मध्य पूर्व में बढ़ते अमेरिका-ईरान तनाव के बीच खाड़ी देशों ने संभावित परमाणु या रेडियोलॉजिकल आपदा से निपटने की तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी क्रम में बहरीन स्थित एक फार्मा लायजनिंग एजेंट ने भारत की एक दवा कंपनी से संपर्क किया है। इस एजेंट ने चंडीगढ़ स्थित कंपनी से ऐसी दवाओं के बारे में जानकारी मांगी है जो परमाणु आपदा की स्थिति में लोगों को रेडिएशन के प्रभाव से बचाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एजेंट ने कंपनी से पूछा है कि क्या वह बड़ी मात्रा में प्रशियन ब्लू कैप्सूल का उत्पादन कर सकती है। खास तौर पर कंपनी से यह जानने की कोशिश की गई है कि क्या वह करीब 1 करोड़ कैप्सूल तैयार करने की क्षमता रखती है। इसके अलावा अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों के लिए दवा की खुराक, उत्पादन की अधिकतम क्षमता और सप्लाई से जुड़े कई तकनीकी सवाल भी पूछे गए हैं।
कंपनी की डायरेक्टर डॉ. वैशाली अग्रवाल के मुताबिक फिलहाल इस विषय पर बातचीत जारी है। उन्होंने बताया कि बहरीन का एजेंट अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ इस प्रस्ताव पर चर्चा कर रहा है। यदि आगे चलकर समझौता तय हो जाता है तो इन दवाओं की सप्लाई खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में की जा सकती है।

कई खाड़ी देशों में हो सकती है दवा की सप्लाई
संभावित समझौते के तहत प्रशियन ब्लू कैप्सूल की आपूर्ति बहरीन के अलावा कुवैत, कतर और जॉर्डन जैसे देशों में भी की जा सकती है। इन देशों में हाल के महीनों में सुरक्षा और स्वास्थ्य तैयारियों को लेकर सतर्कता बढ़ी है।
चंडीगढ़ स्थित इस कंपनी का मुख्य कार्यालय शहर में है, जबकि इसकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हिमाचल प्रदेश के बद्दी औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है। यह इलाका भारत में दवा उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है।
डॉ. अग्रवाल ने यह भी बताया कि इससे पहले जून 2025 में भी इसी तरह की मांग सामने आई थी। उस समय इजराइल और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। उस दौरान भी प्रशियन ब्लू कैप्सूल की सप्लाई को लेकर बातचीत शुरू हुई थी, लेकिन करीब 12 दिनों में संघर्ष शांत होने के बाद यह चर्चा आगे नहीं बढ़ पाई।
क्या होती है प्रशियन ब्लू दवा
प्रशियन ब्लू एक विशेष प्रकार की दवा है जिसका उपयोग परमाणु या रेडियोलॉजिकल आपदा की स्थिति में किया जाता है। जब किसी व्यक्ति के शरीर में रेडियोएक्टिव तत्व प्रवेश कर जाते हैं, तब यह दवा उनके प्रभाव को कम करने में मदद करती है।
मुख्य रूप से यह दवा दो रेडियोएक्टिव तत्वों-सीजियम-137 और थैलियम-के असर को घटाने के लिए दी जाती है। ये तत्व परमाणु दुर्घटना या रेडियोधर्मी प्रदूषण के दौरान शरीर में पहुंच सकते हैं।
प्रशियन ब्लू कैप्सूल शरीर की आंतों में जाकर इन रेडियोएक्टिव तत्वों से जुड़ जाता है। इसके बाद यह उन्हें शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया मल के जरिए होती है, जिससे शरीर में मौजूद रेडियोएक्टिव पदार्थ धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस दवा को रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर इमरजेंसी में उपयोग होने वाली जरूरी दवाओं की सूची में शामिल किया है।
भारत में हाल ही में शुरू हुआ उत्पादन
अमेरिका और यूरोप के कई देशों में प्रशियन ब्लू दवा का उत्पादन पहले से किया जाता रहा है। भारत में इसका व्यावसायिक उत्पादन अपेक्षाकृत हाल ही में शुरू हुआ है।
करीब दो साल पहले भारत में इस दवा के कॉमर्शियल प्रोडक्शन की शुरुआत हुई थी। यह दवा रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ की दिल्ली स्थित लैब आईएनएमएएस की तकनीक पर आधारित है। आईएनएमएएस का पूरा नाम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलाइड साइंसेस है।
