केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2026 को एक बड़ा आर्थिक फैसला लेते हुए 40 अहम पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर लगने वाली बेसिक कस्टम ड्यूटी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। यह छूट अस्थायी है और 30 जून 2026 तक लागू रहेगी। सरकार का कहना है कि यह कदम मौजूदा वैश्विक हालात, खासकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई चेन में आई बाधाओं को देखते हुए उठाया गया है। इस फैसले से सरकारी खजाने पर करीब 1,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, लेकिन इसका मकसद घरेलू उद्योगों को राहत देना और उत्पादन लागत को नियंत्रित करना है।
क्यों उठाना पड़ा यह कदम?
हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और उससे बनने वाले रसायनों की कीमतों में तेजी देखी गई है। इसका मुख्य कारण वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन में व्यवधान है। भारत जैसे देश, जो पेट्रोकेमिकल उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, वहां इन कीमतों का सीधा असर उद्योगों पर पड़ता है। सरकार का मानना है कि अगर कच्चा माल महंगा होगा, तो उत्पादन लागत बढ़ेगी और अंत में इसका असर आम लोगों पर पड़ेगा।
इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह फैसला लिया है ताकि उद्योगों को जरूरी कच्चा माल सस्ता मिले और उत्पादन में रुकावट न आए।

किन-किन प्रोडक्ट्स को मिली राहत?
सरकार ने जिन 40 उत्पादों पर ड्यूटी खत्म की है, उनमें कई जरूरी रसायन और इंटरमीडिएट शामिल हैं। इनमें एनहाइड्रस अमोनिया, एसीटिक एसिड, मेथनॉल, टोल्यून, स्टाइरीन, विनाइल क्लोराइड जैसे केमिकल्स प्रमुख हैं। इसके अलावा मोनोएथिलीन ग्लाइकोल (MEG), फिनॉल और प्यूरीफाइड टेरेफ्थेलिक एसिड (PTA) जैसे इंटरमीडिएट्स भी शामिल हैं।
पॉलिमर कैटेगरी में पॉलीथीन, पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीस्टाइरीन, पीवीसी और पीईटी चिप्स जैसे उत्पादों को भी इस छूट का फायदा मिलेगा। साथ ही एबीएस और पॉलीकार्बोनेट जैसे इंजीनियरिंग प्लास्टिक भी अब सस्ते आयात किए जा सकेंगे।

किन सेक्टर्स को मिलेगा सीधा फायदा?
इस फैसले का असर कई बड़े उद्योगों पर देखने को मिलेगा। सबसे ज्यादा फायदा उन सेक्टर्स को होगा जो इन पेट्रोकेमिकल उत्पादों का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में करते हैं।
- टेक्सटाइल सेक्टर: कपड़ा उद्योग में PTA और MEG का उपयोग होता है। इनके सस्ते होने से कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग लागत घटेगी।
- ऑटोमोबाइल सेक्टर: गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पार्ट्स और कंपोनेंट्स सस्ते बनेंगे।
- फार्मा सेक्टर: दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वैंट्स और केमिकल्स की लागत कम होगी।
- प्लास्टिक और पैकेजिंग: रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें जैसे पैकेजिंग मटेरियल और प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण रहेगा।
आम जनता पर क्या होगा असर?
जब उद्योगों की लागत कम होती है, तो उसका असर अंतिम उत्पादों की कीमत पर भी पड़ता है। जानकारों का मानना है कि इस फैसले से बाजार में महंगाई को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। खासतौर पर पैकेजिंग, प्लास्टिक सामान और कपड़ों की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी रुक सकती है।
हालांकि, यह असर तुरंत नहीं दिखेगा, लेकिन आने वाले महीनों में कीमतों की स्थिरता देखने को मिल सकती है।
सरकार का उद्देश्य क्या है?
सरकार ने साफ किया है कि यह कदम पूरी तरह से अस्थायी है और मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया गया है। मुख्य उद्देश्य यह है कि उद्योगों को कच्चे माल की कमी न हो और वे बिना किसी रुकावट के उत्पादन जारी रख सकें।
साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि बढ़ती वैश्विक कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न पड़े। सरकार लगातार अंतरराष्ट्रीय हालात पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर आगे भी ऐसे कदम उठा सकती है।
पेट्रोकेमिकल इंटरमीडिएट क्या होते हैं?
सरल भाषा में समझें तो कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस से जो बेसिक केमिकल्स निकलते हैं, उन्हें प्रोसेस करके इंटरमीडिएट बनाए जाते हैं। ये सीधे इस्तेमाल नहीं होते, बल्कि इनके जरिए आगे प्लास्टिक, फाइबर, पेंट और दवाएं तैयार की जाती हैं। इसलिए इनका उद्योगों में बहुत अहम रोल होता है।
भारत इन उत्पादों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, खासकर पश्चिम एशिया के देशों से।
इंपोर्ट ड्यूटी क्या होती है?
इंपोर्ट ड्यूटी वह टैक्स है जो किसी देश में बाहर से आने वाले सामान पर लगाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दो होता है – पहला, सरकार के लिए राजस्व जुटाना और दूसरा, घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना।
कभी-कभी सरकारें किसी खास स्थिति में, जैसे कि महंगाई या सप्लाई की कमी, इस ड्यूटी को कम या खत्म कर देती हैं ताकि जरूरी सामान सस्ते में उपलब्ध हो सके।
आगे क्या हो सकता है?
सरकार ने फिलहाल इस छूट की समयसीमा 30 जून 2026 तय की है। लेकिन यह पूरी तरह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा कि इसे आगे बढ़ाया जाएगा या नहीं। अगर वैश्विक हालात सुधरते हैं, तो ड्यूटी फिर से लागू की जा सकती है। वहीं, अगर संकट जारी रहता है, तो सरकार राहत को बढ़ा भी सकती है।
कुल मिलाकर, यह फैसला उद्योगों के लिए राहत भरा है और इससे अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

