Delhi Police AI Surveillance : दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हजारों छात्रों और प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence-AI), फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (Facial Recognition Technology-FRT), बॉडी-वॉर्न कैमरे, मोबाइल सर्विलांस वैन और अन्य हाईटेक उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर नया कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। इस पूरे मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें दावा किया गया है कि प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी उनके निजता के अधिकार (Right to Privacy) और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार का कहना है कि यह निगरानी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने, भीड़ प्रबंधन और संभावित अपराधियों की पहचान के लिए की जा रही है। इसी मुद्दे ने अब देश में पुलिस निगरानी, नागरिक स्वतंत्रता और नई तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।

आखिर विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
यह मामला तब सामने आया जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (JNUSU) की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि 20 जून से जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस लगातार निगरानी कर रही है।
याचिका के अनुसार, पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर स्थायी निगरानी टावर (Permanent Observation Tower), फोटोग्राफर, वीडियोग्राफर और AI आधारित निगरानी उपकरण तैनात किए हैं। दावा किया गया कि प्रदर्शनकारियों को केवल विरोध प्रदर्शन के दौरान ही नहीं बल्कि खाना खाते समय, आराम करते हुए और चिकित्सा सहायता लेते समय भी रिकॉर्ड किया जा रहा है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ पुलिसकर्मियों ने छात्रों को चेतावनी दी कि उनकी तस्वीरें और वीडियो उनके माता-पिता तथा शिक्षण संस्थानों को भेजे जा सकते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है और लोकतांत्रिक असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
महिला प्रदर्शनकारियों को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। याचिका में कहा गया कि भारी बारिश के दौरान पर्याप्त आश्रय नहीं होने के कारण कई महिलाएं भीगे कपड़ों में ही प्रदर्शन स्थल पर रहीं, लेकिन उनकी रिकॉर्डिंग जारी रही। याचिकाकर्ता ने इसे महिलाओं की गरिमा, शारीरिक निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का गंभीर उल्लंघन बताया है।

दिल्ली पुलिस का पक्ष क्या है?
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लंबे समय से अपनाई जा रही सामान्य पुलिस प्रक्रिया है।
सरकार का कहना है कि सार्वजनिक स्थान पर आयोजित प्रदर्शन में निजता का दावा सीमित हो जाता है, क्योंकि प्रदर्शनकारी स्वयं भी अपने वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। केंद्र ने याचिका को “Luxury Litigation” बताते हुए कहा कि पुलिस का उद्देश्य केवल सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना है।
हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि क्या प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस की कार्रवाई के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure-SOP) मौजूद है। अदालत ने इस संबंध में जानकारी मांगी है और मामले की अगली सुनवाई तय की है।
जंतर-मंतर पर कौन-कौन सी तकनीक इस्तेमाल हो रही है?
पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली पुलिस ने अपने AI आधारित निगरानी नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया है। जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के दौरान भी कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इनमें AI सक्षम CCTV कैमरे, Facial Recognition Technology, Automatic Number Plate Recognition (ANPR), भीड़ की घनत्व निगरानी (Crowd Density Monitoring), Hand Gesture Recognition, बॉडी-वॉर्न कैमरे, मोबाइल सर्विलांस वैन और मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल वाहन शामिल हैं।
प्रदर्शन स्थल से सामने आए कुछ वीडियो और तस्वीरों में कुछ पुलिसकर्मी Meta Smart Glasses पहने भी दिखाई दिए। हालांकि दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन स्मार्ट ग्लासेज़ का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा था।
‘इक्षणा’ सर्विलांस वैन क्या है?
प्रदर्शन स्थल पर जिन तकनीकों ने सबसे अधिक ध्यान खींचा, उनमें ‘इक्षणा’ (Ikshana) मोबाइल सर्विलांस वाहन भी शामिल है। यह वाहन वर्ष 2023 में G20 शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली पुलिस के बेड़े में शामिल किया गया था।

इस वाहन में आठ कैमरे लगे हैं, जो 360 डिग्री तक निगरानी कर सकते हैं। इसमें AI आधारित Facial Recognition Software लगा है, जो लाइव वीडियो फीड का विश्लेषण करता है।
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह सॉफ्टवेयर कैमरों से प्राप्त चेहरों की तुलना पुलिस के डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्ड से करता है ताकि किसी ज्ञात अपराधी की पहचान की जा सके।
हाल ही में प्रदर्शन के दौरान हुई झड़पों के बाद भी दिल्ली पुलिस ने कहा कि AI कैमरों की रिकॉर्डिंग के आधार पर हिंसा में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में विभिन्न थानों में कुल 10 FIR दर्ज की गई हैं।
प्रदर्शनकारी क्यों जता रहे हैं चिंता?
