संदर्भ :
भारत और जापान के बीच रणनीतिक साझेदारी एक नए और निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। हाल ही में नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद जापान के विदेश मंत्री मोटेगी तोशिमित्सु ने भारत के लिए एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि जापान वर्ष 2030 तक भारत के 500 उच्च कुशल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टेक प्रोफेशनल्स को अपने देश में आमंत्रित करेगा और उन्हें संयुक्त अनुसंधान में भागीदार बनाएगा।
इस वार्ता में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी उपस्थित थे। दोनों नेताओं ने एआई, आर्थिक सुरक्षा, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और वैश्विक शासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया। यह पहल न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगी, बल्कि एशिया–प्रशांत क्षेत्र में तकनीकी और रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करेगी।
भारत–जापान एआई सहयोग: एक रणनीतिक दृष्टि
कृत्रिम बुद्धिमत्ता 21वीं सदी की सबसे परिवर्तनकारी तकनीक मानी जा रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा, उद्योग और शासन-हर क्षेत्र में एआई भविष्य की दिशा तय कर रही है। इसी संदर्भ में भारत और जापान ने “जापान–भारत एआई रणनीतिक संवाद” स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है।
इस संवाद का उद्देश्य केवल तकनीकी आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि संयुक्त अनुसंधान, मानव संसाधन विकास और नीति-निर्माण में सहयोग को संस्थागत रूप देना है।
जापान द्वारा 500 भारतीय एआई पेशेवरों को आमंत्रित करने का प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि जापान भारत की मानव पूंजी और तकनीकी क्षमता को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। भारत के पास बड़ी संख्या में युवा, कुशल और नवाचार-क्षम टेक प्रोफेशनल्स हैं, जबकि जापान के पास उन्नत अनुसंधान ढांचा, पूंजी और औद्योगिक अनुभव है। दोनों का यह संयोजन वैश्विक एआई परिदृश्य में एक शक्तिशाली मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
एआई इम्पैक्ट समिट और वैश्विक तकनीकी भूमिका
जापान के विदेश मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि जापान, भारत द्वारा आयोजित होने वाले “एआई इम्पैक्ट समिट” की सफलता में सक्रिय योगदान देना चाहता है। यह समिट एआई के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक प्रभावों पर वैश्विक संवाद को आगे बढ़ाने का मंच बनेगा।
इससे यह संकेत मिलता है कि भारत और जापान एआई को केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा का साधन नहीं, बल्कि जिम्मेदार और मानव-केंद्रित तकनीक के रूप में विकसित करना चाहते हैं।
आर्थिक सुरक्षा और सप्लाई चेन सहयोग
एआई के साथ-साथ दोनों देशों ने आर्थिक सुरक्षा को भी अपनी साझेदारी का प्रमुख स्तंभ बनाया है। हाल के वर्षों में वैश्विक सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी और औद्योगिक आत्मनिर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान जिन पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई थी, उन पर अब ठोस कार्रवाई का निर्णय लिया गया है। ये क्षेत्र हैं-
- सेमीकंडक्टर
- महत्वपूर्ण खनिज
- सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी
- स्वच्छ ऊर्जा
- फार्मास्यूटिकल्स
इन क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए वर्ष की पहली तिमाही में “जापान–भारत निजी क्षेत्र आर्थिक सुरक्षा संवाद” (बी-टू-बी) शुरू किया जाएगा। इसके बाद जल्द ही दूसरा जापान–भारत आर्थिक सुरक्षा संवाद (जी-टू-जी) भी आयोजित होगा।
यह व्यवस्था सरकार और निजी क्षेत्र-दोनों स्तरों पर समन्वय को मजबूत करेगी।
सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिज: भविष्य की रीढ़
सेमीकंडक्टर आज हर आधुनिक तकनीक की रीढ़ हैं-मोबाइल, एआई, ऑटोमोबाइल, रक्षा और अंतरिक्ष तक। वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर आपूर्ति कुछ गिने-चुने देशों तक सीमित है।
भारत और जापान का सहयोग इस निर्भरता को कम करने और वैकल्पिक, भरोसेमंद सप्लाई चेन विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इसी प्रकार, महत्वपूर्ण खनिज-जैसे लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ-ऊर्जा संक्रमण और स्वच्छ तकनीकों के लिए आवश्यक हैं। इन क्षेत्रों में साझेदारी दोनों देशों को रणनीतिक बढ़त दे सकती है।
क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और एक्ट ईस्ट फोरम
वार्ता में केवल तकनीक और अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भू-राजनीति पर भी चर्चा हुई। दोनों मंत्रियों ने दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका की स्थिति पर विचार साझा किए।
विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी भारत और आसपास के क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए बौद्धिक संवाद और जापान–भारत एक्ट ईस्ट फोरम के तहत सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।
यह सहयोग भारत की एक्ट ईस्ट नीति और जापान की फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक रणनीति के बीच तालमेल को दर्शाता है।
वैश्विक शासन और बहुपक्षीय सुधार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच दोनों देशों ने जिम्मेदार वैश्विक शासन पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया।
इसमें-
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सहयोग
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार
जैसे विषय शामिल रहे। भारत और जापान दोनों ही नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समर्थक हैं और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार को समय की मांग मानते हैं।
75 वर्ष की कूटनीतिक यात्रा और आगे की दिशा
भारत और जापान वर्ष 2027 में अपने राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ मनाएंगे। इस अवसर पर दोनों देशों ने यह स्पष्ट किया कि उनकी साझेदारी केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक और रणनीतिक स्वरूप ले चुकी है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, तकनीकी बदलाव और भू-आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत–जापान सहयोग स्थिरता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।
सैद्धांतिक दृष्टिकोण से महत्त्व
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों की दृष्टि से देखें तो यह साझेदारी-
- यथार्थवाद के तहत शक्ति-संतुलन
- उदारवाद के तहत सहयोग और संस्थागत संवाद
- तथा संरचनावाद के तहत साझा मूल्यों और मानदंडों
तीनों को एक साथ दर्शाती है। एआई और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सहयोग केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता और नियम-निर्माण क्षमता को भी मजबूत करता है।
निष्कर्ष :
भारत और जापान के बीच एआई, सेमीकंडक्टर और सप्लाई चेन पर बना यह नया मास्टरप्लान 21वीं सदी की साझेदारी का उदाहरण है। 500 भारतीय एआई पेशेवरों को आमंत्रित करने की पहल मानव संसाधन, अनुसंधान और नवाचार को नई दिशा देगी।
यह सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए लाभकारी होगा, बल्कि एशिया–प्रशांत और वैश्विक व्यवस्था में जिम्मेदार, समावेशी और तकनीक-आधारित विकास का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।
प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
भारत–जापान रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- दोनों देशों ने जापान–भारत एआई रणनीतिक संवाद स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है।
- जापान वर्ष 2030 तक भारत से 500 उच्च कुशल एआई पेशेवरों को आमंत्रित करेगा।
- सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिज भारत–जापान आर्थिक सुरक्षा सहयोग के प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं।
सही कथनों का चयन कीजिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – II)
भारत–जापान एआई रणनीतिक संवाद और आर्थिक सुरक्षा सहयोग के आलोक में, दोनों देशों की साझेदारी के रणनीतिक तथा भू-आर्थिक निहितार्थों की चर्चा कीजिए।
यह सहयोग भारत के इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण को कैसे सुदृढ़ करता है?