इस तकनीक के आधार पर भारत में दो कंपनियों को दवा बनाने और बाजार में उपलब्ध कराने की अनुमति दी गई है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने इन कंपनियों को इसके निर्माण और मार्केटिंग का लाइसेंस दिया है।
इनमें अहमदाबाद की एक कंपनी कच्चा माल उपलब्ध कराती है, जबकि चंडीगढ़ की कंपनी कैप्सूल तैयार करने का काम करती है।
पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट की भी मांग
प्रशियन ब्लू कैप्सूल के अलावा बहरीन के एजेंट ने एक और महत्वपूर्ण दवा के बारे में जानकारी मांगी है। यह दवा है पोटेशियम आयोडाइड, जिसे संक्षेप में केआई कहा जाता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार एजेंट ने करीब 1.2 करोड़ पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट की संभावित मांग जताई है। यह दवा भी परमाणु आपदा के समय बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पोटेशियम आयोडाइड का मुख्य काम थायराइड ग्रंथि को रेडिएशन से बचाना होता है। जब वातावरण में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैलता है तो यह शरीर में जाकर थायराइड को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट लेने से थायराइड ग्रंथि सुरक्षित रहती है।
इसके अलावा इस दवा का उपयोग कुछ अन्य चिकित्सा स्थितियों में भी किया जाता है। उदाहरण के लिए हाइपरथायरायडिज्म के इलाज में और फेफड़ों में जमा बलगम को ढीला करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
बढ़ते तनाव के बीच स्वास्थ्य तैयारियां
विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण खाड़ी देशों ने एहतियात के तौर पर स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी तैयारियां बढ़ा दी हैं। परमाणु या रेडियोलॉजिकल आपदा की स्थिति भले ही दुर्लभ हो, लेकिन उससे निपटने के लिए दवाओं और मेडिकल संसाधनों का पहले से तैयार रहना बेहद जरूरी माना जाता है।
इसी वजह से इन देशों द्वारा प्रशियन ब्लू और पोटेशियम आयोडाइड जैसी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।

इस व्यवस्था का मकसद यह है कि छोटे दलों और अलग-अलग समुदायों को भी संसद में जगह मिल सके और कोई एक पार्टी पूरी तरह हावी न हो। लेकिन इस बार के चुनावों में यह संतुलन टूटता हुआ दिखाई दे रहा है।
चुनाव परिणामों में बड़ा उलटफेर
5 मार्च 2026 को नेपाल में मतदान हुआ था और करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने वोट डाले। मतगणना 6 मार्च से शुरू हुई और शुरुआती नतीजों ने राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल दिया।
अब तक सामने आए परिणामों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) ने सीधे चुनाव वाली सीटों में 125 से अधिक सीटों पर जीत या बढ़त हासिल कर ली है। दूसरी तरफ पारंपरिक राजनीतिक दल काफी पीछे रह गए हैं।
नेपाली कांग्रेस लगभग 17 सीटों पर सिमटती दिख रही है, जबकि सीपीएन-यूएमएल करीब 8 सीटों पर रह गई है। अन्य छोटे दलों को भी बहुत कम सीटें मिली हैं।
अगर अनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली सीटों के अनुमान को भी जोड़ दिया जाए तो RSP संसद में दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच सकती है। यह स्थिति नेपाल की राजनीति के लिए असाधारण मानी जा रही है क्योंकि वहां आम तौर पर गठबंधन सरकारें बनती रही हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री ओली को करारी हार
इस चुनाव का सबसे बड़ा झटका नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को लगा है। ओली लंबे समय से नेपाल की राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे हैं और उनकी पार्टी सीपीएन-यूएमएल देश की बड़ी पार्टियों में गिनी जाती रही है।
