विश्व इतिहास में जर्मनी की सैन्य शक्ति हमेशा एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा रही है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच सबसे बड़ी पहचान यही थी कि जर्मनी ने किस तरह से अपनी सेना को मजबूत किया था और युद्ध के लिए आवश्यक संसाधन जुटाए थे। अब एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह सुर्खी बन रहा है कि जर्मनी पुनः अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह घटनाक्रम विशेष रूप से उस समय अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य अत्यधिक अस्थिर है और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अभूतपूर्व तनाव देखने को मिल रहा है।

अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर अधिकार की मांग और नाटो के भविष्य को लेकर दिए गए विवादास्पद बयानों ने यूरोपीय देशों को गहराई से चिंतित कर दिया है। ट्रंप की अप्रत्याशित नीतियों, अचानक बदलते रुख और विवादास्पद बयानों के कारण यूरोप को यह संदेश मिल रहा है कि अमेरिका पर अब पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे हैं।
विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी ने अब ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट संदेश देते हुए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। हालांकि ट्रंप ने हाल ही में ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जे की बात से यूटर्न लिया था, लेकिन उनके बयानों और व्यवहार ने यूरोपीय संघ के देशों में गहरी चिंता और असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर दी है। यूरोप अब यह मानने लगा है कि अमेरिका कभी भी अपने हितों के लिए किसी भी देश के खिलाफ कोई भी कार्रवाई कर सकता है।
ट्रंप ने ग्रीनलैंड मुद्दे पर आठ यूरोपीय देशों को एक साथ 10 प्रतिशत व्यापार शुल्क लगाने की धमकी दे डाली थी। हालांकि जब यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों ने एकजुट होकर अमेरिका का पूर्ण बहिष्कार करने की धमकी दी, तो ट्रंप को पीछे हटना पड़ा। लेकिन यह घटना यूरोप के लिए एक चेतावनी बन गई है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं तैयार रहना होगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जर्मनी को दो भागों में विभाजित कर दिया गया था – पश्चिमी जर्मनी और पूर्वी जर्मनी। पश्चिमी जर्मनी पर ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका का नियंत्रण था, जबकि पूर्वी जर्मनी पर सोवियत संघ का। पोट्सडैम घोषणा के तहत जर्मनी पर कई कठोर प्रतिबंध लगाए गए थे, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उसकी सेना की संख्या कभी भी 370,000 से अधिक नहीं होगी, वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और परमाणु मुक्त क्षेत्र में रहेगा।
ये प्रतिबंध इसलिए लगाए गए थे ताकि जर्मनी कभी तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी न कर सके। वर्तमान में जर्मनी के पास लगभग पौने दो लाख सैनिक हैं, जो पहले पांच लाख से घटाकर इस स्तर पर लाए गए थे। जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शांतिप्रिय देश की छवि बनाई थी और सैन्यीकरण से दूर रहा था। लेकिन अब जर्मनी ने यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनाने का लक्ष्य रखा है, जो कि हिटलर के बाद पहली बार हो रहा है।
नाटो पर संकट और यूरोप की बढ़ती चिंताएं
नाटो का लगभग 70 प्रतिशत बजट अमेरिका द्वारा दिया जाता है, जबकि जर्मनी जैसे देश केवल 4-5 प्रतिशत का योगदान देते हैं। ऐसे में जब अमेरिका की नीतियों में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है और ट्रंप प्रशासन नाटो की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठा रहा है, तो यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं पूर्ण जिम्मेदारी लेनी पड़ रही है।

ट्रंप प्रशासन द्वारा नाटो सहयोगियों के प्रति दिखाई गई उपेक्षा और अपमानजनक व्यवहार ने यूरोपीय नेताओं को गहरा आघात पहुंचाया है। ट्रंप ने यूरोपीय नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया और उन्हें यह एहसास दिलाया कि वे अमेरिका के सामने कुछ भी नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस 2029 तक नाटो पर हमला कर सकता है, और यदि अमेरिका साथ नहीं देता है तो यूरोप को अकेले ही इस चुनौती का सामना करना होगा। यह डर यूरोप को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
