नए मलयालम भाषा विधेयक पर विवाद

हाल ही में, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केरल के प्रस्तावित मलयालम भाषा विधेयक, 2025 का कड़ा विरोध किया है, जिसमें कन्नड़ माध्यम के स्कूलों में मलयालम को प्राथमिक भाषा के रूप में अनिवार्य किया गया है। यह राज्य स्तरीय विधेयक अक्टूबर 2025 में केरल विधानसभा द्वारा पारित किया गया था और वर्तमान में केरल के राज्यपाल द्वारा समीक्षाधीन है।

Controversy over new Malayalam language bill

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • मलयालम भाषा विधेयक, 2025 राज्य के सभी औपचारिक कार्यों के लिए मलयालम को केरल की एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य सरकार के सभी विभाग, प्रशासनिक कार्यालय और सरकारी प्रक्रियाएं मूलतः मलयालम में संचालित होंगी। 
  • यह विधेयक संविधान के भाषा संबंधी अनुच्छेदों और आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 के अनुरूप तैयार किया गया है। इसके माध्यम से राज्य सरकार यह सुनिश्चित करती है कि मलयालम के उपयोग से संबंधित सभी प्रावधान केंद्र की अधिसूचनाओं और संवैधानिक मानकों का पालन करते हैं। 
  • विधेयक यह प्रावधान करता है कि राज्य में अंग्रेज़ी में जारी सभी अधिनियमों, नियमों, आदेशों और अध्यादेशों का निर्धारित समय-सीमा के भीतर मलयालम में अनुवाद अनिवार्य रूप से किया जाएगा। साथ ही, महत्वपूर्ण केंद्रीय व राज्य कानूनों का भी मलयालम अनुवाद उपलब्ध कराया जाएगा ताकि आम नागरिक कानूनों को उनकी भाषा में समझ सकें।
  • विधेयक के अनुसार, केरल के सभी सरकारी तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों में कक्षा 10 तक मलयालम को प्रथम भाषा के रूप में पढ़ाना अनिवार्य किया जाएगा। यह प्रावधान विद्यार्थियों में स्थानीय भाषा के प्रति जुड़ाव बढ़ाने और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने हेतु किया गया है। 
  • राज्य के भीतर सार्वजनिक सूचनाओं, सरकारी संचार, विज्ञापनों, लेबलिंग और शिलापट्टों में मलयालम भाषा के अनिवार्य प्रयोग का निर्देश दिया गया है। व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी उपभोक्ताओं के लिए आवश्यक सूचनाएँ मलयालम में उपलब्ध करानी होंगी।
  • विधेयक मलयालम के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और तकनीकी संसाधनों को बढ़ावा देने की योजना प्रस्तुत करता है। इसमें ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर निर्माण, यूनिकोड-आधारित फॉन्ट, मोबाइल एप्लिकेशन तथा आईटी समाधान विकसित करने पर जोर दिया गया है। 
  • विधेयक के अनुसार, राज्य सरकार की भाषा संबंधी इकाई का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग किया जाएगा। इसके साथ ही कार्यान्वयन की निगरानी के लिए मलयालम भाषा विकास निदेशालय की स्थापना का प्रस्ताव है। यह निकाय भाषा नीति, प्रचार, मानकीकरण और कार्यप्रणाली पर निरंतर निगरानी रखेगा।
  • विधेयक में एक महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल है, जिसके तहत तमिल और कन्नड़ भाषी समुदायों को उन अधिसूचित क्षेत्रों में अपनी भाषा में सरकारी पत्राचार करने का अधिकार दिया गया है। इसके अतिरिक्त, संबंधित विभाग भी उन्हीं भाषाओं में उत्तर प्रदान करेंगे।
  • जिन विद्यार्थियों की मातृभाषा मलयालम नहीं है, उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यचर्या के विकल्पों के अनुसार अपनी पसंद की भाषा चुनने की स्वतंत्रता मिलेगी। उच्च स्तर की परीक्षाओं में मलयालम का अध्ययन अनिवार्य नहीं होगा। यह प्रावधान बहुभाषी विद्यार्थियों के हितों को संतुलित रखने के लिए किया गया है।

