कुत्तों के काटने से होने वाले रेबीज से होने वाली मौतों को समाप्त करने के लिए, दिल्ली सरकार महामारी रोग अधिनियम के तहत मानव रेबीज को अधिसूचित रोग घोषित करने जा रही है। इस आदेश का उद्देश्य चिकित्सा सेवाओं को सुव्यवस्थित करना और रेबीज के रुझानों पर नज़र रखना है ताकि शहर को रेबीज मुक्त बनाया जा सके।
दिल्ली सरकार की रेबीज को अधिसूचित रोग घोषित करने की पहल
- दिल्ली सरकार ने मानव रेबीज को औपचारिक रूप से अधिसूचित रोग (Notifiable Disease) घोषित करने की योजना बनाई है। यह निर्णय महामारी रोग अधिनियम, 1897 के अंतर्गत लिया गया है। इस कदम के बाद रेबीज के संदिग्ध, संभावित और पुष्टि किए गए सभी मामलों की जानकारी बिना देरी के स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुँचाना अनिवार्य हो गया है।
- अधिसूचना लागू होने के बाद सरकारी और निजी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, क्लीनिक और व्यक्तिगत चिकित्सक सभी को रेबीज के हर मामले की रिपोर्ट तयशुदा स्वास्थ्य प्राधिकरण को करनी होगी। यह प्रावधान राज्य को रोग की वास्तविक स्थिति का आकलन करने, समय पर हस्तक्षेप करने और नीति-निर्माण को मजबूत करने में मदद करेगा।
- महामारी रोग अधिनियम, 1897 राज्य सरकार को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे रोग को अधिसूचित कर सके जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। रेबीज को इस श्रेणी में शामिल करना यह दर्शाता है कि सरकार इसे केवल पशुजन्य समस्या नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में देख रही है।
- इस अधिसूचना के साथ दिल्ली ने अपने रोकथाम और उपचार तंत्र को भी मजबूत किया है। वर्ष 2026 की शुरुआत तक एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) सभी 11 जिलों में स्थित 59 स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध कराई गई है। इसके साथ ही रेबीज इम्युनोग्लोब्युलिन (RIG) की सुविधा 33 चिन्हित अस्पतालों और केंद्रों में दी जा रही है।
- अधिसूचना के साथ ही दिल्ली सरकार राज्य रेबीज उन्मूलन कार्य योजना (SAPRE) को अंतिम रूप दे रही है। इस योजना में स्थानीय निकायों, पशुपालन विभाग, और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय शामिल है। इसका उद्देश्य केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि कुत्तों के टीकाकरण, आवारा पशु प्रबंधन और समुदाय में जागरूकता बढ़ाकर रेबीज के मूल कारणों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।
रेबीज क्या है: कारण, लक्षण और रोकथाम
- परिभाषा: रेबीज एक अत्यंत गंभीर वायरल रोग है जो मनुष्यों सहित सभी स्तनधारी जीवों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। यह रोग रेबीज वायरस के कारण होता है, जो लिस्सावायरस (Lyssavirus) वंश से संबंधित है। यह वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी तक पहुँचता है और धीरे-धीरे तंत्रिका कार्यों को नष्ट करता है। एक बार लक्षण प्रकट होने के बाद यह रोग हमेशा घातक सिद्ध होता है, इसलिए इसे विश्व के सबसे खतरनाक संक्रामक रोगों में गिना जाता है।
- संक्रमण के प्रमुख मार्ग: रेबीज का संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों की लार के माध्यम से फैलता है। भारत में कुत्ते के काटने से 95 प्रतिशत से अधिक मानव रेबीज के मामले सामने आते हैं। इसके अलावा चमगादड़, बिल्ली, लोमड़ी और बंदर जैसे अन्य स्तनधारी भी इस वायरस के वाहक हो सकते हैं।
- ऊष्मायन अवधि: रेबीज की ऊष्मायन अवधि सामान्यतः 1 से 3 महीने के बीच होती है, लेकिन यह अवधि कई कारकों पर निर्भर करती है। काटने की जगह, घाव की गहराई और शरीर में पहुँचे वायरस की मात्रा इस अवधि को प्रभावित करती है। कुछ मामलों में लक्षण केवल एक सप्ताह में दिखाई दे सकते हैं, जबकि कुछ दुर्लभ स्थितियों में यह अवधि एक वर्ष तक भी बढ़ सकती है।
- नैदानिक लक्षण: रेबीज के शुरुआती लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे लगते हैं। इनमें बुखार, सिरदर्द, थकान और कमजोरी शामिल हैं। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, न्यूरोलॉजिकल लक्षण उभरने लगते हैं। रोगी में बेचैनी, घबराहट, भ्रम और मतिभ्रम दिखाई देते हैं। इस रोग की पहचान करने वाले प्रमुख संकेत हैं हाइड्रोफोबिया (पानी से डर) और एरोफोबिया (हवा से डर), जो तंत्रिका तंत्र के गंभीर रूप से प्रभावित होने का संकेत देते हैं।
- निदान की जटिलता: रेबीज का निदान जीवित रोगी में बहुत कठिन होता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अन्य तंत्रिका रोगों से मिलते-जुलते हैं। विश्व स्तर पर पुष्टि के लिए मृत्यु के बाद मस्तिष्क ऊतक की जांच की जाती है। इसमें डायरेक्ट फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी टेस्ट को स्वर्ण मानक माना जाता है, जो वायरस की उपस्थिति की सटीक पहचान करता है।
