मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल सप्लाई में आई रुकावट के बीच भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। जानकारी के अनुसार, अमेरिकी अनुमति मिलने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने करीब 3 करोड़ बैरल (30 मिलियन बैरल) रूसी कच्चा तेल खरीद लिया है।
इस खरीद का उद्देश्य मध्य पूर्व से आने वाली तेल आपूर्ति में आई कमी को पूरा करना है। दरअसल, क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के कारण तेल बाजार में अनिश्चितता पैदा हो गई है और कई देशों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं।
पहले कम हो रही थी रूस से तेल खरीद
पिछले साल से भारत धीरे-धीरे रूस से तेल की खरीद कम कर रहा था। इसके पीछे अमेरिका का दबाव भी एक वजह बताया जाता है। उस समय भारत ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए सऊदी अरब और इराक जैसे देशों से ज्यादा तेल खरीदना शुरू कर दिया था।
लेकिन हाल ही में मध्य पूर्व में बढ़े सैन्य तनाव ने स्थिति बदल दी। इस संघर्ष के कारण कई प्रमुख तेल आपूर्ति मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता पर असर पड़ा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से बढ़ी परेशानी
मध्य पूर्व के तेल व्यापार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। खाड़ी क्षेत्र के ज्यादातर तेल उत्पादक देश इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तेल भेजते हैं।
हालिया घटनाओं के बाद यह समुद्री मार्ग लगभग बंद हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई, जिससे इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई।
इस कारण भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े।
भारतीय कंपनियों ने तुरंत खरीदे उपलब्ध कार्गो
अमेरिका की ओर से छूट मिलने के बाद भारतीय तेल कंपनियों ने तेजी से बाजार में उपलब्ध रूसी तेल खरीदना शुरू कर दिया।
सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों ने स्पॉट मार्केट में मौजूद लगभग सभी अनबिके रूसी तेल कार्गो खरीद लिए।
बताया जा रहा है कि इन तेल खेपों को पहले ही टैंकरों पर लादा जा चुका था और वे एशियाई समुद्री क्षेत्र में मौजूद थीं, लेकिन अभी तक किसी खरीदार को नहीं बेची गई थीं।
किस कंपनी ने कितना तेल खरीदा?
जानकारी के मुताबिक, सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल ने लगभग 1 करोड़ बैरल रूसी तेल खरीदा है।
वहीं निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी करीब 1 करोड़ बैरल या उससे अधिक तेल खरीदा है।
बाकी बची मात्रा अन्य भारतीय रिफाइनरियों ने खरीदी है। हालांकि इन कंपनियों की ओर से इस खरीद पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।
अलग-अलग ग्रेड का रूसी तेल खरीदा गया
भारतीय कंपनियों ने रूस के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले कई प्रकार के कच्चे तेल की खरीद की है। इनमें प्रमुख रूप से उराल्स (Urals), ईएसपीओ (ESPO) और वरांडेय (Varandey) जैसे ग्रेड शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक इन तेलों की कीमत लंदन के डेटेड ब्रेंट बेंचमार्क से 2 से 8 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा रखी गई थी।
यह स्थिति पहले से अलग है क्योंकि मध्य पूर्व संकट से पहले रूसी तेल अक्सर इसी बेंचमार्क के मुकाबले छूट (डिस्काउंट) पर बिकता था।
कई टैंकरों ने बदला अपना रास्ता
अमेरिकी छूट मिलने के बाद समुद्र में चल रहे कई तेल टैंकरों ने भी अपना रास्ता बदल लिया।
उदाहरण के तौर पर Maylo और Sarah नाम के टैंकर पहले सिंगापुर की ओर जा रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना रुख बदलकर भारत की तरफ कर लिया। इन टैंकरों में रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से लोड किया गया उराल्स तेल था।
इसी तरह रूस के सुदूर पूर्व से ESPO ग्रेड लेकर चल रहे Oasis और Noble Walker नाम के टैंकर भी पहले चीन की ओर जा रहे थे, लेकिन बाद में उनका रास्ता बदल गया।
रूस से तेल खरीद में पहले भी आया था उछाल
भारत परंपरागत रूप से रूस से बहुत कम तेल खरीदता था। लेकिन 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद स्थिति बदल गई।
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस को अपना तेल सस्ते दामों पर बेचना पड़ा। इसका फायदा उठाते हुए भारत ने बड़े पैमाने पर रूसी तेल खरीदना शुरू किया।
मध्य-2024 तक भारत का रूसी तेल आयात 20 लाख बैरल प्रतिदिन से भी अधिक हो गया था।
हालांकि बाद में अमेरिकी दबाव के कारण इसमें कमी आई और फरवरी 2026 में यह घटकर करीब 10.6 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।
अमेरिका ने क्यों दी अस्थायी छूट?
अमेरिका ने भारत को यह छूट एक विशेष परिस्थिति में दी है। व्हाइट हाउस के अनुसार यह फैसला वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए लिया गया है।
अमेरिकी प्रेस सचिव करोलिन लेविट ने कहा कि भारत पहले भी प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद कम कर चुका है और वह अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता रहा है।
उन्होंने बताया कि यह अनुमति सिर्फ उन तेल खेपों के लिए दी गई है जो 5 मार्च से पहले टैंकरों पर लोड हो चुकी थीं और पहले से समुद्र में थीं।
रूस को ज्यादा आर्थिक फायदा नहीं होगा
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इस फैसले से रूस को ज्यादा आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा।
उनका तर्क है कि यह तेल पहले ही जहाजों में लदा हुआ था और समुद्र में मौजूद था, इसलिए यह कदम केवल अल्पकालिक सप्लाई संकट से निपटने के लिए उठाया गया है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह फैसला?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में मध्य पूर्व में किसी भी तरह का संकट सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
इसी वजह से भारत अक्सर अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर अपने आयात स्रोतों को संतुलित रखने की कोशिश करता है।

