ग्लोबल ट्रेड पर टकराव! भारत ने WTO में उठाई कड़ी मांग, क्या बदलेंगे नियम?

वैश्विक व्यापार के सबसे बड़े मंच विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत ने एक बार फिर मजबूत और निष्पक्ष व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कहा कि अगर विवाद सुलझाने की पुरानी मजबूत व्यवस्था बहाल नहीं की गई, तो देशों के पास अपने हितों की रक्षा करने के लिए प्रभावी रास्ता नहीं बचेगा।


कैमरून में आयोजित WTO की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC-14) के दौरान भारत ने यह मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। यह बैठक WTO का सबसे बड़ा निर्णय लेने वाला मंच होता है, जहां सभी सदस्य देश मिलकर वैश्विक व्यापार से जुड़े अहम फैसले लेते हैं।


विवाद निपटान प्रणाली क्यों बनी चिंता का विषय?
दरअसल, WTO की दो-स्तरीय विवाद निपटान प्रणाली 2019 से सही तरीके से काम नहीं कर रही है। पहले इस सिस्टम के तहत कोई भी देश व्यापार से जुड़े विवाद को उठाकर न्याय पा सकता था। लेकिन अब यह प्रक्रिया लगभग ठप हो गई है।


पीयूष गोयल ने कहा कि इस स्थिति के कारण छोटे और विकासशील देशों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। जब बड़े देश व्यापार में नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो छोटे देशों के पास उन्हें चुनौती देने का मजबूत मंच नहीं बचता।


भारत की साफ मांग
भारत ने WTO से मांग की कि विवाद निपटान प्रणाली को फिर से “स्वचालित और बाध्यकारी” बनाया जाए। यानी फैसले ऐसे हों जिन्हें सभी देशों को मानना ही पड़े। इससे वैश्विक व्यापार में भरोसा और संतुलन बना रहेगा।


भारत का मानना है कि अगर यह सिस्टम कमजोर रहेगा, तो WTO की विश्वसनीयता भी धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।

Global trade conflict

सुधार कैसे होने चाहिए?
पीयूष गोयल ने साफ किया कि WTO में कोई भी सुधार पारदर्शी, सभी देशों की भागीदारी वाला और विकास को ध्यान में रखकर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि फैसले “सहमति” के आधार पर होने चाहिए, न कि कुछ ताकतवर देशों के दबाव में।
भारत ने यह भी कहा कि WTO के मूल सिद्धांत जैसे – भेदभाव न करना (Non-discrimination) और सभी देशों के लिए बराबरी – को हर हाल में बनाए रखना जरूरी है।


विकासशील देशों के मुद्दे पर जोर
भारत ने खास तौर पर “ग्लोबल साउथ” यानी विकासशील देशों की चिंताओं को उठाया। इनमें सबसे अहम मुद्दा है – खाद्य सुरक्षा।


भारत ने मांग की कि किसानों और गरीब लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए “पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग” (सरकारी भंडारण) पर स्थायी समाधान निकाला जाए। इसके अलावा विशेष सुरक्षा तंत्र (Special Safeguard Mechanism) और कपास (Cotton) जैसे पुराने मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए।


मत्स्य पालन और गरीब मछुआरों की चिंता
भारत ने मछली पालन से जुड़े नियमों पर भी संतुलित समझौते की बात कही। सरकार का कहना है कि नियम ऐसे हों जो समुद्री संसाधनों की रक्षा करें, लेकिन छोटे और गरीब मछुआरों की आजीविका पर असर न पड़े।


डिजिटल व्यापार पर भी सवाल
डिजिटल व्यापार को लेकर भी भारत ने चिंता जताई। खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने की जो नीति चल रही है, उस पर भारत ने फिर से विचार करने की बात कही।


भारत का मानना है कि अगर यह नीति लंबे समय तक जारी रहती है, तो विकासशील देशों को राजस्व का नुकसान हो सकता है।


नई तकनीक और समान अवसर
भारत ने यह भी कहा कि नई तकनीक जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का फायदा सभी देशों तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृष्टिकोण का जिक्र किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि तकनीक का उपयोग “सबके कल्याण” के लिए होना चाहिए।


विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि WTO इस समय एक बड़े मोड़ पर खड़ा है। अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो यह संगठन कमजोर पड़ सकता है।


कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि विकसित देश WTO के नियमों को अपने अनुसार बदलना चाहते हैं, जिससे विकासशील देशों की स्थिति और कमजोर हो सकती है।


भारत की भूमिका क्यों अहम?
भारत इस मंच पर सिर्फ अपने हितों की बात नहीं कर रहा, बल्कि वह पूरे विकासशील दुनिया की आवाज बनकर सामने आया है। भारत का मानना है कि WTO को एक “नियम आधारित” संगठन ही बने रहना चाहिए, न कि ताकतवर देशों के प्रभाव में आने वाला मंच।


निष्कर्ष:
WTO में सुधार की जरूरत अब पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है। विवाद निपटान प्रणाली को मजबूत करना, विकासशील देशों के हितों की रक्षा करना और नई तकनीकों का समान लाभ सुनिश्चित करना – ये सभी मुद्दे भविष्य के वैश्विक व्यापार को तय करेंगे।