- उपचार और रोकथाम: रेबीज का सबसे भयावह पहलू यह है कि लक्षण प्रकट होने के बाद इसका कोई प्रभावी इलाज नहीं है। हालांकि, समय पर पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) लेने से रोग को पूरी तरह रोका जा सकता है। इसमें घाव की तुरंत और अच्छी तरह सफाई, एंटी-रेबीज वैक्सीन का पूरा कोर्स और आवश्यकता होने पर रेबीज इम्युनोग्लोब्युलिन (RIG) का उपयोग शामिल है। सही समय पर उपचार ही रेबीज से जीवन बचाने का एकमात्र विश्वसनीय उपाय है।
रेबीज को अधिसूचित रोग घोषित करने के प्रमुख कारण
- रेबीज ऐसा रोग है जिसमें लक्षण प्रकट होने के बाद मृत्यु लगभग निश्चित होती है, जबकि समय पर रोकथाम से इसे पूरी तरह टाला जा सकता है। भारत में हर वर्ष अनुमानित 18,000 से 20,000 लोगों की मृत्यु रेबीज से होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में होने वाली कुल रेबीज मौतों में से लगभग 36 प्रतिशत भारत में होती हैं।
- अब तक रेबीज को अधिसूचित रोग न बनाए जाने के कारण इसके मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग नहीं होती थी। कई मौतें घरों या निजी अस्पतालों में हो जाती थीं और सरकारी रिकॉर्ड तक नहीं पहुँचती थीं। एक RTI के माध्यम से यह सामने आया कि 2022 से 2024 के बीच दिल्ली में कम से कम 18 लोगों की मृत्यु रेबीज से हुई, जबकि आधिकारिक बयान में शून्य मौतों का दावा किया गया था।
- भारत ने 2030 तक कुत्तों से फैलने वाले रेबीज से शून्य मानव मृत्यु का लक्ष्य अपनाया है। यह लक्ष्य 2018 में WHO द्वारा निर्धारित वैश्विक ढांचे के अनुरूप है। दिल्ली सरकार का यह निर्णय इसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।
- दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में मानव और जानवरों का संपर्क अधिक है। 2025 में MCD के आंकड़ों के अनुसार, शहर में 35,000 से अधिक पशु काटने के मामले और 49 रेबीज मामलों की रिपोर्ट सामने आई। नसबंदी अभियानों के बावजूद स्ट्रीट डॉग आबादी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
- रेबीज से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय समय पर पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) है। कई मामलों में पीड़ित जागरूकता या सुविधा की कमी के कारण इलाज में देरी कर देते हैं। रेबीज नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम और पशुपालन सेवाओं के बीच समन्वय आवश्यक है।
- WHO के अनुसार, भारत में रेबीज से होने वाली मौतों में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे होते हैं। शहरी गरीब समुदायों में जोखिम अधिक रहता है। चूँकि रेबीज एक ज़ूनोटिक रोग है, इसकी निगरानी को मजबूत करना भविष्य में अन्य पशु-जनित बीमारियों से निपटने की क्षमता भी बढ़ाता है।
भारत में रेबीज रोकथाम प्रयासों की वर्तमान स्थिति
- भारत में रेबीज रोकथाम के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) संचालित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। इसके प्रमुख कार्यों में जन-जागरूकता अभियान, प्राथमिक उपचार की जानकारी, घाव की सही सफाई के तरीके और टीकाकरण सेवाओं की निगरानी शामिल है।
- कार्यक्रम के अंतर्गत एक समर्पित रेबीज हेल्पलाइन नंबर 15400 भी संचालित किया जा रहा है। यह हेल्पलाइन आम नागरिकों को उनके नजदीकी स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) और रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) की उपलब्धता की जानकारी देती है। दिल्ली सहित कई भागीदार राज्यों में यह सेवा सक्रिय है।
- पिछले लगभग दो दशकों में भारत में रेबीज उपचार व्यवस्था में बड़ा सुधार देखने को मिला है। अब WHO द्वारा स्वीकृत आधुनिक पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) अधिकांश बड़े अस्पतालों और कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध है। इससे पहले जहाँ इलाज सीमित था, अब वहाँ मानक प्रोटोकॉल के अनुसार सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन का उपयोग हो रहा है, जिससे मृत्यु दर को कम करने में सहायता मिली है।
- कई नगर निगम और शहरी निकाय नियमित रूप से आवारा और पालतू कुत्तों के रेबीज टीकाकरण अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों में नगर प्रशासन, पशुपालन विभाग और पशु चिकित्सा टीमें मिलकर काम करती हैं। कैच-न्यूटर-वैक्सीनेट-रिलीज (CNVR) मॉडल को कई शहरों में अपनाया गया है। उदाहरण के तौर पर, त्रिची जैसे शहरों में हजारों आवारा कुत्तों की नसबंदी के साथ बूस्टर डोज भी दी गई हैं।
- रेबीज रोकथाम में जन-जागरूकता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हर वर्ष विश्व रेबीज दिवस (28 सितंबर) के आसपास विशेष अभियान चलाए जाते हैं। इन अभियानों में लोगों को पशु काटने से बचाव, घाव की तुरंत सफाई और बिना देरी चिकित्सा सहायता लेने के महत्व के बारे में बताया जाता है। निरंतर जागरूकता से ही रेबीज उन्मूलन के लक्ष्य को वास्तविकता में बदला जा सकता है।