प्रदर्शन में शामिल कई छात्रों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि लगातार निगरानी के कारण वे असहज महसूस कर रहे हैं। कुछ छात्रों ने अपना चेहरा ढंकना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि उनकी पहचान सरकारी एजेंसियों के रिकॉर्ड में दर्ज हो सकती है।
कुछ अभ्यर्थियों ने यह भी कहा कि वे प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि यदि उनके प्रदर्शन में शामिल होने की तस्वीरें सरकारी रिकॉर्ड या संस्थानों तक पहुंचती हैं, तो भविष्य में इसका असर पड़ सकता है।
एक और चिंता रिकॉर्ड किए गए डेटा को लेकर है। पुलिस अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि रिकॉर्डिंग कितने समय तक सुरक्षित रखी जाएगी, इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं है। यदि किसी जांच में आवश्यकता होती है, तो फुटेज लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी कारण प्रदर्शनकारी डेटा सुरक्षा और संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
दिल्ली पुलिस का AI निगरानी नेटवर्क कितना बड़ा है?
दिल्ली पुलिस देश के सबसे बड़े AI आधारित सार्वजनिक निगरानी नेटवर्क में से एक संचालित करती है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 25,000 CCTV कैमरे इस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। इनमें 15,000 से अधिक पहले से स्थापित कैमरों को एकीकृत किया जा चुका है, जबकि हाल के चरण में 2,100 नए AI सक्षम कैमरे भी जोड़े गए हैं।
यह पूरा नेटवर्क केवल दिल्ली पुलिस के कैमरों तक सीमित नहीं है। इसमें Safe City Project, दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) और भारतीय रेलवे के कई कैमरों की वीडियो फीड भी शामिल की गई है। इन सभी कैमरों की निगरानी दिल्ली पुलिस मुख्यालय स्थित Integrated Command, Control, Communication and Computer Centre (C4I) से की जाती है।
AI प्लेटफॉर्म चेहरे की पहचान, भीड़ का विश्लेषण, हाथ के संकेतों की पहचान और वाहन नंबर प्लेट पहचान जैसी कई सुविधाओं के साथ काम करता है।
फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है?
फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी किसी व्यक्ति के चेहरे की तस्वीर या लाइव वीडियो से चेहरे की विशेषताओं का विश्लेषण करती है। इसके बाद इन विशेषताओं को डिजिटल बायोमेट्रिक टेम्पलेट में बदला जाता है और पुलिस डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से तुलना की जाती है।

यदि दोनों के बीच समानता एक तय सीमा से अधिक होती है, तो सिस्टम संभावित मिलान (Potential Match) दिखाता है। इसके बाद अंतिम पुष्टि मानव अधिकारी द्वारा की जाती है।
2022 में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दिल्ली पुलिस ने बताया था कि लगभग 80 प्रतिशत समानता (Similarity Score) मिलने पर सिस्टम किसी चेहरे को संभावित मिलान मानता है।
चेहरे की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला डेटा कहां से आता है?
दिल्ली पुलिस के फेसियल रिकग्निशन सिस्टम में कितने लोगों का डेटा मौजूद है, इसकी आधिकारिक संख्या सार्वजनिक नहीं है। अलग-अलग समय पर जारी सरकारी बयानों में यह संख्या लगभग 20 हजार से लेकर 3.5 लाख तक बताई गई है।
साल 2019 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दिल्ली पुलिस कई अलग-अलग फेसियल रिकग्निशन डेटाबेस का इस्तेमाल करती है। इनमें एक डेटाबेस में डेढ़ लाख से अधिक हिस्ट्रीशीटरों की तस्वीरें थीं, जबकि दूसरे में संदिग्ध आतंकवादियों का रिकॉर्ड शामिल था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक अलग डेटाबेस प्रदर्शनों के दौरान जुटाई गई तस्वीरों के आधार पर तैयार किया गया था। हालांकि इन डेटाबेस के आकार, निर्माण प्रक्रिया और नियमित ऑडिट को लेकर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि नागरिक अधिकार संगठनों ने इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
भारत में फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी को लेकर कानून क्या कहता है?
