख्य आरोपों को आधार बनाया है। पार्टी का कहना है कि इन मुद्दों पर संसद में चर्चा होनी चाहिए।


पहला आरोप मताधिकार से वंचित करने से जुड़ा है। विपक्ष का कहना है कि कुछ मामलों में मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है। उनका आरोप है कि इस तरह की स्थिति लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करती है और नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी कम हो जाती है।


दूसरा आरोप चुनावी गड़बड़ी या चुनावी धांधली से जुड़ा है। विपक्ष का दावा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में मतदाता सूची में कई तरह की अनियमितताएं सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर एक ही पते पर कई मतदाताओं के नाम दर्ज होने जैसे आरोप लगाए गए हैं।


कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी कई बार सार्वजनिक मंचों से मतदाता सूची में गड़बड़ी का मुद्दा उठा चुके हैं।


तीसरा आरोप दुर्व्यवहार से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि उनकी पार्टी का प्रतिनिधिमंडल कई बार मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने गया था, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।


ममता बनर्जी का आरोप है कि एक बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार ठीक नहीं था और उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के साथ सही तरीके से बात नहीं की।


प्रस्ताव आने के बाद क्या होगी प्रक्रिया
अगर संसद में यह प्रस्ताव पेश किया जाता है और उसे स्वीकार कर लिया जाता है तो इसके बाद एक तय प्रक्रिया शुरू होती है।


सबसे पहले आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। इस समिति में आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ शामिल होते हैं।


यह समिति आरोपों की जांच करती है और संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाता है। जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपती है।


अगर समिति यह मानती है कि आरोप साबित नहीं हुए हैं तो मामला वहीं खत्म हो जाता है। लेकिन अगर समिति आरोपों को सही मानती है तो उसके बाद संसद में इस मुद्दे पर बहस होती है।


इसके बाद दोनों सदनों में मतदान होता है। इस प्रक्रिया में प्रस्ताव को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है।


विशेष बहुमत का मतलब यह है कि प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई का समर्थन मिलना चाहिए।


अगर दोनों सदन इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देते हैं तो मामला राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक आदेश जारी कर सकते हैं।


संविधान में क्या है प्रावधान
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की स्थापना की गई है। इसी अनुच्छेद के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती है।


संविधान यह भी सुनिश्चित करता है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम कर सके। इसी वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया काफी कठिन रखी गई है।


संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।


अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल दो ही आधारों पर हटाया जा सकता है – पहला सिद्ध दुर्व्यवहार (proved misbehaviour) और दूसरा अक्षम होना (incapacity)।


इसके अलावा उनकी सेवा शर्तों को नियुक्ति के बाद उनके नुकसान के लिए बदला नहीं जा सकता।

CEC Gyanesh Kumar impeachment motion

“महाभियोग” शब्द का तकनीकी पहलू
राजनीतिक चर्चाओं में अक्सर इस प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है। लेकिन संविधान की भाषा में यह शब्द केवल राष्ट्रपति के लिए इस्तेमाल होता है।


जजों और मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में आधिकारिक रूप से इसे हटाने की प्रक्रिया (removal) कहा जाता है। हालांकि आम बोलचाल में लोग इसे महाभियोग ही कहते हैं।


जजों के खिलाफ पहले भी चल चुकी है प्रक्रिया
भारत में अब तक कई जजों के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
सबसे चर्चित मामला जस्टिस वी. रामास्वामी का रहा था। उनके खिलाफ संसद में लंबी बहस हुई थी और उस समय उनकी पैरवी वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने की थी। हालांकि बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।


इसके अलावा जस्टिस सौमित्र सेन, सी. वी. नागार्जुन रेड्डी, दीपक मिश्रा और पी. डी. दिनाकरण जैसे मामलों में भी विवाद सामने आए और कुछ मामलों में इस्तीफा देना पड़ा।
फिलहाल जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा मामला अभी भी चर्चा में है।


हालांकि अब तक किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।


संसद के मौजूदा सत्र में आएगा प्रस्ताव?
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि वह संसद के माध्यम से अपनी बात रखना चाहती है। पार्टी का मानना है कि यह मामला लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा है और इसे संसद में उठाया जाना चाहिए।


नियमों के अनुसार प्रस्ताव पेश होने के बाद उस पर चर्चा के लिए कम से कम 14 दिन का समय दिया जाता है।


इस समय संसद का सत्र 2 अप्रैल तक चलना है। इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस सत्र के दौरान ही यह प्रस्ताव पेश किया जाता है या फिर इसे बाद के लिए टाल दिया जाता है।अगर यह प्रस्ताव आता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अहम घटना होगी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *