हाल ही में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने एनसीआर में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए साल भर जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु मासिक मंत्रिस्तरीय समीक्षा का निर्देश दिया है। इस बैठक में मंत्रालय ने दिल्ली के वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बेहतर सार्वजनिक परिवहन पर जोर दिया।
दिल्ली–एनसीआर में वायु प्रदूषण की वर्तमान स्थिति
- दिल्ली–एनसीआर में वर्ष भर वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी रहती है। वर्ष 2025 में राजधानी में PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर 96 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज हुआ, जो भारत के 40 µg/m³ के मानक से कई गुना अधिक है। यह स्तर WHO की 5 µg/m³ की गाइडलाइन से भी बेहद दूर है। वर्ष 2025 के लिए क्षेत्र का वार्षिक AQI औसत 201 रहा, जो बताता है कि हवा अधिकांश समय खराब श्रेणी में रही।
- पूरे वर्ष में दिल्ली को एक भी “अच्छा” AQI दिन नहीं मिला। आंकड़ों के अनुसार लगभग 79 दिन संतोषजनक, 121 दिन मध्यम, 86 दिन खराब, 71 दिन बहुत खराब, और 8 दिन गंभीर श्रेणी में रहे। यह पैटर्न साफ दिखाता है कि स्थिति समय के साथ सुधरने के बजाय और अधिक जटिल होती जा रही है।
- सर्दियों के महीनों में प्रदूषण का स्तर सर्वाधिक बढ़ जाता है। दिसंबर 2025 में PM2.5 का औसत स्तर बढ़कर 210 µg/m³ तक पहुँच गया, जबकि अक्टूबर–नवंबर में यह लगभग 163 µg/m³ था। कई दिनों में AQI 450 से ऊपर दर्ज हुआ, जो गंभीर श्रेणी में आता है। जनवरी 2026 की शुरुआत में भी कई स्थानों पर AQI 370 और 311 दर्ज किया गया।
- दिल्ली–एनसीआर में प्रदूषण का मुख्य स्रोत PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण हैं। ये कण फेफड़ों में गहराई तक पहुँचकर गंभीर श्वसन और हृदय रोग पैदा करते हैं। वर्ष 2025 में PM10 का वार्षिक औसत 197 µg/m³ रहा, जो राष्ट्रीय मानक से अत्यधिक अधिक है। छोटे आकार का PM2.5 सबसे खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह रक्त प्रवाह तक पहुँच सकता है।
- स्थानीय स्तर पर सबसे बड़ा योगदान सड़क परिवहन का है। निजी वाहनों और भारी ट्रक–ट्रेलरों की संख्या में बढ़ोतरी से NOx और PM उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है। निर्माण स्थलों, सड़क धूल और तोड़फोड़ गतिविधियों से भी बड़ी मात्रा में प्रदूषक हवा में फैलते हैं। इसके अलावा एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्र—जैसे ईंट भट्टियाँ, पावर प्लांट और छोटी औद्योगिक इकाइयाँ—SO₂, PM और अन्य गैसों का उत्सर्जन करते हैं। सर्दियों में कचरा और बायोमास का दहन प्रदूषक स्तरों को और बढ़ाता है।
- अध्ययन बताते हैं कि वर्ष 2025 में दिल्ली के कुल प्रदूषण का लगभग 65% हिस्सा आसपास के क्षेत्रों से आया। इसमें बहादुरगढ़ और अन्य तेजी से बढ़ते एनसीआर जिले प्रमुख योगदानकर्ता रहे। दिल्ली के भीतर से उत्सर्जन की हिस्सेदारी लगभग 35% आंकी गई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण के बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
- हालाँकि दिल्ली में देश के सबसे अधिक CAAQMS मॉनिटरिंग स्टेशन हैं, लेकिन यह व्यवस्था पूरे एनसीआर में समान रूप से नहीं फैली हुई है। कई परिधीय और तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में निगरानी कमजोर है, जिससे प्रदूषण के वास्तविक स्तर और स्रोतों की पहचान में कठिनाई आती है।
वायु प्रदूषण कम करने में सार्वजनिक परिवहन की भूमिका
- सार्वजनिक परिवहन सड़क पर वाहनों की संख्या को बड़े पैमाने पर घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक बस दर्जनों कारों का स्थान ले सकती है, जबकि एक मेट्रो ट्रेन सैकड़ों यात्रियों को एक साथ ले जाती है। जब लोग निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन चुनते हैं, तो ट्रैफिक जाम कम होता है, सड़कों पर वाहनों का ठहराव घटता है और NOx, CO जैसे हानिकारक उत्सर्जन में स्वाभाविक कमी आती है। इससे प्रति यात्री उत्सर्जन कम होता है और हवा अपेक्षाकृत स्वच्छ रहती है।
- सार्वजनिक परिवहन प्रणालियाँ आमतौर पर वैकल्पिक ईंधन और स्वच्छ तकनीक को जल्दी अपनाती हैं। दिल्ली का बड़ा बस बेड़ा आज CNG आधारित हो चुका है, जो पारंपरिक पेट्रोल और डीज़ल की तुलना में कम प्रदूषण फैलाता है। इसके साथ ही दिल्ली मेट्रो एक पूर्णतः विद्युत-चालित प्रणाली है, जिसमें किसी प्रकार का टेलपाइप उत्सर्जन नहीं होता। संस्थागत स्तर पर स्वच्छ तकनीक के इस उपयोग से शहर के प्रदूषण स्तर में सामूहिक रूप से उल्लेखनीय कमी आती है।
- एक प्रभावी सार्वजनिक परिवहन मॉडल में मेट्रो, बसें, फीडर सर्विस, और ई-रिक्शा जैसे विभिन्न साधनों को एकीकृत किया जाता है। यह मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी यात्रियों को एक सुगम और सुविधाजनक यात्रा प्रदान करती है। जब अंतिम चरण की यात्रा यानी लास्ट माइल कनेक्टिविटी सरल हो जाती है, तो लोग निजी वाहन का उपयोग कम कर देते हैं। इससे शहर में वाहनों का दबाव घटता है और प्रदूषण में भी कमी आती है।