 

मलयालम भाषा विधेयक पर विवाद

  • मलयालम भाषा विधेयक, 2025 के लागू होने के साथ ही कर्नाटक के कई नेताओं ने भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं। उनका तर्क है कि स्कूलों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाना उन विद्यार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन होगा जिनकी मातृभाषा कन्नड़ है। उनका कहना है कि शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में दाखिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में पढ़ने के अवसर की भी गारंटी देता है। 
  • विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष कासरगोड़ और मंजेश्वर जैसे सीमा जिले हैं, जहाँ कन्नड़ बोलने वाली आबादी का वर्षों से मजबूत आधार रहा है। आलोचकों का कहना है कि इन क्षेत्रों में पीढ़ियों से विद्यार्थी कन्नड़ माध्यम से शिक्षा प्राप्त करते आए हैं और वहाँ स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचा भी दोनों भाषाओं के सहअस्तित्व पर आधारित है। उनका मानना है कि इन जिलों में मलयालम को अनिवार्य बनाना भाषाई विविधता और स्थानीय शैक्षणिक परंपरा को कमजोर कर देगा।
  • कर्नाटक के मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं ने इस विधेयक को संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि यह नीति अनुच्छेद 29, 30, 350A और 350B के खिलाफ जाती है, जो भाषाई एवं सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा सुरक्षित रखने, अपनी भाषा में शिक्षा पाने और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध होने का अधिकार देते हैं। विरोधियों का कहना है कि इन प्रावधानों का उद्देश्य भारत की बहुभाषी पहचान को संरक्षित करना है और विधेयक इस संतुलन को प्रभावित करता है।
  • विधेयक का विरोध करने वाले नेताओं का यह भी मानना है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि पहचान और सम्मान का स्रोत है। उनके अनुसार, सीमा क्षेत्रों में कन्नड़ की सांस्कृतिक उपस्थिति को अनदेखा करना लोगों की सांस्कृतिक गरिमा और ऐतिहासिक निरंतरता को चुनौती देता है। 

 

इसी तरह का विवाद VB-G RAM G विधेयक पर 

  • VB-G RAM G, 2025 के लागू होने के साथ ही देशभर में चर्चा का केंद्र यह तथ्य रहा कि इस विधेयक ने लगभग बीस वर्षों से ग्रामीण रोज़गार की आधारशिला माने जाने वाले मनरेगा (MGNREGA) को पूरी तरह प्रतिस्थापित कर दिया। कई राज्यों ने कहा कि जिस कानून को ग्रामीण समाज ने अपने अधिकार और सुरक्षा के रूप में अपनाया था, उसका नाम बदलना केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक स्मृति और जनमानस को प्रभावित करने वाला कदम है।
  • तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के नेताओं ने विधेयक के नाम में मौजूद हिंदी और संस्कृत आधारित शब्दों पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कीं। उनका कहना है कि VB-G RAM G न तो सहज उच्चारण योग्य है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी भाषा सभी के लिए समझने योग्य है। तमिलनाडु के प्रतिनिधियों का तर्क है कि एक राष्ट्रीय कानून का नाम तटस्थ भाषा में होना चाहिए ताकि सभी राज्यों के ग्रामीण श्रमिक इसे सहजता से पहचान सकें, खासकर वे क्षेत्र जहाँ हिंदी सामान्यतः प्रयोग में नहीं आती।
  • नामकरण को लेकर असंतोष के बीच पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी ग्रामीण रोज़गार योजना का नाम “महात्मा श्री” रख दिया। यह कदम राज्य की सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया। 
  • विपक्ष के कई नेताओं ने महात्मा गांधी का नाम हटाने को नैतिक और ऐतिहासिक विरासत के साथ समझौता बताया। उनका कहना है कि मनरेगा में गांधी का नाम गाँवों में अधिकार-आधारित कल्याण, गरिमा और गरीबी उन्मूलन का प्रतीक था। इसे बदलकर वे इसे सरकार द्वारा ग्रामीण कल्याण के इतिहास को कम महत्व देने का प्रयास मानते हैं।
  • विवाद केवल भाषा तक सीमित नहीं है। विधेयक में वित्तीय ढाँचा बदलकर मजदूरी के भुगतान को 100% केंद्र से घटाकर 60:40 केंद्र-राज्य साझेदारी में कर दिया गया है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने कहा है कि इस बदलाव से राज्यों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। केरल ने अनुमान लगाया है कि यह बोझ ₹1,600 से ₹3,500 करोड़ तक पहुँच सकता है, जो राज्य के ग्रामीण विकास बजट को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।

