संदर्भ :
भारत और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले हैं। वर्ष 2020 में सीमा तनाव के बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए चीनी कंपनियों और आयात पर कई प्रतिबंध लगाए। इन कदमों का उद्देश्य संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी निर्भरता को कम करना और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना था।
हालांकि समय के साथ यह सामने आया कि इन प्रतिबंधों के कारण कई सरकारी विभागों और परियोजनाओं को व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, लेकिन अंदरूनी स्तर पर प्रतिबंधों की समीक्षा पर विचार किया जा रहा है। इसके पीछे कारण यह बताया गया कि कुछ क्षेत्रों में उपकरणों की कमी और परियोजनाओं में देरी लगातार बढ़ रही है।
प्रतिबंधों का आर्थिक और परियोजना स्तर पर प्रभाव :
2020 के प्रतिबंधों के बाद चीनी कंपनियों को मिलने वाली नई परियोजनाओं में स्पष्ट गिरावट दर्ज की गई। Observer Research Foundation की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में चीनी बोलीदाताओं को दिए गए नए प्रोजेक्ट्स का मूल्य 27 प्रतिशत घटकर लगभग 1.67 अरब डॉलर रह गया। यह गिरावट दर्शाती है कि भारत ने रणनीतिक क्षेत्रों में चीन की भागीदारी सीमित करने का ठोस निर्णय लिया था।
इस नीति का सबसे अधिक असर बिजली और बुनियादी ढांचा क्षेत्र पर पड़ा। चीन से आयात होने वाले उपकरणों पर रोक के कारण भारत की तापीय बिजली क्षमता बढ़ाने की योजना प्रभावित हुई। भारत अगले दस वर्षों में अपनी तापीय बिजली क्षमता को लगभग 307 गीगावाट तक ले जाने की योजना बना रहा है, लेकिन जरूरी मशीनरी और तकनीक की कमी से कई परियोजनाएँ समय पर आगे नहीं बढ़ सकीं। इससे लागत बढ़ने और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता पैदा हुई।
इन प्रतिबंधों का असर निजी उद्योगों पर भी पड़ा। चीन की सरकारी कंपनी CRRC को 216 मिलियन डॉलर के ट्रेन निर्माण अनुबंध की बोली से बाहर कर दिया गया, जिससे यह संदेश गया कि भारत बुनियादी ढांचे जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी भागीदारी को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। जब यह खबर आई कि सरकार कुछ प्रतिबंधों में ढील दे सकती है, तो भारतीय शेयर बाजार में भी हलचल दिखी। Bharat Heavy Electricals Limited और Larsen & Toubro जैसी कंपनियों के शेयर गिरे, क्योंकि निवेशकों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा का डर था।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदलता कूटनीतिक माहौल :
भारत–चीन संबंधों में संभावित नरमी केवल घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से भी जुड़ी है। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात वर्षों बाद चीन यात्रा पर गए, जहां दोनों देशों ने व्यापार और व्यावसायिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। यह पहल ऐसे समय हुई जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए और अमेरिका–पाकिस्तान संबंधों में नजदीकी बढ़ी।
इस यात्रा के बाद भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं और चीनी पेशेवरों के लिए बिजनेस वीज़ा प्रक्रिया को आसान बनाया गया। फिर भी भारत ने चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर लगे प्रतिबंधों को पूरी तरह नहीं हटाया है। यह दिखाता है कि नई दिल्ली अब भी सतर्क है और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचना चाहती है।
इस पूरे परिदृश्य में एक उच्चस्तरीय समिति, जिसकी अध्यक्षता पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा कर रहे हैं, ने भी सुझाव दिया है कि कुछ प्रतिबंधों को व्यावहारिक जरूरतों के अनुसार नरम किया जा सकता है। समिति का मानना है कि सुरक्षा और विकास—दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
निष्कर्ष :
भारत–चीन आर्थिक संबंध आज एक नाजुक संतुलन के दौर से गुजर रहे हैं। 2020 के प्रतिबंधों ने जहां भारत की सुरक्षा और रणनीतिक सोच को मजबूती दी, वहीं उन्होंने ऊर्जा, बुनियादी ढांचा और उद्योग जैसे क्षेत्रों में कई व्यावहारिक समस्याएँ भी पैदा कीं। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना आर्थिक विकास और परियोजनाओं की गति को कैसे बनाए रखे।
प्रतिबंधों में संभावित ढील इस बात का संकेत है कि भारत बदलती परिस्थितियों के अनुसार लचीली और संतुलित नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यही संतुलन तय करेगा कि भारत–चीन संबंध सहयोग की दिशा में आगे बढ़ते हैं या प्रतिस्पर्धा और सावधानी का रास्ता ही प्रमुख बना रहता है।
प्रश्न : भारत द्वारा 2020 के बाद चीन से संबंधित आर्थिक और निवेश प्रतिबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इन प्रतिबंधों के बाद भारत में चीनी कंपनियों को दिए गए नए प्रोजेक्ट्स का कुल मूल्य घटा है।
- ऊर्जा और बिजली क्षेत्र में चीनी उपकरणों पर रोक से भारत की तापीय बिजली क्षमता विस्तार योजना प्रभावित हुई है।
- भारत ने हाल ही में चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर लगे सभी प्रतिबंध पूरी तरह हटा दिए हैं।
- अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने से भारत-चीन आर्थिक संवाद को नया संदर्भ मिला है।
सही कथनों का चयन कीजिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
प्रश्न : (GS-III / GS-II)
भारत द्वारा 2020 में चीन पर लगाए गए आर्थिक और निवेश प्रतिबंधों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी, लेकिन साथ ही बुनियादी ढांचा और ऊर्जा क्षेत्र में व्यावहारिक चुनौतियाँ भी उत्पन्न कीं। आलोचनात्मक रूप से चर्चा कीजिए कि भारत इन अनुभवों के आधार पर सुरक्षा, आर्थिक विकास और वैश्विक कूटनीति के बीच संतुलन कैसे बना सकता है।
