चीनी कम्युनिस्ट पार्टी CCP का दिल्ली दौरा- कूटनीतिक औपचारिकता, भरोसा बहाली या शक्ति संतुलन की राजनीति! जानिएइस मुलाकात का असली मतलब क्या है?

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रतिनिधिमंडल का हाल ही में भारत दौरा राजनीतिक गलियारों में गर्मागर्म बहस का विषय बन गया है। 2020 में गलवान घाटी की खूनी झड़प के बाद यह पहला मौका था जब CCP का आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंचा और भारतीय राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की। इस दौरे ने कई सवाल खड़े किए हैं – क्या यह कूटनीतिक संबंधों को सुधारने का प्रयास है? क्या भारत चीन की एक-दल व्यवस्था से प्रेरणा ले रहा है? या यह महज एक राजनयिक औपचारिकता थी?

 

चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के इंटरनेशनल डिपार्टमेंट की प्रमुख सुन हयान के नेतृत्व में आए इस प्रतिनिधिमंडल ने न केवल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मुख्यालय का दौरा किया, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेताओं से भी मुलाकात की। इसके अलावा, उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPM के नेताओं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद से भी बातचीत की। यह व्यापक दौरा स्पष्ट करता है कि चीन भारत के विभिन्न राजनीतिक खेमों से संवाद स्थापित करना चाहता है।

 

विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाए कि जब सीमा पर तनाव है, जब सक्सगाम वैली में चीन निर्माण कार्य कर रहा है, उस समय “लाल आंखों” की जगह “रेड कारपेट” क्यों बिछाया जा रहा है? सरकार का जवाब है कि यह सरकार की अनुमति से हुई राजनयिक मुलाकात है और कूटनीतिक संवाद जारी रखना राष्ट्रीय हित में है।

Chinese Communist Party visit to Delhi

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है जिसके लगभग 10 करोड़ सदस्य हैं। पहले नंबर पर भारत की भारतीय जनता पार्टी (BJP) है जिसके आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 14 करोड़ से अधिक सदस्य हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है।

लेकिन इन दोनों पार्टियों में मूलभूत अंतर है। भारत में बहु-दल प्रणाली है जहां सैकड़ों राजनीतिक पार्टियां मौजूद हैं और लोगों को अपनी पसंद की पार्टी चुनने की स्वतंत्रता है। वहीं चीन में एक-दल व्यवस्था है जहां केवल कम्युनिस्ट पार्टी को ही सत्ता में रहने का अधिकार है और कोई प्रभावी विपक्ष नहीं है।

 

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है – चीन की 140 करोड़ की आबादी में से केवल 10 करोड़ लोग ही राजनीतिक पार्टी के सदस्य क्यों हैं? बाकी 130 करोड़ लोग क्या करते हैं? क्या उनके पास कोई राजनीतिक विकल्प है? इसका जवाब चीन की राजनीतिक व्यवस्था को समझने से मिलता है।

 

CCP का ऐतिहासिक संदर्भ: संघर्ष से सत्ता तक

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को समझने के लिए हमें 100 साल पीछे जाना होगा। भारत की तरह ही चीन में भी लंबे समय तक राजशाही का शासन था। विभिन्न राजवंश आपस में संघर्ष करते रहते थे। 19वीं सदी में जब ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, तब चीन भी उनके निशाने पर आ गया।

 

ब्रिटेन को चीन से चाय की जरूरत थी। लेकिन चाय खरीदने में ब्रिटेन को बड़ा नुकसान हो रहा था क्योंकि यह एकतरफा व्यापार था। इस असंतुलन को दूर करने के लिए ब्रिटिश व्यापारियों ने चीन को अफीम बेचना शुरू किया। अफीम की लत ने चीनी समाज को भारी नुकसान पहुंचाया। जब चीनी सरकार ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की, तो 1839 में पहला अफीम युद्ध हुआ। इस युद्ध में चीन की हार हुई और हांगकांग ब्रिटिश नियंत्रण में चला गया।

 

