पश्चिम एशिया एक बार फिर गहरे तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। इज़राइल-हमास युद्ध, गाजा संकट, मानवीय त्रासदी और बड़े वैश्विक शक्तियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दखल ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। इसी पृष्ठभूमि में फ़िलिस्तीन ने भारत से एक महत्वपूर्ण अपील की है-कि भारत इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए और शांति स्थापना में सक्रिय योगदान दे।
फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण की विदेश मंत्री वर्सेन अघाबेकियन शाहिन ने नई दिल्ली में स्पष्ट रूप से कहा कि भारत इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त देशों में से एक है। उनका तर्क है कि भारत इज़राइल का भी मित्र है और फ़िलिस्तीन का भी, तथा वह अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रहा है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले महीने इज़राइल दौरे की संभावना जताई जा रही है, जहाँ वे इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात कर सकते हैं।
भारत–फ़िलिस्तीन–इज़राइल संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत ने ऐतिहासिक रूप से फ़िलिस्तीन के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है। भारत उन शुरुआती देशों में शामिल रहा है जिन्होंने फ़िलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। साथ ही, पिछले दो दशकों में भारत और इजराइल के संबंध रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में काफी मजबूत हुए हैं।
इस दोहरे संबंध के कारण भारत की स्थिति संतुलित रही है। भारत ने कभी भी फ़िलिस्तीन का समर्थन करते हुए इज़राइल के साथ संबंध तोड़ने की नीति नहीं अपनाई और न ही इज़राइल से करीबी बढ़ाते हुए फ़िलिस्तीन के मुद्दे को नज़रअंदाज़ किया। यही संतुलन आज भारत को एक संभावित मध्यस्थ बनाता है।
लीग ऑफ अरब स्टेट्स की बैठक और भारत की कूटनीतिक सक्रियता
फ़िलिस्तीन की यह अपील उस समय सामने आई जब भारत, League of Arab States के विदेश मंत्रियों की बैठक की मेज़बानी कर रहा है। यह बैठक लगभग 10 वर्षों बाद भारत में हो रही है। इससे पहले 2016 में इसी तरह की बैठक बहरीन के मनामा में हुई थी।
इस बैठक में भारत ने एक बार फिर दो-राज्य समाधान (Two-State Solution) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का संकेत दिया है। भारत का आधिकारिक रुख यही रहा है कि इज़राइल और फ़िलिस्तीन दोनों सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहें।
गाजा संकट, बोर्ड ऑफ पीस और भारत की सतर्क कूटनीति
अक्टूबर 2023 से गाजा पट्टी में जारी संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। इसी संदर्भ में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नामक एक वैश्विक मंच का प्रस्ताव रखा, जिसका उद्देश्य गाजा से शुरुआत कर अन्य संघर्ष क्षेत्रों में शांति स्थापित करना है।
हालाँकि, भारत ने दावोस में इस मंच के चार्टर पर हस्ताक्षर समारोह में भाग नहीं लिया। इसका कारण यह था कि भारत संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार कर बनाए गए किसी वैकल्पिक ढांचे का समर्थन नहीं करना चाहता।
इसके बावजूद भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका की भूमिका की सराहना की और United Nations Security Council के प्रस्ताव 2803 (17 नवंबर 2025) का समर्थन किया, जो गाजा संघर्ष समाप्त करने और अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की अनुमति देता है।
भारत और यूरोपीय संघ दोनों ने स्पष्ट किया कि इस प्रस्ताव को पूरी तरह, अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के भीतर लागू किया जाना चाहिए।
क्या भारत वास्तव में मध्यस्थ बन सकता है?
भारत की मध्यस्थता की संभावना के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं-
- भारत की विश्वसनीयता: भारत को किसी भी पक्ष द्वारा औपनिवेशिक या साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता।
- संतुलित संबंध: भारत के इज़राइल और फ़िलिस्तीन दोनों से कार्यशील और सम्मानजनक संबंध हैं।
- वैश्विक छवि: भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज़ और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक बताता रहा है।
- अनुभव: भारत ने ईरान-सऊदी तनाव, अफगानिस्तान, और यूक्रेन-रूस जैसे मुद्दों पर संतुलित रुख अपनाया है।
हालाँकि, चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। अमेरिका की सीधी भूमिका, ईरान-इज़राइल तनाव, हमास जैसे गैर-राज्य तत्वों की मौजूदगी और क्षेत्रीय राजनीति भारत की मध्यस्थता को जटिल बना सकती है।
निष्कर्ष:
फ़िलिस्तीन की अपील भारत के लिए एक कूटनीतिक अवसर भी है और एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी। भारत यदि संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका को बनाए रखते हुए आगे बढ़ता है, तो वह पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों में एक भरोसेमंद भूमिका निभा सकता है। हालाँकि, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी भी शक्ति-राजनीति का उपकरण न बने, बल्कि एक सिद्धांत आधारित मध्यस्थ के रूप में कार्य करे।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा
हाल के घटनाक्रमों के संदर्भ में भारत की पश्चिम एशिया नीति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 का समर्थन किया है, जो गाजा संघर्ष से संबंधित है।
- भारत ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल को संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया है।
- भारत का आधिकारिक रुख एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना के पक्ष में रहा है।
- भारत ने लीग ऑफ अरब स्टेट्स के साथ अपनी कूटनीतिक सहभागिता को हाल के वर्षों में पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 2 और 4
(d) केवल 1, 3 और 4
UPSC मुख्य परीक्षा प्रश्न
“भारत की संतुलित पश्चिम एशिया नीति उसे इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष में एक संभावित मध्यस्थ बनाती है।”
इस कथन के आलोक में भारत की भूमिका, अवसरों और सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