 

आइए जानते हैं कि ये VB-G RAM G विधेयक क्या हैं?

  • विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 देश में ग्रामीण रोज़गार व्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से लाया गया है, जो पूर्व के मनरेगा, 2005 को प्रतिस्थापित करता है। यह कानून दिसंबर 2025 में संसद से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर चुका है। सरकार ने इसे विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक विकास लक्ष्य के साथ संरेखित करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आधुनिक कानूनी ढाँचा बनाया है।
  • विधेयक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 125 दिन के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी देता है। यह सीमा पहले की 100 दिनों की गारंटी से अधिक है। हालांकि, नया प्रावधान यह भी स्पष्ट करता है कि रोजगार केवल उन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध होगा जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो।
  • इस मिशन को केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में लागू किया जाएगा। सामान्य राज्यों के लिए 60:40 केंद्र–राज्य साझेदारी लागू की गई है, जबकि उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रखा गया है। बिना विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेशों का पूरा व्यय केंद्र सरकार वहन करेगी। पहली बार केंद्र ने राज्य-वार मानक आवंटन (Normative Allocation) प्रणाली को शामिल किया है।
  • कानून राज्यों को अधिकार देता है कि वे वित्तीय वर्ष में अधिकतम 60 दिनों तक रोजगार को अस्थायी रूप से रोक सकें। यह व्यवस्था बुआई और कटाई जैसे व्यस्त कृषि सत्रों के दौरान ग्रामीण श्रमिकों की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
  • विधेयक विकसित ग्राम पंचायत योजना (VGPP) को आधार बनाकर कार्य योजनाएँ तैयार करने का प्रावधान करता है। ग्राम सभाएँ इन योजनाओं को अनुमोदित करेंगी और इन्हें आगे विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक, पीएम गति शक्ति तथा अन्य राष्ट्रीय ढाँचों से जोड़ा जाएगा। कार्यों की प्राथमिकताएँ चार मुख्य क्षेत्रों पर केंद्रित हैं—जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजिविका आधारित ढाँचे, तथा आपदा न्यूनीकरण और जलवायु अनुकूलन कार्य
  • कानून प्रशासनिक निगरानी को सुदृढ़ बनाने के लिए कई डिजिटल उपकरण अनिवार्य करता है। इसमें बायोमेट्रिक उपस्थिति, कार्यस्थलों का जियो-टैगिंग, रियल-टाइम सार्वजनिक डैशबोर्ड और ग्राम सभाओं द्वारा नियमित सामाजिक ऑडिट जैसी तकनीकें शामिल हैं, जिनसे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
  • विधेयक केंद्र और राज्यों में ग्रामीण रोज़गार गारंटी परिषदों और स्टीयरिंग समितियों की स्थापना का प्रावधान करता है। ये निकाय नीतियों का समन्वय, प्रगति की समीक्षा, और कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों का समाधान सुनिश्चित करेंगे।

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