भारत में अभी तक ऐसा कोई अलग कानून नहीं है, जो विशेष रूप से Facial Recognition Technology (FRT) के इस्तेमाल को नियंत्रित करता हो।
हालांकि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP Act) व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का एक सामान्य ढांचा उपलब्ध कराता है, लेकिन इसमें सार्वजनिक स्थानों पर बायोमेट्रिक निगरानी के लिए अलग नियम नहीं बनाए गए हैं। इसके अलावा इस कानून में सरकारी एजेंसियों को कई परिस्थितियों में व्यापक छूट भी दी गई है। संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून द्वारा अधिकृत सरकारी कार्यों से जुड़े मामलों में सरकारी एजेंसियां व्यक्तिगत डेटा का उपयोग कर सकती हैं।
इसी कारण अभी यह स्पष्ट कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है कि प्रदर्शन स्थलों से जुटाए गए चेहरे संबंधी डेटा को कितने समय तक रखा जा सकता है, कौन उसे देख सकता है, उसका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है और उसके दुरुपयोग की स्थिति में नागरिकों के पास क्या कानूनी विकल्प होंगे।
गृह मंत्रालय ने पहले संसद में बताया था कि दिल्ली पुलिस का फेसियल रिकग्निशन कार्यक्रम 9 जून 2022 को जारी एक आदेश के तहत संचालित होता है, जिसका उद्देश्य “संदिग्ध व्यक्तियों और ज्ञात अपराधियों” की पहचान करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर क्या कहा है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में भारतीय संविधान के तीन महत्वपूर्ण अधिकार हैं। पहला, अनुच्छेद 14 के तहत समानता और मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा का अधिकार। दूसरा, अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार। तीसरा, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें निजता (Privacy) और गरिमा (Dignity) भी शामिल हैं।
साल 2017 में जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India) मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया था।
अदालत ने कहा था कि यदि सरकार किसी व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप करती है तो उसे तीन शर्तों पर खरा उतरना होगा। पहली, उस कार्रवाई के लिए स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए। दूसरी, उसका उद्देश्य वैध और सार्वजनिक हित से जुड़ा होना चाहिए। तीसरी, उठाया गया कदम उस उद्देश्य के अनुपात में होना चाहिए और उससे कम दखल देने वाला कोई अन्य प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं होना चाहिए।
याचिकाकर्ता का दावा है कि जंतर-मंतर पर की जा रही व्यापक निगरानी इन मानकों पर खरी नहीं उतरती।
इससे पहले Malak Singh v. State of Punjab & Haryana मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुलिस निगरानी मनमानी नहीं हो सकती और उसका इस्तेमाल मौलिक अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।
डिजिटल अधिकार संगठनों की आपत्ति क्या है?
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) सहित कई डिजिटल अधिकार संगठनों का कहना है कि दिल्ली पुलिस ने Facial Recognition Technology लागू करने से पहले किसी स्वतंत्र Privacy Impact Assessment का आयोजन नहीं किया।
संगठनों का तर्क है कि Safe City Project सहित बड़े निगरानी नेटवर्क शुरू करने से पहले नागरिकों की निजता पर उसके प्रभाव का मूल्यांकन होना चाहिए था। उनका कहना है कि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि निगरानी से जुड़ा डेटा किस तरह सुरक्षित रखा जाता है, उसका स्वतंत्र ऑडिट कौन करता है और नागरिक गलत पहचान या डेटा के दुरुपयोग की स्थिति में किस प्रक्रिया के तहत शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
दूसरे देशों में Facial Recognition को कैसे नियंत्रित किया जाता है?