लेकिन इस बार चुनाव परिणामों ने उनकी राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। शुरुआती रुझानों के अनुसार, ओली अपने ही मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र झापा-5 में पीछे चल रहे हैं और बालेन शाह उनसे आगे निकल गए हैं।
पार्टी के नेताओं ने भी माना है कि यह परिणाम उनके लिए गंभीर झटका है। कई नेताओं का कहना है कि अब पार्टी को अपनी रणनीति और नेतृत्व दोनों पर दोबारा विचार करना पड़ेगा।
नेपाल की राजनीति का लंबा इतिहास
नेपाल की वर्तमान राजनीति को समझने के लिए उसके इतिहास को देखना भी जरूरी है।
करीब 240 वर्षों तक नेपाल में राजशाही रही। 1768 में राजा पृथ्वी नारायण शाह ने कई छोटे-छोटे हिमालयी राज्यों को मिलाकर एकीकृत नेपाल की स्थापना की थी।
लेकिन 1846 में काठमांडू में हुए कोट हत्याकांड के बाद सत्ता राणा परिवार के हाथों में चली गई। इसके बाद लगभग एक सदी तक राणा शासकों ने नेपाल पर शासन किया। इस दौरान राजा औपचारिक रूप से मौजूद थे, लेकिन असली शक्ति राणा परिवार के पास थी।
1951 में राणा शासन का अंत हुआ और राजशाही फिर से मजबूत हुई। लेकिन 1960 में राजा महेंद्र ने संसद भंग कर दी और राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद “पंचायत प्रणाली” लागू की गई जिसमें लोकतंत्र का स्वरूप सीमित था।
1990 में बड़े जनआंदोलन के बाद नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र वापस आया। इसके बावजूद राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।
गृहयुद्ध और राजशाही का अंत
1996 में नेपाल में एक बड़ा माओवादी विद्रोह शुरू हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने किया था। विद्रोहियों का कहना था कि राजशाही और पारंपरिक राजनीतिक दल आम लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए हैं।
लगभग दस साल तक चले इस संघर्ष में 17 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
इसी दौरान 2001 में नेपाल के शाही परिवार में एक दर्दनाक घटना हुई जिसे राजमहल हत्याकांड कहा जाता है। इस घटना में राजा बीरेन्द्र सहित शाही परिवार के कई सदस्य मारे गए।
आखिरकार 2006 में बड़े जनआंदोलन के बाद राजशाही की शक्ति कमजोर हो गई और 2008 में नेपाल को आधिकारिक रूप से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया।
नई लोकतांत्रिक व्यवस्था की चुनौतियां
राजशाही खत्म होने के बाद उम्मीद थी कि नेपाल तेजी से विकास करेगा और राजनीतिक स्थिरता आएगी। लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हो पाया।
पिछले डेढ़ दशक में नेपाल में कई सरकारें बनीं और गिर गईं। अलग-अलग दलों के बीच सत्ता संघर्ष चलता रहा।
इसी बीच बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक चुनौतियों ने लोगों की नाराजगी बढ़ा दी। खासकर युवाओं को लगा कि पारंपरिक राजनीतिक दल उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे हैं।
2025 के जन आंदोलन से चुनाव तक
सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ नेपाल में बड़ा युवा आंदोलन शुरू हुआ। हजारों छात्र और युवा काठमांडू की सड़कों पर उतर आए।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई जगह हिंसा भी हुई और दर्जनों लोगों की मौत हो गई। इस दबाव के कारण प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा।
इसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया और नए चुनाव कराने का फैसला किया गया।
5 मार्च 2026 को हुए इन्हीं चुनावों में बालेन शाह की पार्टी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत प्रदर्शन किया।
प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में बालेन शाह
राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी ने संसद में लगभग स्पष्ट बहुमत हासिल कर ही लिया है इसलिए बालेंद्र शाह के नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बनने की संभावना काफी मजबूत है।
