वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा गुरुवार को संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने देश के सामने एक गंभीर चुनौती को रेखांकित किया है। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और यह जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए बड़ी बाधा
मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन ने प्रेस वार्ता में कहा कि देश की जनसांख्यिकीय क्षमता का पूरा लाभ उठाने में मोटापा एक प्रमुख रुकावट है। उन्होंने सुझाव दिया कि खाद्य पदार्थों पर लगे लेबल में उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य जोखिमों की स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए ताकि लोग सोच-समझकर अपने भोजन का चुनाव कर सकें।
सर्वेक्षण में बताया गया है कि मोटापे का बोझ देश के सभी आयु वर्गों और क्षेत्रों में बढ़ रहा है। शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में यह समस्या गंभीर होती जा रही है। इसके कारण मधुमेह, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संचारी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ गया है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौंकाने वाले आंकड़े
2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। देश में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष या तो अधिक वजन वाले हैं या मोटापे से ग्रस्त हैं। 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में 6.4 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की श्रेणी में आती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 4.0 प्रतिशत है।
बच्चों में यह प्रवृत्ति और भी अधिक चिंताजनक है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में अतिरिक्त वजन का प्रतिशत 2015-16 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में 3.4 प्रतिशत हो गया। यह बचपन से ही अस्वास्थ्यकर आहार और जीवनशैली के संपर्क को दर्शाता है।
अनुमानों के अनुसार, 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे से पीड़ित थे। यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह संख्या 2035 तक बढ़कर 8.3 करोड़ हो सकती है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का बढ़ता प्रभाव
आर्थिक सर्वेक्षण ने अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (यूपीएफ) को भारत के आहार परिदृश्य को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाने वाला बताया है। वैश्विक स्तर पर यूपीएफ की बिक्री में सबसे तेज वृद्धि दिखाने वाले बाजारों में भारत शामिल है। 2009 से 2023 के बीच इस क्षेत्र में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
यूपीएफ की खुदरा बिक्री 2006 में 0.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2019 में लगभग 38 बिलियन डॉलर हो गई, जो चालीस गुना वृद्धि है। उल्लेखनीय है कि इसी अवधि में महिलाओं और पुरुषों दोनों में मोटापे का स्तर लगभग दोगुना हो गया।
स्वास्थ्य और आर्थिक लागत
सर्वेक्षण के अनुसार, यूपीएफ धीरे-धीरे पारंपरिक आहार पैटर्न की जगह ले रहे हैं, जिससे समग्र आहार गुणवत्ता खराब हो रही है। लोग वसा, चीनी और नमक से भरपूर खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन कर रहे हैं।
द लांसेट सीरीज ऑन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स एंड ह्यूमन हेल्थ के तहत एकत्रित साक्ष्य यूपीएफ के अधिक उपभोग को मोटापा, हृदय रोग, श्वसन विकार, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ते हैं।
यूपीएफ का बढ़ता उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च, उत्पादकता में कमी और दीर्घकालिक राजकोषीय तनाव के रूप में भारी आर्थिक बोझ डाल रहा है।
सरकार की नीतिगत पहल
2017 में सामान्य गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय बहु-क्षेत्रीय कार्य योजना (एनएमएपी) के माध्यम से भारत ने मोटापे से निपटने की औपचारिक शुरुआत की। इस योजना ने अस्वास्थ्यकर आहार को गैर-संचारी रोगों का प्रमुख कारण बताया और 39 सरकारी विभागों में समन्वित कार्रवाई का आह्वान किया।
आक्रामक विज्ञापन एक बड़ी चुनौती
सर्वेक्षण ने यूपीएफ की आक्रामक मार्केटिंग को एक बड़ी समस्या बताया। भावनात्मक संदेशों, “एक खरीदो एक मुफ्त” जैसी योजनाओं, सेलिब्रिटी समर्थन और यूपीएफ को स्वास्थ्यवर्धक बताने जैसी रणनीतियों से अधिक उपभोग को बढ़ावा मिल रहा है।
शोध बताते हैं कि अस्वास्थ्यकर खाद्य विज्ञापनों के संपर्क में आने वाले किशोरों में ऐसे उत्पादों का सेवन करने की इच्छा और प्रवृत्ति अधिक होती है।
सुझाए गए उपाय
सर्वेक्षण ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:
सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक सभी माध्यमों में यूपीएफ विज्ञापनों पर व्यापक प्रतिबंध लगाया जाए। शिशु और छोटे बच्चों के लिए दूध और पेय पदार्थों की मार्केटिंग पर सख्त नियंत्रण हो।
खाद्य लेबलिंग के मामले में, चेतावनी लेबल को हेल्थ स्टार रेटिंग जैसी रैंकिंग-आधारित प्रणालियों की तुलना में अधिक प्रभावी बताया गया है। यूपीएफ पर पोषक तत्व और स्वास्थ्य दावों पर रोक लगाई जानी चाहिए ताकि भ्रामक “स्वास्थ्य प्रभामंडल” प्रभाव से बचा जा सके।
राजकोषीय उपायों के तौर पर, चीनी, नमक या वसा की सीमा से अधिक होने पर यूपीएफ पर उच्चतम जीएसटी स्लैब और अतिरिक्त अधिभार लगाने का सुझाव दिया गया है। ऐसे करों से मिलने वाले राजस्व को पोषण शिक्षा, स्कूल भोजन सुधार और गैर-संचारी रोग रोकथाम कार्यक्रमों के लिए आवंटित किया जा सकता है।
प्रौद्योगिकी आधारित समाधान
सर्वेक्षण ने शीघ्र पहचान और लक्षित हस्तक्षेपों के लिए प्रौद्योगिकी-संचालित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की। UDISE+, AISHE और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसे प्लेटफॉर्म, एआई-आधारित उपकरणों के साथ मिलकर “स्वास्थ्य हॉटस्पॉट” की पहचान में मदद कर सकते हैं।
चल रही सरकारी पहलें
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने ‘स्टॉप ओबेसिटी एंड फाइट ओबेसिटी’ जागरूकता अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य अत्यधिक तेल की खपत कम करना और स्वास्थ्यवर्धक आहार को बढ़ावा देना है।
सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों में कई पहल शुरू की हैं, जिनमें पोषण अभियान, फिट इंडिया, खेलो इंडिया, ईट राइट इंडिया और ‘आज से थोड़ा कम’ अभियान शामिल हैं।
गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत अब तक 31.5 करोड़ से अधिक वयस्कों की जांच की गई है, जिनमें से 8.47 करोड़ को अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त पाया गया।
सर्वेक्षण ने इस बात पर जोर दिया कि जागरूकता अभियानों के साथ-साथ आहार गुणवत्ता में निरंतर सुधार जरूरी है, विशेषकर बच्चों और किशोरों में। यह भारत के पोषण अंतर को कम करने और मोटापे की दीर्घकालिक स्वास्थ्य और आर्थिक लागत को सीमित करने के लिए आवश्यक है।