दुनिया के अलग-अलग देशों ने Facial Recognition Technology को लेकर अलग-अलग नीतियां अपनाई हैं।
यूरोपीय संघ (European Union) ने AI Act लागू किया है, जो फरवरी 2025 से प्रभावी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा रियल-टाइम फेसियल रिकग्निशन के इस्तेमाल पर सामान्य रूप से रोक है। केवल कुछ सीमित परिस्थितियों, जैसे अपहृत बच्चों या लापता व्यक्तियों की तलाश अथवा आसन्न आतंकवादी खतरे को रोकने के मामलों में, न्यायिक या स्वतंत्र प्रशासनिक अनुमति के बाद इसका उपयोग किया जा सकता है।
स्वीडन में भी रियल-टाइम फेसियल रिकग्निशन केवल गंभीर अपराधों, आतंकवाद और लापता व्यक्तियों से जुड़े मामलों में अभियोजन पक्ष की पूर्व अनुमति के बाद ही संभव है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में इस तकनीक को लेकर कोई एक समान राष्ट्रीय कानून नहीं है। कुछ राज्यों और शहरों ने पुलिस द्वारा इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है, जबकि कुछ स्थानों पर न्यायिक या विधायी निगरानी के साथ इसकी अनुमति दी गई है।
यूनाइटेड किंगडम में पुलिस द्वारा लाइव फेसियल रिकग्निशन का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है। वहीं चीन दुनिया के सबसे बड़े फेसियल रिकग्निशन निगरानी नेटवर्क का संचालन करने वाले देशों में शामिल है।
आगे अदालत में किन सवालों पर होगी सुनवाई?
दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सार्वजनिक स्थानों पर AI आधारित निगरानी और Facial Recognition Technology का वर्तमान इस्तेमाल संविधान के अनुरूप है।
अदालत यह भी देखेगी कि क्या दिल्ली पुलिस के पास प्रदर्शन स्थलों पर निगरानी के लिए कोई स्पष्ट Standard Operating Procedure (SOP) है, क्या निगरानी की सीमा तय है और क्या डेटा संग्रह, संरक्षण तथा उपयोग के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
यह मामला केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है। अदालत का फैसला भविष्य में देशभर में पुलिस द्वारा AI आधारित निगरानी और बायोमेट्रिक तकनीकों के इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मानक तय कर सकता है।
FAQ
- जंतर-मंतर AI निगरानी विवाद क्या है?
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की AI आधारित निगरानी, Facial Recognition Technology और अन्य उपकरणों के जरिए लगातार रिकॉर्डिंग की जा रही है, जिससे निजता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। - दिल्ली पुलिस कौन-कौन सी तकनीक का इस्तेमाल कर रही है?
दिल्ली पुलिस AI सक्षम CCTV कैमरे, Facial Recognition Technology, Automatic Number Plate Recognition (ANPR), Crowd Density Monitoring, Body-Worn Cameras, Mobile Surveillance Vans, Mobile Command Vehicles और कुछ मामलों में Meta Smart Glasses का उपयोग कर रही है। - क्या भारत में Facial Recognition Technology के लिए अलग कानून है?
नहीं। भारत में अभी Facial Recognition Technology को नियंत्रित करने वाला कोई अलग कानून नहीं है। फिलहाल DPDP Act, 2023 व्यक्तिगत डेटा संरक्षण का सामान्य ढांचा देता है, लेकिन सार्वजनिक बायोमेट्रिक निगरानी के लिए अलग प्रावधान नहीं हैं। - सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर क्या कहा है?
2017 के पुट्टस्वामी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना और कहा कि सरकार का कोई भी हस्तक्षेप कानूनी आधार, वैध उद्देश्य और अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। - दूसरे देशों में Facial Recognition Technology कैसे नियंत्रित होती है?
यूरोपीय संघ ने AI Act के तहत सार्वजनिक स्थानों पर लाइव फेसियल रिकग्निशन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन और चीन में इसके उपयोग के लिए अलग-अलग नियम और नीतियां लागू हैं। - इस मामले का आगे क्या महत्व है?
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला भविष्य में भारत में पुलिस द्वारा AI आधारित निगरानी, Facial Recognition Technology और नागरिकों की निजता से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी दिशा तय कर सकता है।