यह स्थिति इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि बालेन शाह पारंपरिक राजनीतिक परिवार से नहीं आते। कुछ साल पहले तक उनका नाम मुख्य रूप से एक रैपर और सामाजिक टिप्पणीकार के रूप में जाना जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है, खासकर नेपाल के युवाओं के बीच।
कौन हैं बालेंद्र शाह
बालेंद्र शाह का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू में हुआ था। उनके पिता आयुर्वेद के डॉक्टर हैं और उनकी मां गृहिणी हैं। परिवार में शिक्षा का अच्छा माहौल रहा है।
बालेन बचपन से ही रचनात्मक स्वभाव के थे। उन्हें संगीत और कला में रुचि थी। स्कूल के दिनों में ही उन्हें हिप-हॉप और रैप संगीत पसंद आने लगा था। धीरे-धीरे उन्होंने खुद गाने लिखना और गाना शुरू कर दिया।
कक्षा 9 में पढ़ते समय उन्होंने “सडक बालक” नाम का एक गीत लिखा था। बाद में यह गाना युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ और इससे उनकी पहचान भी बनने लगी।
इंजीनियर से रैपर तक का सफर
संगीत के साथ-साथ बालेन शाह पढ़ाई में भी अच्छे थे। उन्होंने काठमांडू के व्हाइट हाउस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद वह भारत के नागपुर स्थित विस्वेश्वरैया नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (VNIT) गए, जहां से उन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान भी उनका संगीत से रिश्ता बना रहा। उन्होंने कई रैप गाने लिखे जिनमें सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की बात की गई। उनके गीतों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आम लोगों की परेशानियों का जिक्र होता था।
यही वजह है कि धीरे-धीरे उनके गाने सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक संदेश देने वाले गीत बन गए।
राजनीति की ओर झुकाव कैसे हुआ
2015 के आसपास नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों ने बालेन शाह को राजनीति के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया। उसी समय नेपाल में नया संविधान लागू हुआ था और भारत-नेपाल के बीच व्यापार और परिवहन को लेकर तनाव भी पैदा हुआ था।
नेपाल में कई लोगों ने उस स्थिति को अनौपचारिक नाकाबंदी के रूप में देखा। इस घटना ने बालेन शाह को देश की राजनीति और नीतियों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया।
इसी दौरान उन्होंने सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेना शुरू किया। उसी साल नेपाल में आए बड़े भूकंप के समय उन्होंने राहत कार्यों में भी भाग लिया।
“अगली बार मैं खुद चुनाव लड़ूंगा”
2017 के स्थानीय चुनावों के दौरान बालेन शाह ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी जिसने लोगों का ध्यान खींचा।
उन्होंने लिखा था कि वह इस बार वोट नहीं देंगे क्योंकि वह खुद उम्मीदवार नहीं हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगली बार वह खुद चुनाव लड़ेंगे क्योंकि देश के विकास के लिए उन्हें किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उस समय बहुत से लोगों ने इसे एक सामान्य बयान समझा था, लेकिन कुछ साल बाद उन्होंने सचमुच यह कदम उठा लिया।
काठमांडू के मेयर बने
2022 में बालेन शाह ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर का चुनाव लड़ा। उस समय उनके सामने कई बड़े राजनीतिक दलों के उम्मीदवार थे।
इसके बावजूद उन्होंने चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया। उन्होंने लगभग 23 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की और काठमांडू के पहले स्वतंत्र मेयर बने।
मेयर बनने के बाद भी उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर पारंपरिक राजनीति की आलोचना जारी रखी। इसी वजह से उनकी लोकप्रियता और बढ़ती गई।
युवाओं के बीच तेजी से बढ़ी लोकप्रियता