1900 में बॉक्सर विद्रोह हुआ, जिसमें चीनी किसानों ने विदेशी प्रभाव के खिलाफ विद्रोह किया। लेकिन आठ देशों की संयुक्त सेना ने इस विद्रोह को कुचल दिया। चीन पर विदेशी नियंत्रण और बढ़ गया। इस अपमान और शोषण ने चीनी जनता में राष्ट्रवाद और आजादी की भावना जगाई।

 

डॉक्टर सुन यात सेन ने राजशाही के खिलाफ संघर्ष शुरू किया और 1912 में कुओमिनतांग पार्टी की स्थापना की। यही पार्टी आज ताइवान पर शासन करती है। सुन यात सेन अस्थाई राष्ट्रपति बने और उन्होंने लोकतंत्र, राष्ट्रवाद और समाजवाद का नारा दिया।

 

इसी दौरान रूस में व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति हो रही थी। जार की तानाशाही को उखाड़कर मजदूरों और किसानों की सरकार बन रही थी। इस क्रांति से प्रेरित होकर चीन में भी साम्यवादी विचारधारा फैलने लगी।

 

4 मई 1921 को माओ जेडोंग और प्रीमियर झऊ एनलाइ ने मिलकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। शुरुआत में केवल 50 सदस्य थे, लेकिन 1925 तक यह संख्या 1,500 हो गई। पार्टी का मुख्य एजेंडा था – किसानों और मजदूरों के हकों के लिए लड़ना, विदेशी शोषण का विरोध करना और सर्वहारा वर्ग को सत्ता दिलाना।

 

शुरुआत में कुओमिनतांग और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलकर काम किया। 1925 में दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। लेकिन उसी साल सुन यात सेन की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद च्यांग काई शेक कुओमिनतांग के नेता बने और उन्होंने कम्युनिस्टों पर संदेह करना शुरू किया। दोनों दलों में टकराव बढ़ता गया।

 

1930 के दशक में जापान ने चीन पर आक्रमण किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने जापान के खिलाफ संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई। जब 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरे और जापान ने आत्मसमर्पण किया, तो चीनी जनता में CCP की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई।

 

युद्ध के बाद कुओमिनतांग और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध हुआ। 1949 में माओ जेडोंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने जीत हासिल की और पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई। च्यांग काई शेक और कुओमिनतांग के नेता ताइवान भाग गए और वहां “रिपब्लिक ऑफ चाइना” की स्थापना की।

 

यही कारण है कि आज दो चीन हैं – मुख्य भूमि चीन (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) और ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना)। दोनों अपने आपको असली चीन मानते हैं। मुख्य भूमि चीन का कहना है कि ताइवान उसका अभिन्न अंग है।

 

CCP की संरचना: कैसे काम करती है एक-दल व्यवस्था?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल – चीन में एक ही पार्टी कैसे 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करती है? क्या यह पूरी तरह तानाशाही है? या इसमें कोई लोकतांत्रिक तत्व भी हैं?

 

CCP का दावा है कि उनकी व्यवस्था में जनता की भागीदारी है, लेकिन यह भागीदारी पार्टी के भीतर होती है, न कि विभिन्न पार्टियों के बीच। आइए समझते हैं कैसे:

 

पहला स्तर – पार्टी सदस्यता: चीन की 140 करोड़ आबादी में से जो लोग सक्रिय राजनीति में रुचि रखते हैं, वे CCP के सदस्य बनते हैं। वर्तमान में लगभग 10 करोड़ सदस्य हैं। सदस्य बनना आसान नहीं है – आपको पार्टी की विचारधारा से सहमत होना होगा, कठोर जांच से गुजरना होगा।

 

दूसरा स्तर – नेशनल पार्टी कांग्रेस: ये 10 करोड़ सदस्य अपने बीच से चुनाव करके लगभग 2,300 से 3,000 प्रतिनिधि चुनते हैं। यह चुनाव क्षेत्रीय आधार पर होता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में विधायक चुने जाते हैं। यहां असली प्रतिस्पर्धा होती है – एक पद के लिए कई उम्मीदवार खड़े होते हैं और आंतरिक चुनाव होता है। यह नेशनल पार्टी कांग्रेस हर 5 साल में बनती है।