रूस का बढ़ता खतरा और यूक्रेन युद्ध
यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा चिंताओं को और अधिक बढ़ा दिया है। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन के बाद रूस का अगला संभावित लक्ष्य पोलैंड और फिर जर्मनी हो सकता है। जर्मनी ने रूसी गैस पर निर्भरता कम करने का साहसिक निर्णय लिया था, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
रूस और अमेरिका दोनों ही वर्तमान में अपने-अपने हितों के लिए आक्रामक रुख अपना रहे हैं। रूस यूक्रेन में व्यस्त है तो अमेरिका वेनेजुएला और ग्रीनलैंड की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। ऐसे में यूरोप को यह समझ में आ गया है कि उसे अपनी सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करनी होगी। दोनों महाशक्तियां अपने हितों में व्यस्त हैं और यूरोप की सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से नहीं ले रही हैं।
जर्मनी की महत्वाकांक्षी नई सैन्य योजना
जर्मनी अब यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनाने की दिशा में तेजी से और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में यूरोप में सैन्य शक्ति के मामले में फ्रांस पहले स्थान पर है, उसके बाद पोलैंड, फिर जर्मनी, ब्रिटेन और इटली हैं। जर्मनी अब फ्रांस से भी अधिक सैनिक भर्ती करने की महत्वाकांक्षी योजना बना रहा है।
सूत्रों के अनुसार, जर्मनी सैनिकों को ढाई लाख रुपये मासिक वेतन की आकर्षक पेशकश कर रहा है। सेना में भर्ती के लिए व्यापक और प्रभावी अभियान चलाया जा रहा है और आधुनिक हथियारों की बड़े पैमाने पर खरीद की जा रही है। सेना को आधुनिकीकृत करने के लिए भारी निवेश किया जा रहा है। सर्वेक्षणों के अनुसार, 90 प्रतिशत जर्मन नागरिक इस कदम का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उनका नाटो और अमेरिका में विश्वास काफी कम हो गया है। जर्मन जनता यह मानने लगी है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं मजबूत होना होगा।
ऐतिहासिक चिंताएं और हिटलर की छाया
जर्मनी का सैन्य विस्तार विश्व के लिए चिंता का गंभीर विषय इसलिए भी है क्योंकि इतिहास में दो बार जर्मनी ने भीषण विश्व युद्ध भड़काए हैं। एडॉल्फ हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत की थी, जिसमें करोड़ों निर्दोष लोगों की जान गई थी और मानवता को अकल्पनीय क्षति हुई थी।
प्रथम विश्व युद्ध 1914 में ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या से शुरू हुआ था। इस हत्या का संदेह सर्बिया पर था, जिसके बाद ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। सर्बिया के समर्थन में रूस उतर आया और ऑस्ट्रो-हंगेरियन के सहयोग में जर्मनी युद्ध में कूद पड़ा। धीरे-धीरे एक क्षेत्रीय संघर्ष विश्व युद्ध में बदल गया। 4 साल 3 महीने और 14 दिनों तक चले इस युद्ध में डेढ़ से 2 करोड़ लोगों की जानें चली गईं।
प्रथम विश्व युद्ध में भारत मित्र राष्ट्रों की तरफ से लड़ा था क्योंकि वह ब्रिटिश उपनिवेश था। ब्रिटेन अपने उपनिवेशों से सैनिक लेकर युद्ध में उतारता था। मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, अमेरिका और उनके सहयोगी थे, जबकि केंद्रीय शक्तियों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन साम्राज्य और बुल्गारिया शामिल थे। जर्मनी की पराजय हुई और उस पर वर्साय की संधि के तहत भारी जुर्माना और प्रतिबंध लगाए गए।
वर्साय की संधि के तहत जर्मनी पर इतना भारी जुर्माना और मुआवजा लाद दिया गया कि उसकी आर्थिक स्थिति बिल्कुल खराब हो गई। जर्मन जनता में इससे गहरा असंतोष पैदा हुआ। कई राजवंश खत्म हुए और नए देश बने। लेकिन सबसे बड़ा असर जर्मनी पर पड़ा। जर्मनी के लोगों का मानना था कि यहूदियों ने प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन सरकार का साथ नहीं दिया, जिसके कारण वे हार गए। ब्रिटेन ने बेलफोर घोषणा के माध्यम से यहूदियों को एक नया राष्ट्र देने का वादा किया था, जिससे वे जर्मनी के खिलाफ हो गए।