नेपाल में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। हर साल हजारों युवा रोजगार के लिए खाड़ी देशों, मलेशिया और अन्य देशों में काम करने के लिए जाते हैं।
ऐसे माहौल में बालेन शाह की बातें और उनके गाने युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए। वह अक्सर भ्रष्टाचार और पुराने राजनीतिक ढांचे की आलोचना करते थे।
यही कारण है कि कई युवा उन्हें बदलाव की उम्मीद के रूप में देखने लगे।
2025 का युवा आंदोलन और राजनीतिक बदलाव
सितंबर 2025 में नेपाल में एक बड़ा युवा आंदोलन हुआ जिसने देश की राजनीति को हिला दिया। सरकार ने कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पाबंदियां लगा दी थीं और इंटरनेट के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की कोशिश की थी।
इस फैसले से नाराज होकर हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। काठमांडू समेत कई शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हो गईं। इन घटनाओं में 70 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग घायल हुए।
लगातार बढ़ते दबाव के कारण उस समय के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और देश में अंतरिम सरकार बनाई गई।
इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बालेन शाह का नाम राष्ट्रीय स्तर पर और तेजी से उभरकर सामने आया।
बालेन शाह और भारत से जुड़े विवाद
बालेन शाह की लोकप्रियता जितनी तेजी से बढ़ी है, उतनी ही तेजी से उनके कुछ बयान और फैसले विवादों में भी रहे हैं। खासकर भारत को लेकर उनकी कुछ टिप्पणियों ने दोनों देशों में चर्चा पैदा की थी।
मई 2023 में भारत की नई संसद का उद्घाटन हुआ था। उस समय संसद भवन में “अखंड भारत” से जुड़ी एक कलाकृति दिखाई गई थी, जिसमें दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों को भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक सीमा के रूप में दर्शाया गया था। नेपाल में इस चित्र को लेकर कई राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

इसी के जवाब में काठमांडू के मेयर रहते हुए बालेन शाह ने अपने कार्यालय में “ग्रेटर नेपाल” का नक्शा लगा दिया। इस नक्शे में 1816 की सुगौली संधि से पहले की सीमाओं को दिखाया गया था। उस समय नेपाल की सीमा पूर्व में तेज़पुर और पश्चिम में सतलुज नदी तक मानी जाती थी। नक्शे में भारत के कुछ इलाके जैसे दार्जिलिंग, कुमाऊं, गढ़वाल और कुछ अन्य क्षेत्रों को भी नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था।
हालांकि यह कदम प्रतीकात्मक था, लेकिन इसने नेपाल और भारत के बीच राजनीतिक बहस को जरूर जन्म दिया। भारत की तरफ से यह कहा गया कि “अखंड भारत” वाली तस्वीर केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में थी, उसका वर्तमान राजनीति से कोई संबंध नहीं है।
बॉलीवुड फिल्मों पर बैन का मामला
बालेन शाह से जुड़ा एक और विवाद 2023 में सामने आया था। उस समय हिंदी फिल्म “आदिपुरुष” रिलीज हुई थी। फिल्म के एक संवाद में माता सीता को “भारत की बेटी” बताया गया था।
नेपाल में कई लोगों का मानना है कि माता सीता का जन्म जनकपुर (नेपाल) में हुआ था। इसी वजह से बालेन शाह ने इस संवाद पर आपत्ति जताई।
उन्होंने काठमांडू में कुछ समय के लिए बॉलीवुड फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगाने का फैसला किया। उनका कहना था कि नेपाल की सांस्कृतिक पहचान को लेकर ऐसी बातें स्वीकार नहीं की जा सकतीं।
हालांकि बाद में नेपाल की अदालत ने इस फैसले को रद्द कर दिया। इसके बाद बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर सरकार और न्यायपालिका की आलोचना भी की थी।
इसी तरह नवंबर 2025 में उन्होंने एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट भी किया था जिसमें भारत, चीन और अमेरिका के बारे में कड़े शब्द लिखे गए थे। हालांकि उन्होंने कुछ ही समय बाद वह पोस्ट हटा दिया था।

