ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट से बदलेगा देश का नक्शा या बढ़ेगा पर्यावरण का खतरा, NGT ने दी हरी झंडी, जानिए क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?

करीब 80,000 करोड़ रुपये की लागत वाला ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह है National Green Tribunal (NGT) का ताजा फैसला। छह सदस्यीय विशेष पीठ ने सोमवार को इस परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी को बरकरार रखते हुए कहा कि उसे हस्तक्षेप करने का “कोई ठोस आधार” नहीं मिला।


यह फैसला उन कई याचिकाओं के बाद आया है जिनमें इस परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि परियोजना को दी गई शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और संबंधित अधिकारियों को इन शर्तों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा।

Great Nicobar Mega Project change the map of the country

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
यह महत्वाकांक्षी परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी हिस्से में स्थित Great Nicobar Island में प्रस्तावित है। कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली इस योजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (नागरिक और सैन्य उपयोग के लिए), 450 एमवीए क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट तथा एक बड़ा टाउनशिप शामिल है।

परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का उपयोग किया जाना है। इसके अलावा लगभग 84.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जनजातीय इलाकों के अंतर्गत आता है। रिपोर्टों के अनुसार, निर्माण कार्य के लिए करीब दस लाख पेड़ों की कटाई की आवश्यकता पड़ सकती है।


NGT ने क्या कहा?
NGT (National Green Tribunal) की विशेष पीठ की अगुवाई अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने की। पीठ में न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्य शामिल थे। आदेश में कहा गया कि परियोजना की रणनीतिक महत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी माना गया कि यह इलाका पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है, इसलिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।


पीठ ने कहा कि 2022 में दी गई पर्यावरण मंजूरी (EC) में कई शर्तें जोड़ी गई थीं। पहले दौर की सुनवाई में भी ट्रिब्यूनल ने मंजूरी में दखल देने से इनकार किया था। बाद में जिन मुद्दों को लेकर सवाल उठे, उनकी समीक्षा एक उच्च स्तरीय समिति (HPC) ने की। ट्रिब्यूनल ने समिति की रिपोर्ट पर भरोसा जताते हुए कहा कि उसे मंजूरी रद्द करने का कोई कारण नहीं दिखता।


ICRZ नियमों को लेकर विवाद
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि परियोजना के कुछ हिस्से आइलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन (ICRZ) 2019 के तहत संरक्षित क्षेत्रों में आते हैं, जहां विकास कार्य प्रतिबंधित है। पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष कोठारी ने दावा किया था कि लगभग 700 हेक्टेयर क्षेत्र ऐसे जोन में आता है, जहां निर्माण की अनुमति नहीं होनी चाहिए।


हालांकि उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर NGT ने कहा कि परियोजना का कोई हिस्सा प्रतिबंधित ICRZ क्षेत्र में नहीं आता। केंद्र सरकार ने भी दलील दी कि मास्टर प्लान में जिन हिस्सों का कुछ भाग तटीय नियमन क्षेत्र में आता है, उन्हें संशोधित योजना से बाहर किया जाएगा।


पर्यावरण संरक्षण को लेकर क्या शर्तें?
ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि पर्यावरण मंजूरी में तय की गई शर्तों का पालन करना सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने कई विशेष प्रजातियों की सुरक्षा पर जोर दिया है। इनमें लेदरबैक समुद्री कछुआ, निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी का मगरमच्छ, रॉबर क्रैब और निकोबार मकाक जैसे जीव शामिल हैं।


NGT ने यह भी निर्देश दिया कि तटरेखा में किसी तरह का क्षरण न हो। समुद्र किनारे की रेत वाली जगहों की रक्षा की जानी चाहिए क्योंकि ये समुद्री कछुओं और पक्षियों के लिए अंडे देने की महत्वपूर्ण जगहें हैं।


कोरल रीफ को लेकर भी सवाल उठे थे। ट्रिब्यूनल ने जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि परियोजना क्षेत्र के भीतर बड़े पैमाने पर कोरल रीफ मौजूद नहीं हैं। जहां छिटपुट कोरल हैं, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से स्थानांतरित किया जाएगा और पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाएगी।


रणनीतिक महत्व क्यों?
सरकार का कहना है कि यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करेगी। अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने से जहाजों को दूसरे देशों के बंदरगाहों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे व्यापार को बढ़ावा मिल सकता है।


इसके अलावा, नागरिक और सैन्य दोनों उपयोग वाला हवाई अड्डा भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा। सरकार का तर्क है कि क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है।


विपक्ष और पर्यावरणविदों की आपत्ति
कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले पर निराशा जताई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हो सकते हैं और मंजूरी की शर्तें लंबे समय के नुकसान को नहीं रोक पाएंगी।


कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी पहले इस परियोजना को “सोची-समझी गलती” बताया था। उनका कहना था कि इससे द्वीप की जनजातीय आबादी के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो सकता है।


2004 की सुनामी में यह इलाका बुरी तरह प्रभावित हुआ था। स्थानीय निकोबारी समुदाय पहले ही विस्थापन का दर्द झेल चुका है। इसलिए उनकी जमीन और आजीविका को लेकर चिंता जताई जा रही है।


हाई कोर्ट में मामला बाकी
हालांकि NGT ने पर्यावरण मंजूरी को बरकरार रखा है, लेकिन मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बताया जा रहा है कि कलकत्ता हाई कोर्ट में इस परियोजना से जुड़े कुछ मुद्दों पर सुनवाई जारी है। ऐसे में आगे कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।


विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन
ग्रेट निकोबार परियोजना ने एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण की बहस को तेज कर दिया है। एक ओर सरकार इसे आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से अहम बता रही है, तो दूसरी ओर पर्यावरणविद और कुछ राजनीतिक दल इसे प्रकृति और स्थानीय समुदाय के लिए खतरा मान रहे हैं।


NGT ने अपने आदेश में साफ किया है कि परियोजना की रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन पर्यावरण नियमों का सख्ती से पालन अनिवार्य है।


अब असली परीक्षा तब होगी जब जमीन पर निर्माण शुरू होगा। क्या पर्यावरण सुरक्षा की शर्तों का पूरी तरह पालन होगा? क्या स्थानीय समुदाय की चिंताओं का समाधान किया जाएगा?


इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में सामने आएंगे। फिलहाल इतना तय है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली योजनाओं में से एक बन चुका है।