देश में बढ़ते सड़क हादसों को देखते हुए केंद्र सरकार ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़ा बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही ‘ग्रेड’ या ‘अंक’ आधारित ड्राइविंग लाइसेंस प्रणाली लागू की जा सकती है। इस नई व्यवस्था में ट्रैफिक नियम तोड़ने पर सीधे लाइसेंस पर असर पड़ेगा। बार-बार गलती करने वालों का लाइसेंस सस्पेंड या रद्द तक हो सकता है।
क्या है ग्रेड-बेस्ड लाइसेंस सिस्टम?
नई योजना के तहत हर ड्राइविंग लाइसेंस को कुछ निश्चित अंक दिए जाएंगे। जब कोई चालक ट्रैफिक नियम तोड़ेगा, तो उसके लाइसेंस से अंक काट लिए जाएंगे।
उदाहरण के तौर पर, तेज रफ्तार, रेड लाइट पार करना, गलत दिशा में गाड़ी चलाना, नशे में ड्राइविंग या मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाना जैसी गंभीर गलती पर ज्यादा अंक कट सकते हैं।
अगर किसी चालक के सभी अंक खत्म हो जाते हैं, तो उसका लाइसेंस 6 महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है। अगर वह फिर भी नियमों का पालन नहीं करता और दोबारा गंभीर गलती करता है, तो लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है।
सरकार का कहना है कि इस प्रणाली से लोगों में नियमों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ेगी, क्योंकि अब गलती का असर सीधे उनके लाइसेंस पर दिखेगा।

क्यों जरूरी हो गया यह कदम?
भारत में हर साल करीब 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज होती हैं। इनमें लगभग 1.8 लाख लोगों की जान चली जाती है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है। सबसे ज्यादा प्रभावित 18 से 45 वर्ष की आयु के लोग होते हैं, जिनकी हिस्सेदारी कुल मौतों में लगभग 72% है।
इसके अलावा 18 साल से कम उम्र के 10,119 बच्चों और किशोरों की भी सड़क हादसों में मौत हुई है। हेलमेट न पहनने के कारण 54,122 लोगों ने जान गंवाई, जबकि सीट बेल्ट न लगाने से 14,466 मौतें दर्ज हुईं। तेज रफ्तार अकेले लगभग 1.2 लाख मौतों की वजह बनी।
अन्य कारणों में गलत दिशा में गाड़ी चलाना, शराब पीकर वाहन चलाना और ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इन लापरवाहियों को रोकने के लिए सिर्फ जुर्माना बढ़ाना काफी नहीं है।
सिर्फ जुर्माना क्यों काफी नहीं?
सरकार पहले ही ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की रकम बढ़ा चुकी है। लेकिन इसके बावजूद हादसों की संख्या में खास कमी नहीं आई है। मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि सबसे बड़ी समस्या कानून का पालन कराना है। कई लोग नियमों को हल्के में लेते हैं और बार-बार गलती दोहराते हैं।
ऐसे में अंक आधारित प्रणाली एक तरह की चेतावनी होगी। यह सिस्टम सिर्फ पैसे का जुर्माना नहीं लगाएगा, बल्कि ड्राइविंग का अधिकार भी सीमित कर सकता है।
युवा सबसे ज्यादा प्रभावित
हादसों में जान गंवाने वालों में बड़ी संख्या युवाओं की है। 18 से 45 वर्ष की उम्र के लोग सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। इसका मतलब है कि देश की कामकाजी और सक्रिय आबादी पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
तेज रफ्तार, स्टंट, मोबाइल पर वीडियो बनाते हुए ड्राइविंग और सीट बेल्ट या हेलमेट की अनदेखी जैसी आदतें बड़ी वजह बन रही हैं। सरकार का मानना है कि अगर सख्ती नहीं की गई तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
दुर्घटना पीड़ितों के लिए राहत योजना
सरकार सिर्फ सख्ती ही नहीं, बल्कि मदद की व्यवस्था भी मजबूत कर रही है। प्रधानमंत्री राहत योजना (Road Accident Victim Hospitalisation and Assured Treatment) के तहत सड़क हादसे के शिकार व्यक्ति को दुर्घटना की तारीख से 7 दिन तक 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज मिलेगा।
इसका मकसद यह है कि घायल व्यक्ति को समय पर इलाज मिल सके और पैसे की कमी या कानूनी डर के कारण इलाज में देरी न हो। मंत्री ने लोगों से अपील की है कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति की मदद करने से पीछे न हटें। अब कानूनी झंझट की चिंता किए बिना घायल को अस्पताल पहुंचाना सुरक्षित और आसान बनाया गया है।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
हालांकि सरकार ने अभी इस सिस्टम का पूरा ढांचा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि यह व्यवस्था तकनीकी रूप से मजबूत होगी। ट्रैफिक चालान सीधे डिजिटल सिस्टम में दर्ज होंगे और अंक उसी के आधार पर कटेंगे।
इससे एक ड्राइवर का रिकॉर्ड साफ-साफ सामने रहेगा। बार-बार नियम तोड़ने वालों की पहचान करना आसान होगा। पुलिस और परिवहन विभाग के बीच समन्वय भी बेहतर होगा।
क्या बदलेगा आम ड्राइवर के लिए?
आम ड्राइवर के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि अब हर गलती का रिकॉर्ड बनेगा। अगर कोई व्यक्ति बार-बार नियम तोड़ता है, तो वह सिर्फ जुर्माना देकर नहीं बच पाएगा। उसका लाइसेंस भी खतरे में पड़ सकता है।
इससे लोगों को अधिक सावधानी से गाड़ी चलाने की आदत डालनी होगी। हेलमेट पहनना, सीट बेल्ट लगाना, तय गति सीमा में चलना और मोबाइल से दूरी रखना अनिवार्य व्यवहार बन सकता है।
जिम्मेदार ड्राइविंग ही समाधान
सरकार का कहना है कि सड़क सुरक्षा सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि जागरूकता से आएगी। नया ग्रेड-बेस्ड सिस्टम एक कदम है, लेकिन असली बदलाव तब होगा जब लोग खुद जिम्मेदारी समझेंगे।
हर साल लाखों परिवार सड़क हादसों से प्रभावित होते हैं। कई घरों के कमाने वाले सदस्य की जान चली जाती है। छोटी सी लापरवाही जिंदगी भर का दर्द दे सकती है।

