भारत की संसद केवल राजनीतिक बहसों का मंच नहीं है, बल्कि यह देश की संवैधानिक मर्यादाओं, संस्थागत संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर जिम्मेदार विमर्श का केंद्र भी है। हाल ही में लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान हुआ हंगामा इसी संवेदनशील संतुलन को लेकर सामने आया। इस विवाद के केंद्र में पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ रही।
यह मामला केवल एक राजनीतिक टकराव नहीं था, बल्कि इसने कई गहरे सवाल खड़े किए-क्या संसद में अप्रकाशित सैन्य सामग्री का हवाला दिया जा सकता है? सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की अभिव्यक्ति की सीमा क्या है? और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा पारदर्शिता के बीच संतुलन कैसे साधा जाए?
विवाद की पृष्ठभूमि: किताब से संसद तक
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत 2020 के भारत-चीन सैन्य तनाव का उल्लेख करते हुए की। उन्होंने एक मैगज़ीन में प्रकाशित लेख का हवाला दिया, जिसमें जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के अंश उद्धृत किए गए थे। इन अंशों में पूर्वी लद्दाख में चीनी टैंकों की गतिविधियों और उस समय की उच्च-स्तरीय निर्णय प्रक्रिया का उल्लेख था।
यहीं से विवाद शुरू हुआ। सरकार पक्ष ने सवाल उठाया कि जब किताब प्रकाशित ही नहीं हुई है और सेना उसकी समीक्षा कर रही है, तो उसके अंशों को संसद में कैसे पढ़ा जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष ने नियम 349 (I) का हवाला देते हुए कहा कि बिना अनुमति और आधिकारिक प्रकाशन के ऐसी सामग्री सदन में उद्धृत नहीं की जा सकती।
जनरल नरवणे की किताब: क्यों है यह संवेदनशील?
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ एक आत्मकथा है, जिसमें जनरल नरवणे ने अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए सैन्य निर्णयों, भारत-चीन सीमा तनाव, उच्च स्तरीय बैठकों और रणनीतिक दुविधाओं का विवरण दिया है। इसमें 31 अगस्त 2020 की रात की घटनाओं का विस्तृत वर्णन है, जब पूर्वी लद्दाख में चीनी टैंक भारतीय ठिकानों के काफी करीब पहुंच गए थे।
इस तरह की जानकारी केवल ऐतिहासिक विवरण नहीं होती, बल्कि इसमें सैन्य रणनीति, निर्णय-प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलू शामिल होते हैं। यही कारण है कि रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना ऐसी पुस्तकों की पूर्व-समीक्षा करती है।
सैन्य प्रकाशन से जुड़े नियम और ‘ग्रे एरिया’
सेना नियम 1954 के तहत सेवारत सैन्य अधिकारियों को बिना अनुमति किसी भी सेवा-संबंधी या राजनीतिक विषय पर लेखन या प्रकाशन की अनुमति नहीं होती। मीडिया से संवाद, व्याख्यान या पुस्तक लेखन सभी के लिए पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
सेवानिवृत्त अधिकारियों के मामले में स्थिति थोड़ी जटिल है। केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 (संशोधन 2021) के अनुसार, खुफिया या सुरक्षा से जुड़े मामलों में सेवानिवृत्त अधिकारियों से भी गोपनीयता बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। रक्षा सेवाओं में यह एक ग्रे एरिया है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा आमने-सामने आ जाती हैं।
संसद, नियम 349 (I) और लोकतांत्रिक मर्यादा
लोकसभा का नियम 349 (I) कहता है कि कोई भी सांसद सदन में किसी पुस्तक, पत्र या दस्तावेज़ का हवाला तभी दे सकता है जब वह प्रमाणिक, प्रकाशित और अध्यक्ष की अनुमति से प्रस्तुत किया गया हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संसद में कही गई बातें सत्यापन योग्य हों और किसी अप्रमाणित स्रोत के आधार पर राष्ट्रीय हितों को नुकसान न पहुंचे।
इस मामले में सरकार का तर्क था कि अप्रकाशित सैन्य आत्मकथा का हवाला देना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि इससे संवेदनशील सूचनाओं का राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम पारदर्शिता
यह पूरा विवाद एक बड़े प्रश्न की ओर इशारा करता है-लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी कितनी सार्वजनिक होनी चाहिए? एक ओर नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि संकट के समय निर्णय कैसे लिए गए। दूसरी ओर, सैन्य रणनीति और निर्णयों का खुलासा भविष्य की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
जनरल नरवणे की किताब इसी द्वंद्व का प्रतीक है। यह न तो पूरी तरह गोपनीय रखी जा सकती है और न ही बिना समीक्षा सार्वजनिक की जा सकती है।
निष्कर्ष:
लोकसभा में हुआ यह विवाद केवल एक दिन का हंगामा नहीं था, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, सैन्य-नागरिक संबंधों और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। जनरल नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में राजनीतिक बयानबाजी, संसदीय नियम और संस्थागत जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है।
एक मजबूत लोकतंत्र वही होता है, जहां सवाल भी पूछे जाएं और सीमाएं भी समझी जाएं।
प्रश्न:
लोकसभा के नियम 349 (I) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह नियम सदन में अप्रमाणित और अप्रकाशित सामग्री को उद्धृत करने से रोकता है।
- किसी पुस्तक या दस्तावेज़ का हवाला देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति आवश्यक होती है।
- यह नियम केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर लागू होता है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
UPSC मेंस प्रश्न
“सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई आत्मकथाएँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच एक संवेदनशील संतुलन प्रस्तुत करती हैं।”
जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा से जुड़े हालिया विवाद के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।
