पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा “Four Stars of Destiny” को लेकर देश में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। किताब अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन इसके कुछ हिस्सों के कथित तौर पर लीक होने और सोशल मीडिया पर घूमने के दावों ने मामला गरमा दिया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की है और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। साथ ही, रक्षा मंत्रालय भी भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नए दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है।
यह विवाद केवल एक किताब का नहीं है, बल्कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सेना के नियम और राजनीति-सभी जुड़े हुए हैं। आइए पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
रक्षा मंत्रालय बना रहा है नए नियम
जनरल नरवणे की किताब को लेकर उठे विवाद के बाद रक्षा मंत्रालय (MoD) अब स्पष्ट और विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है। ये नियम उन सैन्य अधिकारियों पर लागू होंगे जो सेवा में हैं या रिटायर हो चुके हैं और भविष्य में किताब लिखना चाहते हैं।
फिलहाल ऐसा कोई एक कानून नहीं है जो रिटायर सेना अधिकारियों द्वारा किताब लिखने को सीधे नियंत्रित करता हो। अलग-अलग नियम लागू होते हैं। लेकिन एक बात साफ है-राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी उजागर नहीं की जा सकती।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में एक बैठक हुई जिसमें नए नियमों पर प्रस्तुति दी गई। इन दिशा-निर्देशों में सेवा नियमों और ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ के प्रावधान शामिल किए जाएंगे। इसका मतलब है कि किसी भी पांडुलिपि को प्रकाशित करने से पहले मंजूरी की प्रक्रिया स्पष्ट की जाएगी।
रिटायर अधिकारियों पर क्या लागू होता है?
रिटायर होने के बाद कोई भी सेना अधिकारी आम नागरिक की तरह होता है, लेकिन ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ जीवन भर लागू रहता है। इसका अर्थ है कि वह किसी भी गोपनीय जानकारी, सैन्य अभियान, संवेदनशील दस्तावेज या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बात सार्वजनिक नहीं कर सकता।
यदि किसी किताब में ऑपरेशन, हथियारों की क्षमता, खुफिया जानकारी या विदेश संबंधों से जुड़ी संवेदनशील बातें हों, तो लेखक को रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लेनी होती है। संबंधित विभाग सामग्री की जांच करता है और फिर अनुमति देता है।
सेवा में मौजूद अधिकारियों के लिए नियम और सख्त हैं। उन्हें किसी भी साहित्यिक, राजनीतिक या कमाई वाले काम के लिए लिखित अनुमति लेनी होती है। यह अनुमति कमांड चेन के जरिए सेना मुख्यालय या मंत्रालय तक जाती है।
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डी.पी. पांडे ने कहा कि रिटायर होने के बाद व्यक्ति नागरिक तो हो जाता है, लेकिन गोपनीयता कानून लागू रहता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को समझदारी दिखानी चाहिए और वही लिखना चाहिए जो पहले से सार्वजनिक हो। यदि कोई सामग्री ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के दायरे में आती है, तो पहले मंजूरी जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी किताब में गलत या गैरकानूनी जानकारी हो, तो उससे निपटने के लिए कानून मौजूद है।
दिल्ली पुलिस की जांच
जनरल नरवणे की किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। 10 फरवरी 2026 को उन्होंने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (PRHI) के बयान का समर्थन किया, जिसमें कहा गया था कि किताब न तो छपी है और न ही डिजिटल रूप में जारी की गई है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि प्रकाशन के सभी अधिकार उसके पास हैं।
इसके बावजूद सोशल मीडिया और कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दावा किया गया कि किताब की प्री-प्रिंट पीडीएफ कॉपी सर्कुलेट हो रही है। इसी आधार पर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। रिपोर्ट्स के अनुसार, आपराधिक साजिश से जुड़ी धाराएं भी जोड़ी गई हैं।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बिना मंजूरी और बिना प्रकाशन के किताब की सामग्री कैसे बाहर आई। जांच इस बात पर भी है कि क्या टाइपसेट पीडीएफ कॉपी अवैध रूप से लीक हुई।
प्रकाशक का पक्ष
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने दो बार बयान जारी किया। पहले बयान में कहा गया कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है और न ही कोई कॉपी जारी की गई है। बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक और पोस्ट में कंपनी ने बताया कि प्री-ऑर्डर की घोषणा का मतलब यह नहीं होता कि किताब प्रकाशित हो गई है।
कंपनी ने यह भी साफ किया कि बिक्री के लिए किताब उपलब्ध नहीं है। सभी अधिकार प्रकाशक के पास हैं और अब तक कोई आधिकारिक वितरण नहीं हुआ।
राहुल गांधी का आरोप
इस मामले को लेकर संसद में भी हंगामा हुआ। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लोकसभा के बाहर कहा कि या तो जनरल नरवणे सच बोल रहे हैं या पेंगुइन। उन्होंने दावा किया कि नरवणे ने X पर पोस्ट किया था कि उनकी किताब उपलब्ध है।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि किताब में ऐसी बातें हैं जो सरकार के लिए असुविधाजनक हो सकती हैं। उन्होंने लोकसभा में किताब के अंश पढ़ने की कोशिश की, लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने अनुमति नहीं दी। इसके बाद सदन में हंगामा हुआ और आठ सांसदों को निलंबित कर दिया गया।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने दावा किया कि प्रकाशक ने दबाव में आकर अपना पोस्ट हटाया। हालांकि प्रकाशक ने कहा कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है।
किताब में क्या बताया गया?
