अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की शुरुआत की। इस कार्यक्रम में भारत शामिल नहीं हुआ, जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ट्रम्प के साथ मंच पर मौजूद रहे और इस संगठन के चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
भारत की गैर-मौजूदगी और पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि इस बोर्ड का असली मकसद क्या है और दुनिया के बड़े देश इससे दूरी क्यों बना रहे हैं।
लॉन्च कार्यक्रम कैसा रहा?
दावोस के एक रिसॉर्ट में यह कार्यक्रम बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया गया। अलग-अलग देशों के नेता जोड़ी बनाकर मंच पर आए। वहां एक लंबी मेज लगाई गई थी, जहां राष्ट्रपति ट्रम्प के पास बैठकर नेताओं ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को ट्रम्प के ठीक दाहिनी ओर बैठाया गया। दोनों ने हाथ मिलाया और कुछ देर बात भी की। यह दृश्य खास रहा, क्योंकि इससे यह संकेत गया कि इस नए संगठन में पाकिस्तान को अहम जगह दी जा रही है।
कई हफ्तों की बातचीत के बाद लगभग 35 देशों ने इस चार्टर पर हस्ताक्षर किए। लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन, चीन और जर्मनी जैसे बड़े देशों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया।
भारत ने दूरी क्यों बनाई?
इस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रण मिला था, लेकिन भारत इसमें शामिल नहीं हुआ। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत ने इस प्रस्ताव को न तो स्वीकार किया और न ही साफ तौर पर मना किया।
अधिकारियों ने बताया कि भारत इस पहल को सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नजरिए से ध्यान से देख रहा है। भारत हमेशा से फिलिस्तीन मुद्दे पर दो-देश समाधान का समर्थन करता आया है, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दोनों शांति से अलग-अलग देशों के रूप में रहें।
भारत की गैर-मौजूदगी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि पाकिस्तान इस मंच पर शामिल हुआ। भारत पहले ही पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाता रहा है। इसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुआ आतंकी हमला भी शामिल है।
किन देशों ने हस्ताक्षर किए?
पाकिस्तान के अलावा जिन देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की पुष्टि की है, उनमें अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाकिस्तान, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और वियतनाम शामिल हैं।
वहीं, जर्मनी, इटली, रूस, तुर्की, यूक्रेन और स्लोवेनिया जैसे देश फिलहाल इससे जुड़े नहीं हैं। फ्रांस ने साफ मना कर दिया है, ब्रिटेन ने कहा है कि वह अभी इसमें शामिल नहीं होगा, और चीन ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भी भारत अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर मजबूत स्थिति में है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इयान ब्रेमर ने कहा कि अमेरिका भारत को सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि दोस्त और साझेदार मानता है। इससे भारत को ट्रम्प प्रशासन से बातचीत में ज्यादा आज़ादी मिलती है।
उनका कहना है कि भारत को व्यापार पर ध्यान देना चाहिए और बोर्ड ऑफ पीस जैसे संगठनों से जुड़ने से पहले यह देखना चाहिए कि इससे संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों की भूमिका कमजोर न हो।
ट्रम्प का भारत-पाक तनाव पर दावा
कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने एक बार फिर कहा कि उनके हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध टल गया था। भारत पहले ही इस दावे को खारिज कर चुका है।
ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका की वजह से दो परमाणु देशों के बीच संघर्ष रुक गया और लाखों लोगों की जान बची। उन्होंने यह बात वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में एक दिन पहले भी कही थी।
ये बयान मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव से जुड़े हैं। यह तनाव ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आया था, जब भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर हमले किए थे।
क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?
डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि बोर्ड ऑफ पीस एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मकसद
- संघर्ष वाले इलाकों में शांति लाना
- वहां स्थिर सरकार बनाना
- और लंबे समय तक शांति बनाए रखना
शुरुआत में इस बोर्ड को गाजा के पुनर्निर्माण के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ा दिया गया है।
ट्रम्प ने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम करेगा, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र की ताकत का सही इस्तेमाल अब तक नहीं हो पाया है।
संयुक्त राष्ट्र को लेकर चिंता
इस पहल को लेकर कई देशों में चिंता भी है। कई राजनयिकों का मानना है कि बोर्ड ऑफ पीस कहीं संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर न कर दे।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में से अमेरिका के अलावा किसी और देश ने इसमें शामिल होने की हामी नहीं भरी है।
कार्यकारी बोर्ड भी बना
व्हाइट हाउस ने बोर्ड ऑफ पीस के लिए एक कार्यकारी बोर्ड भी बनाया है। इसमें
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर,
ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर, और विश्व बैंक प्रमुख अजय बंगा जैसे नाम शामिल हैं। यह बोर्ड गाजा से जुड़ी योजनाओं और प्रशासन पर नजर रखेगा।
निष्कर्ष:
ट्रम्प का बोर्ड ऑफ पीस दुनिया में शांति के नाम पर एक नई पहल है, लेकिन भारत की दूरी और कई बड़े देशों की गैर-मौजूदगी ने इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत फिलहाल सावधानी के साथ इस प्रस्ताव को देख रहा है, जबकि पाकिस्तान की भागीदारी ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं।