इसी असंतोष और शर्म का फायदा उठाकर हिटलर ने अपना उदय किया। हिटलर एक अत्यंत करिश्माई व्यक्तित्व वाला नेता था। उसकी बातों में अद्भुत कन्विंसिंग पावर थी और बड़ी संख्या में लोग उसकी बातों को मानते थे। उसने चांसलर से शुरुआत की और धीरे-धीरे खुद को फ्यूरर यानी सम्राट घोषित कर दिया। स्कूलों में उसकी पूजा होने लगी। उसने नस्लीय श्रेष्ठता का सिद्धांत प्रचारित किया कि जर्मन आर्य नस्ल सर्वश्रेष्ठ है और यहूदी परजीवी हैं।
हिटलर ने यहूदियों के प्रति गहरी नफरत फैलाई और होलोकॉस्ट में लगभग 60 लाख यहूदियों की क्रूरतापूर्वक हत्या करवाई। इटली के तानाशाह मुसोलिनी के साथ मिलकर हिटलर ने वर्साय की संधि को पूरी तरह खारिज कर दिया और खोए हुए क्षेत्रों को वापस लेना शुरू किया। जर्मनी ने मुआवजा देना बंद कर दिया। यही द्वितीय विश्व युद्ध का मुख्य कारण बना।
द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक चला। एक तरफ जर्मनी, जापान और इटली थे तो दूसरी तरफ मित्र राष्ट्र – अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस। जर्मनी इतना आक्रामक था कि उसने ब्रिटेन और फ्रांस को पूरी तरह खोखला कर दिया। इन देशों के पास संसाधन और सैन्य शक्ति नहीं बची, जिसके कारण वे अपने उपनिवेशों पर नियंत्रण नहीं रख सके। इसी कारण 1945 के बाद भारत सहित दर्जनों देश स्वतंत्र हुए।
अमेरिका ने युद्ध में सबसे अंत में प्रवेश किया। 1917 में जब जर्मनी ने मेक्सिको को अमेरिका के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया तो अमेरिका प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध में भी अमेरिका ने अंत में जापान पर परमाणु बम गिराया, जिससे युद्ध समाप्त हुआ और अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बन गया।
यूरोप की संयुक्त सेना की बढ़ती मांग
वर्तमान परिस्थितियों में यूरोपीय नेता एक संयुक्त यूरोपीय सेना बनाने की गंभीरता से बात कर रहे हैं। जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज़, जो हाल ही में भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए थे, भी इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे चुके हैं। विश्व के कई देशों का मानना है कि अमेरिका अब भरोसेमंद सहयोगी नहीं रहा है और यूरोप को अपनी रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से तैयार रहना होगा।
फ्रांस के साथ अमेरिका के तनावपूर्ण संबंध और ग्रीनलैंड मुद्दे पर विवाद ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अपने हितों के लिए किसी भी समय अपने पुराने सहयोगियों के खिलाफ भी कोई भी कदम उठा सकता है। यूरोपीय देश अब यह मानने लगे हैं कि उन्हें एक मजबूत सामूहिक सुरक्षा तंत्र विकसित करना होगा।
तीसरे विश्व युद्ध की आशंका?
जर्मनी का सैन्य विस्तार, अमेरिका की अप्रत्याशित और आक्रामक नीतियां, रूस की बढ़ती आक्रामकता, यूक्रेन में चल रहा युद्ध और नाटो के भविष्य पर संदेह – ये सभी कारक मिलकर विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की खतरनाक दिशा में धकेल सकते हैं। इतिहास गवाह है कि जब हथियारों की होड़ शुरू होती है, तो युद्ध की संभावना स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। सैन्य विस्तार अंततः युद्ध का कारण बनता है।
हालांकि जर्मनी के पास अभी परमाणु हथियार नहीं हैं, जबकि फ्रांस और ब्रिटेन परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। लेकिन यदि जर्मनी यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनाने की बात कर रहा है, तो क्या भविष्य में वह परमाणु हथियारों की ओर भी नहीं बढ़ेगा? यह चिंता का गंभीर विषय है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां कई महत्वपूर्ण मायनों में प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से पहले की स्थितियों से चिंताजनक रूप से मिलती-जुलती हैं। सैन्य गठबंधनों में गहरी दरारें, तीव्र आर्थिक प्रतिस्पर्धा, प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की होड़, राष्ट्रवादी भावनाओं का तेजी से उभार और महाशक्तियों के बीच बढ़ता अविश्वास – ये सभी संकेत अत्यंत चिंताजनक हैं।
जर्मनी का यह ऐतिहासिक कदम यूरोप की पूरी तरह बदलती सुरक्षा रणनीति और अमेरिका से बढ़ती दूरी का स्पष्ट संकेत है। यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह केवल आत्मरक्षा का एक आवश्यक उपाय है या इतिहास एक बार फिर अपने सबसे काले अध्यायों को दोहराने जा रहा है। विश्व समुदाय को इन घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखने की आवश्यकता है।