 

तीसरा स्तर – सेंट्रल कमेटी: नेशनल पार्टी कांग्रेस के ये 2,300-3,000 सदस्य अपने बीच से 376 सदस्यीय सेंट्रल कमेटी चुनते हैं। यहां भी प्रतिस्पर्धा होती है और वोटिंग से चयन होता है।

 

चौथा स्तर – पोलित ब्यूरो: सेंट्रल कमेटी के 376 सदस्य अपने बीच से 24 सदस्यीय पोलित ब्यूरो बनाते हैं। ये 24 लोग चीन के सबसे शक्तिशाली लोग होते हैं। इनके पास प्रमुख मंत्रालय और जिम्मेदारियां होती हैं।

 

पांचवां स्तर – पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी: पोलित ब्यूरो के 24 सदस्य अपने में से 7 सदस्यीय पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी बनाते हैं। ये सात लोग चीन के वास्तविक शासक हैं। हर फैसला इन्हीं के हाथ में है।

 

शीर्ष – जनरल सेक्रेटरी: इन सात में से एक जनरल सेक्रेटरी बनता है, जो पार्टी का सर्वोच्च नेता होता है। वर्तमान में शी जिनपिंग इस पद पर हैं। वही चीन के राष्ट्रपति भी हैं और सेना के सर्वोच्च कमांडर भी।

 

यह पूरी प्रक्रिया एक पिरामिड की तरह है जहां नीचे से ऊपर जाने के लिए हर स्तर पर चुनाव होता है। लेकिन यह चुनाव केवल पार्टी सदस्यों के बीच होता है, सामान्य जनता इसमें भाग नहीं लेती।

 

एक-दल व्यवस्था की सीमाएं और आलोचनाएं

चीन की इस व्यवस्था में कई बुनियादी समस्याएं हैं:

 

पहली समस्या – विचारधारा की एकरूपता: केवल एक ही विचारधारा को मान्यता है। अगर कोई अलग सोच रखता है, तो उसके लिए कोई जगह नहीं है। लोकतंत्र की परिभाषा में विचारों की विविधता होना जरूरी है।

 

दूसरी समस्या – विपक्ष का अभाव: कोई संगठित विपक्ष नहीं है जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठा सके। विपक्ष लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो सत्ता को जवाबदेह बनाता है।

 

तीसरी समस्या – सीमित भागीदारी: 140 करोड़ में से केवल 10 करोड़ लोग ही सक्रिय राजनीति में भाग ले सकते हैं। बाकी 130 करोड़ लोगों की राजनीतिक आकांक्षाएं कहां जाती हैं?

 

चौथी समस्या – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभाव: जो पार्टी लाइन के खिलाफ बोलता है, उसके लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मीडिया, इंटरनेट, सोशल मीडिया सब पर सख्त नियंत्रण है।

 

चीन का तर्क है कि उनकी व्यवस्था में तेज विकास संभव है क्योंकि लंबी बहस और राजनीतिक अस्थिरता नहीं है। एक स्पष्ट विजन है और उसे लागू करना आसान है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि विकास के नाम पर मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का बलिदान नहीं किया जा सकता।

 

CCP का इंटरनेशनल डिपार्टमेंट: दुनिया को समझाने की कोशिश

CCP ने महसूस किया कि दुनिया भर में उनकी छवि तानाशाही शासन की है। इसे बदलने के लिए उन्होंने एक इंटरनेशनल डिपार्टमेंट बनाया है। यह विभाग 160 देशों की 600 से अधिक राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में है।

 

इस विभाग का काम है दुनिया भर में जाकर यह समझाना कि चीन की राजनीतिक व्यवस्था अद्वितीय है, तानाशाही नहीं है। वे बताते हैं कि कैसे पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, कैसे जनता की भागीदारी है। यही विभाग भारत सहित विभिन्न देशों में जाकर CCP की कार्यप्रणाली पर सेमिनार करता है, राजनीतिक नेताओं से मिलता है।

 

हाल में भारत आई सुन हयान भी इसी इंटरनेशनल डिपार्टमेंट की प्रमुख हैं। उनका मिशन था भारतीय राजनीतिक दलों को यह समझाना कि चीन में भी जनता की आवाज सुनी जाती है, भले ही वह तरीका अलग हो।

 

भारतीय राजनीति में विवाद: क्या BJP चीनी मॉडल की तरफ?