इन घटनाओं के कारण कई विश्लेषकों ने उन्हें एक लोकप्रिय लेकिन अप्रत्याशित नेता बताया है।
भारत और चीन के बीच नेपाल की भूमिका
नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया की राजनीति में खास महत्व देती है। यह देश उत्तर में चीन और दक्षिण में भारत के बीच स्थित है।
इतिहास में नेपाल की विदेश नीति अक्सर इन दोनों बड़े पड़ोसियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। कई बार नेपाल भारत के करीब दिखता है, तो कभी चीन के साथ उसके संबंध मजबूत होते दिखाई देते हैं।
बालेन शाह ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा है कि नेपाल को सिर्फ “बफर स्टेट” के रूप में नहीं बल्कि “दो देशों के बीच पुल” के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि नेपाल भारत और चीन दोनों के साथ आर्थिक साझेदारी बढ़ाकर अपने विकास की गति तेज कर सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह व्यापार और निवेश को बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देंगे। इससे नेपाल की अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है। लेकिन साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।
चीन के प्रभाव को लेकर क्या संकेत
नेपाल की राजनीति में चीन का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ता हुआ दिखाई दिया है। खासकर पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के शासन के दौरान चीन के साथ कई परियोजनाओं पर चर्चा हुई थी।
लेकिन बालेन शाह के घोषणापत्र में चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का ज्यादा उल्लेख नहीं किया गया है। इससे कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वह चीन के साथ संबंधों को सावधानी से आगे बढ़ाना चाहते हैं।
हालांकि यह भी संभव है कि व्यापार और निवेश के मामले में चीन की भूमिका बढ़े, क्योंकि नेपाल को बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास के लिए बड़े निवेश की जरूरत है।
इसी वजह से आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बालेन शाह भारत, चीन और अन्य देशों के साथ किस तरह की विदेश नीति अपनाते हैं।
अगर बालेन शाह प्रधानमंत्री बनते हैं तो क्या बदलेगा
बालेन शाह के समर्थकों का मानना है कि अगर वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो नेपाल की राजनीति में एक नया दौर शुरू हो सकता है।
उन्होंने अपने चुनावी घोषणापत्र में कई योजनाओं का जिक्र किया है। इनमें डिजिटल सरकार, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार, बुनियादी ढांचे का विकास और नई आर्थिक नीतियां शामिल हैं।
उनका एक विचार “आइडिया बैंक” बनाने का भी है, जहां लोग देश के विकास के लिए नए सुझाव दे सकें। उनका कहना है कि सरकार को युवाओं की ऊर्जा और नए विचारों का इस्तेमाल करना चाहिए।
हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि लोकप्रियता और प्रशासन चलाने की क्षमता दो अलग-अलग चीजें होती हैं। इसलिए असली परीक्षा तब होगी जब उन्हें सरकार चलाने की जिम्मेदारी मिलेगी।
नेपाल की राजनीति के लिए नया मोड़?
नेपाल के कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बालेन शाह का उभार केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता का परिणाम नहीं है। यह उस असंतोष का भी प्रतीक है जो लंबे समय से देश के युवाओं और आम नागरिकों के बीच बढ़ रहा था।
युवाओं को लगने लगा था कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पा रही है। ऐसे माहौल में बालेन शाह जैसे नए चेहरे को समर्थन मिलना स्वाभाविक माना जा रहा है।
हालांकि यह भी सच है कि चुनाव जीतना और देश चलाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। अगर बालेन शाह प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता और विदेश नीति जैसे कई कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा।

