बैंकिंग और ऋण प्रबंधन सुदृढ़ीकरण के लिए दिल्ली-आरबीआई के बीच समझौता ज्ञापन

हाल ही में, दिल्ली सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके राष्ट्रीय राजधानी को आरबीआई के व्यापक बैंकिंग और ऋण प्रबंधन ढांचे के अंतर्गत लाकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जो वित्तीय अनुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

Delhi-RBI MoU for strengthening banking and credit management

दिल्ली–आरबीआई समझौते के प्रमुख बिंदु

  • दिल्ली सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के बीच हुए बैंकिंग एवं ऋण प्रबंधन ढांचा (MoU) के माध्यम से राजधानी को एक स्पष्ट और पेशेवर वित्तीय व्यवस्था प्रदान की गई है। इस समझौते के तहत आरबीआई दिल्ली सरकार का आधिकारिक बैंकर बन जाएगा। अब सरकार से जुड़े सभी रसीद, भुगतान और वित्तीय लेन-देन सीधे रिज़र्व बैंक की प्रणालियों के माध्यम से संचालित होंगे। 
  • आरबीआई इस ढांचे के तहत दिल्ली सरकार के खाते तैयार करने, भुगतान निपटाने और रसीदों की निगरानी जैसे सभी सामान्य बैंकिंग कार्यों को संभालेगा। इसके साथ ही, वित्तीय वर्ष के दौरान सरकार की आय, व्यय और नकद शेष का व्यवस्थित ट्रैकिंग भी रिज़र्व बैंक की विशेषज्ञ टीम द्वारा की जाएगी। 
  • समझौते के तहत दिल्ली सरकार को अब स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDLs) जारी करके खुले बाज़ार से संसाधन जुटाने का अधिकार मिलेगा। ये ऋण साधन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा आरबीआई की निगरानी में जारी किए जाते हैं। सामान्यतः इन पर लगभग 7 प्रतिशत की लागत आती है। 
  • पहले सरकार के पास बड़ी राशि निष्क्रिय नकद शेष के रूप में पड़ी रहती थी, जिस पर कोई ब्याज नहीं मिलता था। नए ढांचे में आरबीआई इन धनराशियों को प्रतिदिन स्वचालित रूप से निवेश करेगा, जिससे सरकार को अतिरिक्त ब्याज आय प्राप्त होगी। 
  • समझौते में दिल्ली को आरबीआई द्वारा प्रदान की जाने वाली तरलता सुविधाओं, जैसे वेज़ ऐंड मींस एडवांसेज (WMA) और स्पेशल ड्रॉइंग फैसिलिटी (SDF) तक पहुंच भी दी गई है। इससे सरकार अपने अल्पकालिक वित्तीय दबावों को कम लागत पर प्रबंधित कर सकेगी और भुगतान क्षमता बनी रहेगी।
  • नए ढांचे के अनुसार, बाजार से जुटाई गई सभी राशि केवल पूंजीगत व्यय पर ही खर्च की जा सकेगी। यह व्यवस्था 9 जनवरी 2026 से लागू होगी। इसके साथ ही दिल्ली को स्वतंत्र बैंकिंग और उधारी संरचना मिल जाएगी, जो आरबीआई के पेशेवर तंत्र के अंतर्गत काम करेगी।

 

दिल्ली–आरबीआई समझौते के अंतर्गत प्राथमिक क्षेत्र

  • एमओयू के तहत शहरी अवसंरचना को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है। समझौता स्पष्ट करता है कि दिल्ली सरकार बाज़ार से प्राप्त धन का उपयोग केवल सड़कों, पुलों, फ्लाईओवरों, नालों और सार्वजनिक भवनों जैसे स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण पर करेगी। इन परिसंपत्तियों से शहर की आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिलती है और आने वाले वर्षों में रखरखाव का बोझ कम होता है। 
  • जल सुरक्षा और यमुना नदी पुनर्जीवन को एमओयू में प्राथमिकता दी गई है। दिल्ली सरकार पूंजीगत संसाधनों का उपयोग आधुनिक जल शोधन संयंत्रों, अपग्रेडेड सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम, तथा नई पाइपलाइन नेटवर्क के निर्माण में करेगी। यमुना की सफाई एक दीर्घकालिक परियोजना है, जिसके लिए निरंतर और बड़े निवेश की आवश्यकता होती है। 
  • एमओयू के अनुसार परिवहन व्यवस्था को व्यापक रूप से मजबूत किया जाएगा। राजधानी में बेहतर बस बेड़ा, इलेक्ट्रिक वाहन अवसंरचना, बस डिपो, टर्मिनल और लास्ट माइल कनेक्टिविटी विकसित करने के लिए पूंजीगत व्यय का उपयोग किया जाएगा। आरबीआई द्वारा प्रबंधित कम ब्याज लागत वाले बाजार उधार से सरकार को छोटी अवधि के ऊंचे ब्याज वाले ऋणों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। 
  • एमओयू के अनुसार सरकार द्वारा जुटाए गए धन का उपयोग अस्पतालों, विशेषता ब्लॉकों, डायग्नोस्टिक केंद्रों और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं के निर्माण में किया जाएगा। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि निवेश केवल संरचनाओं पर हो, न कि नियमित वेतन या उपभोग्य वस्तुओं पर। 
  • समझौता डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को भी प्राथमिकता देता है। इसके अंतर्गत इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर, वित्तीय प्रबंधन प्रणालियाँ और नागरिक सेवाओं के डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएंगे। डिजिटल ढांचे का सुदृढ़ होना दिल्ली को आधुनिक शहरी शासन मॉडल की दिशा में आगे बढ़ाता है।

 

