भारत के प्रमुख उद्योगपति गौतम अडाणी और उनके भतीजे सागर अडाणी ने अमेरिका में चल रहे सिविल फ्रॉड मामले को चुनौती देते हुए इसे खारिज करने की मांग की है। यह मामला यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) द्वारा दायर किया गया था। अडाणी समूह का कहना है कि यह केस कानूनी रूप से कमजोर है और अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
क्या है पूरा मामला?
SEC ने नवंबर में आरोप लगाया था कि अडाणी समूह की कंपनी अडाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (AGEL) ने 2021 में बॉन्ड जारी करते समय निवेशकों को पूरी जानकारी नहीं दी। आरोप यह भी था कि कंपनी ने कथित रिश्वत से जुड़े मामलों को छिपाया।
इस मामले में गौतम अडाणी और सागर अडाणी को भी आरोपी बनाया गया। सागर अडाणी समूह के एनर्जी और फाइनेंस से जुड़े काम देखते हैं।
अडाणी पक्ष की दलील
अडाणी समूह ने न्यूयॉर्क की अदालत में एक प्री-मोशन लेटर दाखिल कर साफ कहा है कि यह पूरा मामला अमेरिका के बाहर का है। उनके वकीलों का तर्क है कि:
- जिस बॉन्ड डील को लेकर विवाद है, वह अमेरिका में नहीं हुई
- कंपनी भारत की है और अमेरिका में लिस्टेड नहीं है
- कथित घटनाएं भी भारत में ही हुईं
- न तो गौतम अडाणी और न ही सागर अडाणी का अमेरिका से ऐसा कोई सीधा जुड़ाव है, जिससे यह केस बनता हो
वकीलों ने यह भी कहा कि SEC यह साबित नहीं कर पाया कि इस मामले में कोई “डोमेस्टिक ट्रांजैक्शन” शामिल था। यानी ऐसा कोई लेनदेन जो सीधे अमेरिकी कानून के दायरे में आता हो।

बॉन्ड डील पर क्या कहा गया?
फाइलिंग के अनुसार, लगभग 750 मिलियन डॉलर (करीब ₹6,300 करोड़) के बॉन्ड विदेश में नियम 144A और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के तहत बेचे गए थे। ये बॉन्ड सीधे अमेरिकी बाजार में नहीं बेचे गए, बल्कि गैर-अमेरिकी अंडरराइटर्स के जरिए जारी किए गए थे।
बाद में इनका कुछ हिस्सा योग्य संस्थागत खरीदारों (QIBs) को बेचा गया। अडाणी पक्ष का कहना है कि इसमें भी उनकी कोई सीधी भूमिका नहीं थी।
रिश्वत के आरोप क्या हैं?
अमेरिकी अभियोजकों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच एक बड़े सोलर प्रोजेक्ट के लिए भारतीय अधिकारियों को लगभग 250 मिलियन डॉलर (करीब ₹2,110 करोड़) की रिश्वत देने की योजना बनाई गई थी।
इस प्रोजेक्ट से आने वाले 20 सालों में लगभग 2 बिलियन डॉलर (करीब ₹16,881 करोड़) के मुनाफे का अनुमान था।
आरोपों में यह भी कहा गया कि कुछ अन्य लोगों ने जांच एजेंसियों से जानकारी छिपाने और सबूत मिटाने की कोशिश की।
अडाणी समूह का जवाब
अडाणी समूह ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह गलत बताया है। उनका कहना है:
- रिश्वत के आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत नहीं है
- SEC ने निवेशकों को हुए नुकसान का भी कोई ठोस उदाहरण नहीं दिया
- बॉन्ड की अवधि पूरी हो चुकी है और निवेशकों को उनका पैसा ब्याज सहित वापस मिल चुका है
इस आधार पर समूह ने कोर्ट से अपील की है कि केस को पूरी तरह खारिज कर दिया जाए।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में अगला बड़ा कदम 30 अप्रैल को देखने को मिल सकता है। इस दिन अदालत में विस्तृत बहस होने की संभावना है। अडाणी समूह ने कहा है कि अगर जरूरत पड़ी तो वे प्री-मोशन कॉन्फ्रेंस में भी हिस्सा लेने को तैयार हैं।
क्यों अहम है यह मामला?
यह केस सिर्फ अडाणी समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है – क्या अमेरिका अपने कानूनों को दूसरे देशों में हुई डील्स पर भी लागू कर सकता है?
अगर अदालत SEC के पक्ष में जाती है, तो भविष्य में विदेशी कंपनियों पर अमेरिकी कानूनों का दायरा और बढ़ सकता है। वहीं अगर केस खारिज होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करेगा।
निष्कर्ष:
इस पूरे विवाद में एक तरफ अमेरिका का नियामक है, जो पारदर्शिता और निवेशकों की सुरक्षा की बात कर रहा है। दूसरी तरफ अडाणी समूह है, जो कह रहा है कि मामला अमेरिका से जुड़ा ही नहीं है।
अब फैसला अदालत के हाथ में है। 30 अप्रैल की सुनवाई से यह साफ हो सकता है कि यह मामला आगे बढ़ेगा या यहीं खत्म हो जाएगा।