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस किताब में 2020 में भारत-चीन के बीच लद्दाख सीमा पर हुई झड़पों का जिक्र है। 31 अगस्त 2020 की एक घटना का विवरण सामने आया है।
तारीख: 31 अगस्त, 2020
रात 8.15 बजे: भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को फोन पर जानकारी मिली कि चीन की पैदल सेना के समर्थन के साथ चार चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर जाती एक खड़ी पहाड़ी पगडंडी पर आगे बढ़ रहे हैं।
रात 8.15–8.30 बजे के बीच: लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को जानकारी दी। चीनी टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने चेतावनी के तौर पर एक रोशनी वाला गोला दागा, लेकिन इसका चीनी टैंकों पर कोई असर नहीं हुआ और वे आगे बढ़ते रहे।
रात 8.30 बजे के बाद: सेना प्रमुख नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से संपर्क कर स्पष्ट निर्देश मांगे।
रात 9.10 बजे: लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने फिर फोन किया। बताया गया कि चीनी टैंक अब दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर रह गए हैं।
रात 9.25 बजे: सेना प्रमुख नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को दोबारा फोन कर “स्पष्ट निर्देश” मांगे, लेकिन कोई फैसला नहीं मिला। इसी दौरान PLA कमांडर मेजर जनरल ल्यू लिन का संदेश आया, जिसमें तनाव कम करने का प्रस्ताव दिया गया-दोनों पक्ष आगे की गतिविधियां रोकें और अगले दिन सुबह 9.30 बजे स्थानीय कमांडरों की बैठक हो।
रात 10.00 बजे: नरवणे ने चीनी कमांडर का प्रस्ताव रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एनएसए अजित डोभाल तक पहुंचाया।
रात 10.10 बजे: नॉर्दर्न कमांड से फिर सूचना मिली कि चीनी टैंक नहीं रुके हैं और अब चोटी से सिर्फ 500 मीटर दूर हैं। जोशी ने बताया कि उन्हें रोकने का एकमात्र तरीका मीडियम आर्टिलरी से फायर खोलना है।
रात 10.10 बजे –10.30 बजे के बीच: सेना मुख्यालय में विकल्पों पर चर्चा होती रही। पूरा नॉर्दर्न फ्रंट हाई अलर्ट पर रखा गया।
रात 10.30 बजे: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वापस फोन किया और बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की है। प्रधानमंत्री का निर्देश सिर्फ एक वाक्य में था- जो उचित समझो, वो करो।नरवणे ने कहा, ‘यह पूरी तरह से एक सैन्य फैसला होने वाला था। मोदी से सलाह ली गई थी। उन्हें ब्रीफ किया गया था, लेकिन उन्होंने फैसला लेने से मना कर दिया था। अब पूरी जिम्मेदारी मुझ पर थी।’
सिविल सेवकों के लिए अलग नियम
सरकार ने 2021 में सिविल सेवकों के पेंशन नियमों में संशोधन किया था। इसके तहत खुफिया या सुरक्षा संगठनों से जुड़े रिटायर अधिकारी बिना मंजूरी अपने संगठन से संबंधित जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते। ऐसा करने पर उनकी पेंशन रोकी या वापस ली जा सकती है।
अब रक्षा मंत्रालय सेना अधिकारियों के लिए भी स्पष्ट प्रक्रिया तय करना चाहता है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने।
आगे क्या?
यह मामला अभी जांच के दायरे में है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि कथित पीडीएफ लीक कैसे हुई। वहीं रक्षा मंत्रालय नए दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है।
यह विवाद कई सवाल खड़े करता है-
- रिटायर सैन्य अधिकारी कितनी स्वतंत्रता से लिख सकते हैं?
- राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन कैसे बने?
- क्या राजनीतिक बयानबाजी से मामला और उलझा?
फिलहाल इतना तय है कि जब तक किताब को आधिकारिक मंजूरी नहीं मिलती, तब तक उसका प्रकाशन संभव नहीं है। आने वाले दिनों में जांच और नए नियम इस मामले की दिशा तय करेंगे।