दिल्ली की वर्तमान बैंकिंग और ऋण प्रबंधन व्यवस्था

  • वर्तमान समय में दिल्ली सरकार की बैंकिंग और ऋण प्रबंधन प्रणाली एक सीमित और संक्रमणकालीन ढांचे के भीतर काम कर रही है। अभी दिल्ली सरकार की सभी बैंकिंग गतिविधियाँ भारत सरकार के केंद्रीयकृत पब्लिक अकाउंट के माध्यम से संचालित होती हैं। सरकार की प्राप्तियाँ, भुगतान और नकद शेष राशि केंद्र के समेकित कोष का हिस्सा मानी जाती हैं, जिससे दिल्ली की वित्तीय स्वायत्तता सीमित रहती है। 
  • दिल्ली सरकार के सभी बैंकिंग कार्य, जैसे भुगतान की प्रोसेसिंग, राजस्व की प्राप्ति और व्यय की निकासी, उन खातों के माध्यम से किए जाते हैं जो केंद्र सरकार की बैंकिंग प्रणालियों से जुड़े होते हैं। इस मॉडल के कारण दिल्ली को अपनी बैंकिंग प्रक्रियाओं पर पूर्ण नियंत्रण नहीं मिल पाता।
  • दिल्ली सरकार की उधारी मुख्य रूप से वैकल्पिक ऋण माध्यमों पर आधारित है। इसमें राष्ट्रीय लघु बचत कोष (NSSF) से लिए गए ऋण और समय-समय पर केंद्र से प्राप्त सहायता शामिल है। इस सीमित उधारी ढांचे की वजह से सरकार को अपने विकास कार्यों के लिए अपेक्षित वित्त प्राप्त करने में कठिनाई होती है। 
  • वर्तमान में दिल्ली के ऋण प्रबंधन का कार्य वित्त विभाग द्वारा आंतरिक रूप से संचालित किया जाता है, जहाँ पेशेवर ऋण प्रबंधक या उन्नत ऋण निगरानी ढांचा उपलब्ध नहीं है। आरबीआई स्तर की निगरानी न मिलने से उधारी लागत, जोखिम मूल्यांकन और कर्ज प्रबंधन की क्षमता सीमित रहती है। 
  • दिल्ली का वित्त विभाग अभी सभी प्रमुख वित्तीय कार्य—बजट निर्माण, नकद प्रबंधन, बैंकिंग संचालन और ऋण भुगतान—स्वयं संभालता है। लेकिन अब तक यह प्रक्रिया PFMS जैसे केंद्रीय वित्तीय प्रणालियों से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं है। 

 

दिल्ली–आरबीआई समझौते का व्यापक प्रभाव

  • दिल्ली और आरबीआई के बीच हुए समझौते के बाद बजट निर्माण की प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित और नियम आधारित हो जाएगी। अब आगामी बजट आरबीआई ढांचे द्वारा निर्धारित वित्तीय मानकों के अनुसार तैयार किए जाएंगे। दिल्ली सरकार अपने वार्षिक वित्तीय योजनाएँ अनुमानित राजस्व और उपलब्ध नकद शेष के आधार पर बनाएगी। इसके साथ ही, अधिशेष धनराशि पर मिलने वाला ब्याज भी राजस्व अनुमान का हिस्सा बनेगा, जिससे आय के प्रक्षेपण अधिक मज़बूत और वास्तविक होंगे।
  • समझौते के तहत सरकार अब मुख्य रूप से स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDLs) के माध्यम से बाजार से उधार ले सकेगी, जिन पर लगभग 7 प्रतिशत का प्रतिस्पर्धी ब्याज दर लागू होती है। पहले जो असंगठित ऋण 12–13 प्रतिशत की ऊँची दरों पर मिलते थे, उनकी जगह अब यह कम लागत वाली उधारी लेगी। घटी हुई ब्याज दरें वार्षिक ऋण भुगतान भार को कम करेंगी, जिसका उपयोग विकास कार्यों पर किया जा सकेगा। 
  • आरबीआई की निगरानी में सरकार का कैश फ्लो मैनेजमेंट और भी व्यवस्थित हो जाएगा। दैनिक आधार पर अधिशेष धनराशि को स्वचालित रूप से सुरक्षित निवेश साधनों में लगाया जाएगा, जिससे निरंतर ब्याज आय प्राप्त होगी। इसके साथ ही, सरकार को वेज़ एंड मींस एडवांसेज़ (WMA) और स्पेशल ड्रॉइंग फैसिलिटी (SDF) जैसी अल्पकालिक तरलता सुविधाएँ भी मिलेंगी। इससे राजस्व–व्यय के बीच होने वाले अस्थायी अंतर को संभालना आसान होगा।
  • यह समझौता सहकारी संघवाद को और सुदृढ़ बनाता है, क्योंकि अब दिल्ली की वित्तीय प्रणाली औपचारिक रूप से राष्ट्रीय मौद्रिक और राजकोषीय ढाँचों के साथ एकीकृत हो जाएगी। इससे दिल्ली भी उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की श्रेणी में शामिल होगी जो पहले से ही अपने बैंकिंग और ऋण प्रबंधन कार्यों के लिए आरबीआई के साथ काम करते हैं।
  • आरबीआई के विशेषज्ञ ऋण प्रबंधकों की भूमिका से सरकार के ऋण पोर्टफोलियो पर अचानक आने वाले ब्याज दर जोखिम काफी कम हो जाएंगे। अधिशेष नकदी का निरंतर निवेश सरकार को संभावित राजस्व हानि से बचाएगा। इस पेशेवर निगरानी व्यवस्था से राजकोषीय फिसलन (Fiscal Slippage) की संभावना भी घटेगी और वित्तीय स्थिरता मजबूत होगी।