CCP के भारत दौरे ने कई राजनीतिक बहसें छेड़ दीं। विपक्षी दलों ने कई सवाल उठाए:

 

पहला सवाल – वन नेशन वन पार्टी: BJP “वन नेशन वन इलेक्शन”, “वन नेशन वन टैक्स” (GST), “वन नेशन वन ग्रिड” जैसी योजनाएं लाती रही है। विपक्ष का आरोप है कि क्या यह “वन नेशन वन पार्टी” की ओर कदम है? क्या BJP चीनी मॉडल से प्रेरणा ले रही है?

 

यह आरोप तार्किक रूप से कमजोर है क्योंकि “वन नेशन वन इलेक्शन” का मतलब है सभी चुनाव एक साथ कराना, न कि एक पार्टी का शासन। GST का मतलब है एक समान कर प्रणाली, न कि तानाशाही। भारत का संवैधानिक ढांचा बहुदलीय लोकतंत्र की रक्षा करता है।

 

दूसरा सवाल – केंद्र की सर्वोच्चता: हाल के राज्य चुनावों में देखा गया कि मुख्यमंत्री अब जननेता नहीं होते, केंद्र तय करता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा में जिन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, वे आवश्यक रूप से सबसे लोकप्रिय नेता नहीं थे। यह “गुजरात मॉडल” जैसा लगता है जहां मुख्यमंत्रियों को राज्यपाल की तरह बदल दिया जाता है।

 

लेकिन भारत में यह व्यवस्था चीन से बिल्कुल अलग है। यहां चुनाव होते हैं, जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। पार्टी अपने विधायकों में से मुख्यमंत्री चुनती है। यह आंतरिक पार्टी मामला है।

 

तीसरा सवाल – RSS की भूमिका: CCP के प्रतिनिधियों की RSS से भी मुलाकात हुई। विपक्ष ने सवाल उठाया कि RSS तो सरकार में नहीं है, फिर विदेशी प्रतिनिधियों से मुलाकात क्यों? क्या यह इस बात का संकेत है कि असली सत्ता कहां है?

 

चौथा सवाल – दोहरा मानदंड: कांग्रेस ने याद दिलाया कि 2017 में डोकलाम विवाद के दौरान जब राहुल गांधी की CCP के नेताओं से मुलाकात हुई थी, तो BJP ने उन पर “देशद्रोह” का आरोप लगाया था। अब जब खुद BJP के नेता मिल रहे हैं, तो क्यों नहीं वही मानदंड लागू होता?

 

कांग्रेस ने कहा, “हमें दिक्कत मुलाकात से नहीं है। दिक्कत यह है कि अगर विपक्ष का कोई नेता मिलता तो BJP इसे MOU करार देती। दोहरा मानदंड क्यों?”

 

सक्सगाम वैली का मुद्दा: सीमा विवाद के बीच मुलाकात

CCP के दौरे के समय एक और विवादास्पद मुद्दा सामने आया। चीन सक्सगाम वैली में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कर रहा है। यह क्षेत्र मूल रूप से भारत का हिस्सा था, लेकिन 1963 में पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) का यह हिस्सा चीन को “उपहार” में दे दिया था।

 

भारत ने कभी इस सौदे को मान्यता नहीं दी है और इस क्षेत्र को अपना अभिन्न अंग मानता है। लेकिन हाल में चीन ने वहां सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा बनाना शुरू किया है। भारत ने इसका विरोध किया है।

 

विपक्ष ने सवाल उठाया – जब सीमा पर ऐसा हो रहा है, तब CCP से मैत्रीपूर्ण बातचीत क्यों? क्या यह कमजोरी का संकेत नहीं है?

