अब फैमिली कोर्ट में नहीं दिखेंगे काले चोंगे? CJI का बड़ा आदेश! जानिए क्या है मामला जिसकी देशभर में है चर्चा

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने फैमिली कोर्ट के काम करने के तरीके पर बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि फैमिली कोर्ट को पारंपरिक अदालतों से अलग तरीके से चलाया जाए, ताकि खासकर बच्चों के मन में डर न पैदा हो।


दिल्ली के रोहिणी में एक नए फैमिली कोर्ट परिसर की आधारशिला रखने के दौरान उन्होंने कहा कि कोर्ट का मौजूदा माहौल बच्चों के लिए सहज नहीं होता। ऐसे में जरूरी है कि इसे ज्यादा मानवीय और सरल बनाया जाए।


काले चोंगे पर उठे सवाल
CJI सूर्यकांत ने खास तौर पर जज और वकीलों की पारंपरिक पोशाक-काले चोंगे-को लेकर चिंता जताई। उन्होंने पूछा कि क्या इस तरह की औपचारिक पोशाक बच्चों के मन में “मनोवैज्ञानिक डर” पैदा नहीं करती?


उन्होंने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में जज और वकील बिना यूनिफॉर्म के भी आ सकते हैं। उनका मानना है कि इससे कोर्ट का माहौल कम डरावना और ज्यादा सहज बनेगा।


पुलिस वर्दी पर भी आपत्ति
सिर्फ जज और वकीलों की पोशाक ही नहीं, बल्कि पुलिस की वर्दी को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए। उनका कहना था कि पुलिस की मौजूदगी और उनकी वर्दी भी बच्चों में डर पैदा कर सकती है।


इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में पुलिसकर्मी भी बिना वर्दी के आएं, ताकि बच्चों को एक सामान्य और सुरक्षित माहौल महसूस हो।

CJI black coat family court order

फैमिली कोर्ट का असली उद्देश्य क्या है

CJI ने साफ किया कि फैमिली कोर्ट का मकसद सिर्फ फैसले सुनाना नहीं है, बल्कि रिश्तों को सुधारना भी है। उन्होंने कहा कि ये कोर्ट आम सिविल मामलों से अलग होते हैं, क्योंकि इनमें परिवार के भीतर के विवाद होते हैं।

 

ऐसे मामलों में भावनाएं, रिश्ते और बच्चों का भविष्य जुड़ा होता है, इसलिए यहां सख्त और औपचारिक माहौल की बजाय संवेदनशीलता ज्यादा जरूरी है।

 

‘फैमिली कोर्ट’ नाम बदलने का सुझाव

CJI सूर्यकांत ने एक और दिलचस्प सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट का नाम बदलकर “फैमिली समाधान केंद्र” रखा जा सकता है।

 

उनका मानना है कि इससे लोगों को यह महसूस होगा कि यहां सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं होती, बल्कि रिश्तों को सुधारने की कोशिश भी होती है। इससे लोग कोर्ट आने में ज्यादा सहज महसूस कर सकते हैं।

 

बच्चों पर खास ध्यान देने की जरूरत

उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में आने वाले मामलों में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ऐसे में उनकी भावनाओं और मानसिक स्थिति का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

 

अगर कोर्ट का माहौल डरावना होगा, तो बच्चे खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएंगे। इसलिए जरूरी है कि वहां का वातावरण दोस्ताना और भरोसेमंद हो।

 

फैमिली विवाद क्यों अलग होते हैं

CJI ने बताया कि फैमिली कोर्ट में आने वाले मामले आमतौर पर दो अनजान पक्षों के बीच नहीं होते, बल्कि एक ही परिवार के लोगों के बीच होते हैं।

 

इन विवादों के असर सिर्फ कानूनी फैसले तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इसका असर लंबे समय तक रिश्तों, समाज और आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है।

 

हर कोई कोर्ट नहीं जाना चाहता

उन्होंने यह भी कहा कि आम तौर पर लोग कोर्ट जाने से बचना चाहते हैं, खासकर जब मामला निजी रिश्तों से जुड़ा हो।

 

ऐसे में अगर कोर्ट का माहौल सख्त और डराने वाला होगा, तो लोग और ज्यादा असहज महसूस करेंगे। इसलिए जरूरी है कि कोर्ट को एक ऐसे स्थान के रूप में विकसित किया जाए, जहां लोग अपनी बात आसानी से रख सकें।

 

इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां भी सामने आईं

इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन ने न्याय व्यवस्था की कुछ व्यावहारिक समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली की जिला अदालतों को तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है-बजट की कमी, स्टाफ की कमी और जगह की कमी।

 

उन्होंने यह भी बताया कि कोर्ट रूम और जजों के रहने की व्यवस्था भी एक बड़ी समस्या है, जिसे जल्द सुधारने की जरूरत है।

 

कार्यक्रम में कई बड़े नेता शामिल

इस कार्यक्रम में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय भी मौजूद थे। सभी ने बढ़ती आबादी वाले क्षेत्रों में न्यायिक ढांचे को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया।

 

रोहिणी जैसे इलाकों में बढ़ती आबादी को देखते हुए नए कोर्ट परिसर की जरूरत को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

 

न्याय व्यवस्था में बदलाव की दिशा

CJI सूर्यकांत के सुझाव यह दिखाते हैं कि न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में सोच बदली जा रही है। उनका फोकस सिर्फ कानूनी प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि लोगों के अनुभव और भावनाओं पर भी है।

 

अगर इन सुझावों को लागू किया जाता है, तो फैमिली कोर्ट का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है और यह लोगों के लिए ज्यादा आसान और भरोसेमंद बन सकता है।

 

निष्कर्ष:

फैमिली कोर्ट में सुधार की यह पहल न्याय व्यवस्था को ज्यादा संवेदनशील और मानवीय बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। खासकर बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए जो सुझाव दिए गए हैं, वे भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं।