अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने 2 अप्रैल 2026 को एक बड़ा फैसला लेते हुए एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत कुछ पेटेंट दवाओं पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। यह टैरिफ 100% तक हो सकता है और उन कंपनियों पर लागू होगा जो अमेरिकी सरकार के साथ तय शर्तों पर समझौता नहीं करती हैं।
यह कदम न केवल अमेरिकी फार्मा सेक्टर बल्कि वैश्विक दवा बाजार और सप्लाई चेन पर भी बड़ा असर डाल सकता है। खासतौर पर भारत और चीन जैसे देशों के लिए, जो दुनिया में दवाओं और कच्चे माल के बड़े सप्लायर हैं, यह फैसला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
इस नए आदेश के तहत अमेरिका ने दवा कंपनियों के लिए एक तरह का विकल्प रखा है। अगर कंपनियां सरकार के साथ “मोस्ट फेवर्ड नेशन” (MFN) प्राइसिंग समझौता करती हैं और अमेरिका में ही उत्पादन शुरू करती हैं, तो उन पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा।
लेकिन जो कंपनियां यह समझौता नहीं करेंगी, उनके लिए अलग-अलग स्तर के टैरिफ तय किए गए हैं:
- जो कंपनियां अमेरिका में उत्पादन शुरू कर रही हैं लेकिन प्राइसिंग डील नहीं की है, उन पर 20% टैरिफ लगेगा
- यह टैरिफ अगले चार साल में बढ़कर 100% तक पहुंच सकता है
- जो कंपनियां न तो समझौता करेंगी और न ही अमेरिका में उत्पादन बढ़ाएंगी, उन्हें सीधे उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ेगा
सरकार ने कंपनियों को बातचीत के लिए समय भी दिया है—बड़ी कंपनियों के लिए 120 दिन और बाकी के लिए 180 दिन।

सरकार का तर्क: राष्ट्रीय सुरक्षा
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। आदेश में कहा गया है कि दवाओं और उनके कच्चे माल के आयात पर अत्यधिक निर्भरता अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
इसलिए सरकार चाहती है कि दवा उत्पादन अमेरिका के अंदर ही बढ़े, ताकि संकट के समय बाहरी देशों पर निर्भरता कम हो सके।
‘लिबरेशन डे’ की सालगिरह पर बड़ा फैसला
यह आदेश ट्रंप के “लिबरेशन डे” की पहली सालगिरह पर आया है। इसी दिन पिछले साल उन्होंने दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे। उस समय इन फैसलों से वैश्विक बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था।
हालांकि, फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन पुराने टैरिफ को रद्द कर दिया था, जिससे ट्रंप प्रशासन को झटका लगा था। इसके बाद अब यह नया रास्ता अपनाया गया है।
दवा कंपनियों की चिंता
इस फैसले पर फार्मा इंडस्ट्री की ओर से चिंता जताई जा रही है। PhRMA के प्रमुख स्टीफन जे. उबल का कहना है कि इस तरह के टैक्स से नई और उन्नत दवाएं महंगी हो सकती हैं।
उनका मानना है कि इससे अरबों डॉलर के निवेश पर असर पड़ेगा और दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका पहले से ही बायोफार्मा मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत है और ज्यादातर दवाएं भरोसेमंद सहयोगी देशों से आती हैं।
कंपनियों से पहले ही हो चुके हैं समझौते
ट्रंप प्रशासन ने पिछले एक साल में कई बड़ी दवा कंपनियों के साथ समझौते भी किए हैं। इनमें Pfizer, Eli Lilly और Bristol Myers Squibb जैसी कंपनियां शामिल हैं।
इन समझौतों के तहत कंपनियों ने दवाओं की कीमतें कम करने और अमेरिका में उत्पादन बढ़ाने का वादा किया है। बताया गया है कि कुल 17 प्राइसिंग डील्स पर बातचीत हुई, जिनमें से 13 पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
अलग-अलग देशों के लिए अलग टैरिफ
इस आदेश में कुछ देशों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए हैं:
- यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और स्विट्जरलैंड से आने वाली पेटेंट दवाओं पर 15% टैरिफ लगेगा
- ब्रिटेन के लिए 10% टैरिफ तय किया गया है, जिसे भविष्य में शून्य किया जा सकता है
ब्रिटेन पहले ही यह दावा कर चुका है कि उसने अमेरिका के साथ ऐसा समझौता किया है जिससे उसकी दवाओं पर तीन साल तक कोई टैरिफ नहीं लगेगा।
चरणबद्ध तरीके से लागू होगा फैसला
यह नया टैरिफ सिस्टम 31 जुलाई 2026 से लागू होना शुरू होगा। कुछ कंपनियों को उनके मौजूदा समझौतों के आधार पर ज्यादा समय मिल सकता है। इससे कंपनियों को अपनी रणनीति बदलने और अमेरिका में निवेश बढ़ाने का मौका मिलेगा।
भारत और चीन पर क्या असर?
भारत और चीन दुनिया में जेनेरिक दवाओं और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) के बड़े उत्पादक हैं। अमेरिका इन देशों से बड़ी मात्रा में दवाएं आयात करता है।
फिलहाल जेनेरिक दवाओं को इस टैरिफ से बाहर रखा गया है, लेकिन अगर भविष्य में इसे बढ़ाया गया, तो इसका असर वैश्विक दवा बाजार पर पड़ सकता है। इससे दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और सप्लाई चेन पर दबाव आ सकता है।
मेटल टैरिफ में भी बदलाव
ट्रंप ने इसी के साथ स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर पर पहले से लागू 50% टैरिफ में भी बदलाव की घोषणा की है। अब इन धातुओं पर टैरिफ उनकी पूरी कीमत के आधार पर लगाया जाएगा, ताकि कंपनियां नियमों से बच न सकें।
- पूरी तरह इन धातुओं से बने उत्पादों पर 50% टैरिफ जारी रहेगा
- जिन उत्पादों में धातु की मात्रा 15% से कम है, उन पर सामान्य देश-आधारित टैरिफ लागू होगा
- जिनमें धातु ज्यादा है, उन पर 25% टैरिफ लगाया जाएगा
आगे और भी टैरिफ आ सकते हैं
ट्रंप प्रशासन ने यह कदम 1962 के ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट के सेक्शन 232 के तहत उठाया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आयात पर रोक लगाने की अनुमति देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में और भी सेक्टर-आधारित टैरिफ लगाए जा सकते हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस्तेमाल किए गए कानून पर रोक लगा दी है।
क्या होगा आम लोगों पर असर?
अगर ये टैरिफ पूरी तरह लागू होते हैं, तो इसका असर सीधे दवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है। महंगी दवाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर जा सकती हैं। साथ ही, कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल सकती हैं।
हालांकि, सरकार का दावा है कि इससे अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी, रोजगार पैदा होंगे और लंबे समय में अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा।
निष्कर्ष:
ट्रंप का यह फैसला वैश्विक व्यापार नीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। यह सिर्फ दवा उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय संबंध, सप्लाई चेन और आर्थिक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