- सार्वजनिक परिवहन आधारित विकास मॉडल शहरों के अनियंत्रित फैलाव को रोकता है। जब लोग कार पर निर्भर नहीं रहते, तो बड़े पार्किंग क्षेत्र और चौड़ी सड़कों की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे शहरी भूमि का उपयोग अधिक संतुलित और सतत तरीके से किया जा सकता है। परिवहन हब के आसपास मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्र विकसित होते हैं, जिससे घर, दफ्तर और सेवाएँ पास आती हैं और लोगों को अधिक दूरी तय नहीं करनी पड़ती। यह व्यवहारिक बदलाव भी प्रदूषण कम करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- सार्वजनिक परिवहन पर सख्त उत्सर्जन मानकों को लागू करना अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि यह एक केंद्रीकृत प्रणाली है। हज़ारों बसों और मेट्रो ट्रेनों की निगरानी और मेंटेनेंस सरकारी एजेंसियों द्वारा नियमित रूप से की जाती है। इसके उलट लाखों निजी वाहनों पर एक समान नियंत्रण लागू करना अत्यंत कठिन होता है। इस केंद्रीकृत व्यवस्था के कारण उत्सर्जन कम करने की रणनीतियाँ अधिक प्रभावी और व्यवस्थित तरीके से लागू होती हैं।
सार्वजनिक परिवहन को सशक्त बनाने हेतु सरकारी पहल और प्रमुख नीतियाँ
- राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति (NUTP): राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति शहरी गतिशीलता सुधार का आधार स्तंभ है, जो भूमि उपयोग और परिवहन योजना को एक साथ जोड़ने पर बल देती है ताकि यात्रियों को कम दूरी तय करनी पड़े। यह नीति राज्यों को यूनिफाइड मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (UMTA) बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे परिवहन निर्णयों में समन्वय बने और संस्थागत बिखराव कम हो। वर्ष 2026 के लिए नीति का मुख्य फोकस नॉन-मोटराइज़्ड ट्रांसपोर्ट (NMT) और सेवा स्तरीय मानदंडों को लागू करना है, ताकि हर नागरिक को सुरक्षित, सुलभ और किफायती परिवहन उपलब्ध हो।
- पीएम-ईबस सेवा योजना: पीएम-ईबस सेवा योजना संगठित बस सेवाओं की कमी को दूर करने के लिए शुरू की गई है। इसके तहत 169 शहरों में 10,000 इलेक्ट्रिक बसें पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल से तैनात की जा रही हैं। 2026 तक केंद्र सरकार “बिहाइंड-द-मीटर” बिजली अवसंरचना के लिए 100% सहायता प्रदान कर रही है। यह योजना लगभग 45,000 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करने और शहरों में वायु तथा ध्वनि प्रदूषण कम करने का लक्ष्य रखती है।
- भुगतान सुरक्षा तंत्र (PSM): सरकार ने 2024 में ₹3,435 करोड़ का पेमेंट सिक्योरिटी मैकेनिज्म (PSM) अधिसूचित किया, जो निजी ऑपरेटरों के वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए बनाया गया है। यह तंत्र सुनिश्चित करता है कि स्थानीय परिवहन प्राधिकरण भुगतान में देरी कर भी दें, तब भी OEMs को समय पर भुगतान मिलता रहे। इस पहल ने निजी निवेश को तेज़ किया है और 2028–29 तक लगभग 38,000 ई-बसों का समर्थन करने का लक्ष्य रखा गया है।
- मेट्रो रेल नीति और TOD आधारित विकास: मेट्रो रेल नीति 2017 सभी नए परियोजनाओं के लिए आर्थिक और सामाजिक मूल्यांकन अनिवार्य बनाती है और उच्च घनत्व वाले ट्रांज़िट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) को बढ़ावा देती है। वर्ष 2026 तक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बनने की ओर अग्रसर है, जिसमें 1,000 किमी से अधिक नेटवर्क चालू या निर्माणाधीन है। अब नियामक ढांचा “लास्ट-माइल कनेक्टिविटी” को प्राथमिकता दे रहा है।
- NCMC और डिजिटल एकीकरण: 2026 में पूरे देश में नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) को मानकीकृत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। यह एक इंटरऑपरेबल कार्ड है जो मेट्रो, बस और उपनगरीय रेल में उपयोग किया जा सकता है। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत ICCCs और रियल-टाइम ट्रैकिंग को मजबूत किया गया है, जिससे विश्वसनीयता और सुविधा बढ़ी है।
- महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा: दिल्ली सरकार द्वारा लागू महिला मुफ्त यात्रा योजना ने महिलाओं की सुरक्षा, गतिशीलता और रोजगार/शिक्षा तक पहुँच को मजबूत किया है।
- ऑड-ईवन और दिल्ली EV नीति 2.0: ऑड-ईवन योजना गंभीर प्रदूषण के समय निजी वाहनों को सीमित कर सार्वजनिक परिवहन पर निर्भरता बढ़ाती है। वहीं, दिल्ली EV नीति 2.0 के अंतर्गत 2026 तक 11,000 पूर्णतः इलेक्ट्रिक बसों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिससे राजधानी का सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह विद्युत आधारित हो सके।