 

सरकार का जवाब है कि सक्सगाम वैली का मुद्दा 1963 का है, नेहरू के समय का। 1962 के युद्ध में चीन ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। उस समय की गलतियों की कीमत आज भी चुका रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम कूटनीतिक संवाद बंद कर दें। विरोध के साथ-साथ बातचीत भी जरूरी है।

 

भारत और चीन: दो अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं

भारत और चीन की राजनीतिक व्यवस्थाओं में आकाश-पाताल का अंतर है:

 

भारत की बहु-दल प्रणाली:

  • सैकड़ों राजनीतिक पार्टियां
  • हर नागरिक को वोट देने का अधिकार
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • मजबूत विपक्ष जो सरकार को जवाबदेह बनाता है
  • मीडिया की स्वतंत्रता
  • स्वतंत्र न्यायपालिका
  • हर विचारधारा को जगह

 

चीन की एक-दल व्यवस्था:

  • केवल एक पार्टी को सत्ता का अधिकार
  • पार्टी सदस्य ही राजनीतिक प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं
  • सीमित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • कोई संगठित विपक्ष नहीं
  • मीडिया पर सरकारी नियंत्रण
  • पार्टी की विचारधारा ही एकमात्र विचारधारा

 

भारत की व्यवस्था धीमी लग सकती है क्योंकि हर फैसले पर बहस होती है, विपक्ष सवाल उठाता है। लेकिन यही लोकतंत्र की ताकत है। चीन में फैसले तेजी से हो सकते हैं, लेकिन वे हमेशा जनहित में हों, इसकी कोई गारंटी नहीं।

 

राष्ट्रीय मुद्दों पर एकता की जरूरत

इस पूरे विवाद से एक बड़ा सवाल उभरता है – क्या भारत के राजनीतिक दल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक स्टैंड ले सकते हैं?

 

आंतरिक मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने चाहिए। यह लोकतंत्र का सौंदर्य है। लेकिन जब राष्ट्रीय हित की बात आए, जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व हो, तो सभी दलों को एकजुट होना चाहिए।

 

अगर हम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपस में लड़ते दिखेंगे, तो दूसरे देश हमारी कमजोरियों का फायदा उठाएंगे। वे हमारे बीच फूट डालने का प्रयास करेंगे।

 

भारत को एक परिपक्व लोकतंत्र की तरह व्यवहार करना चाहिए। अमेरिका में देखिए – डेमोक्रेट और रिपब्लिकन आपस में कितना भी लड़ें, विदेश नीति के मामले में वे अमेरिका के हित को सर्वोच्च रखते हैं।

 

निष्कर्ष: लोकतंत्र की रक्षा जरूरी

CCP के भारत दौरे ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। चीन की एक-दल व्यवस्था को समझना जरूरी है, लेकिन उसकी नकल करना खतरनाक होगा।

 

भारत का बहुदलीय लोकतंत्र हमारी ताकत है। यह धीमा हो सकता है, शोरगुल वाला हो सकता है, लेकिन यह हर नागरिक को आवाज देता है। यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में बैठा व्यक्ति तानाशाह नहीं बन सकता। यह विचारों की विविधता को बढ़ावा देता है।

 

चीन तेजी से विकास कर रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन क्या केवल आर्थिक विकास ही सब कुछ है? क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति का अधिकार, विचारों की आजादी का कोई मूल्य नहीं?

 

भारत को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों पर गर्व करना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए। कूटनीतिक संबंध बनाए रखने चाहिए, लेकिन अपनी मूल पहचान को नहीं खोना चाहिए।

 

अंत में, राजनीतिक दलों से अपील है कि राष्ट्रीय हित को पार्टी हित से ऊपर रखें। चीन जैसे पड़ोसी के साथ संबंधों में एक स्पष्ट, मजबूत और एकजुट स्टैंड लें। आंतरिक बहस घर में करें, लेकिन बाहर एक भारत दिखाएं।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई राजनीतिक जानकारी विभिन्न स्रोतों से संकलित है। यह किसी भी राजनीतिक दल, विचारधारा या देश का समर्थन या विरोध नहीं करता। राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना केवल समझ बढ़ाने के लिए की गई है।