भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को लेकर एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय सौदा होने की संभावना बन रही है। इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए भारत के साथ समझौता किया है और दोनों देशों के बीच इस सौदे पर बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है।
इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता रिको रिकार्डो सिरैत ने सोमवार को न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि यह समझौता देश की सैन्य क्षमता को आधुनिक बनाने की योजना का हिस्सा है। इसके तहत इंडोनेशिया अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहता है।
बताया जा रहा है कि भारत और रूस की साझेदारी वाली कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस जकार्ता के साथ करीब 200 मिलियन डॉलर से 350 मिलियन डॉलर के बीच की डील पर चर्चा कर रही है। अगर यह समझौता पूरा हो जाता है तो इंडोनेशिया भी उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जो भारत की ब्रह्मोस मिसाइल खरीद रहे हैं।
रक्षा क्षमता बढ़ाने की योजना का हिस्सा
इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी रक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसके लिए वह नए हथियार सिस्टम और उन्नत तकनीक को अपनी सेना में शामिल कर रहा है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यह मिसाइल समुद्री और तटीय सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर सकती है।
एशिया के कई देशों में समुद्री सीमाओं को लेकर तनाव की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में तेज और सटीक हमला करने वाली मिसाइलें किसी भी देश की सैन्य ताकत को मजबूत बनाती हैं।
फिलीपींस पहले ही खरीद चुका है ब्रह्मोस
इंडोनेशिया से पहले फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदने वाला पहला विदेशी देश बन चुका है।
भारत ने 19 अप्रैल 2024 को फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की पहली खेप सौंपी थी। इसके लिए जनवरी 2022 में दोनों देशों के बीच 375 मिलियन डॉलर यानी करीब 3130 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था।
इन मिसाइलों को भारतीय वायुसेना के C-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए फिलीपींस तक पहुंचाया गया था। फिलीपींस मरीन कॉर्प्स को यह सिस्टम सौंपा गया था ताकि वह अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत कर सके।

दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव के बीच डील
फिलीपींस को ब्रह्मोस की आपूर्ति ऐसे समय में हुई थी जब दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच तनाव बढ़ा हुआ था।
फिलीपींस ने योजना बनाई थी कि वह ब्रह्मोस के तीन मिसाइल सिस्टम अपने तटीय इलाकों में तैनात करेगा। इसका उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में संभावित खतरों का सामना करना है।
इसी तरह इंडोनेशिया भी अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इस मिसाइल सिस्टम में दिलचस्पी दिखा रहा है।
क्या है ब्रह्मोस मिसाइल?
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसका मतलब है कि यह ध्वनि की गति से कई गुना तेज रफ्तार से उड़ान भर सकती है।
इस मिसाइल को भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है। इसका निर्माण ब्रह्मोस एयरोस्पेस नाम की संयुक्त कंपनी करती है।
भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओएम संस्था के बीच 1998 में इस मिसाइल को विकसित करने का समझौता हुआ था। इसके बाद कई सालों की रिसर्च और परीक्षण के बाद इसे सेना में शामिल किया गया।
भारतीय सेना को कब मिली ब्रह्मोस?
भारत की सेना को पहली बार 2007 में ब्रह्मोस मिसाइल मिली थी। इसके बाद धीरे-धीरे सेना के तीनों अंगों में इस मिसाइल को शामिल किया गया।
2011 में भारतीय सेना ने लगभग 3000 करोड़ रुपये की ब्रह्मोस मिसाइलों का ऑर्डर दिया था। इसके बाद 2013 तक भारतीय नौसेना और वायुसेना ने भी करीब 6800 करोड़ रुपये के ब्रह्मोस सिस्टम का ऑर्डर दिया।
आज यह मिसाइल भारत की रक्षा प्रणाली का अहम हिस्सा बन चुकी है।
ब्रह्मोस की खासियतें
ब्रह्मोस मिसाइल अपनी तेज गति और सटीक निशाने के लिए जानी जाती है।
यह मिसाइल लगभग मैक 2.8 की गति से उड़ सकती है। मैक का मतलब ध्वनि की गति होता है। एक मैक लगभग 332 मीटर प्रति सेकेंड के बराबर माना जाता है।
इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 290 किलोमीटर तक है। यह कम समय में दुश्मन के ठिकाने को निशाना बना सकती है।
ब्रह्मोस को जमीन, जहाज, पनडुब्बी और विमान से भी लॉन्च किया जा सकता है। यही वजह है कि इसे बहुउद्देश्यीय मिसाइल माना जाता है।
अलग-अलग वर्जन में उपलब्ध
ब्रह्मोस मिसाइल के कई संस्करण तैयार किए गए हैं।
इसके लैंड लॉन्च, शिप लॉन्च, सबमरीन लॉन्च और एयर लॉन्च वर्जन विकसित किए जा चुके हैं और उनका परीक्षण भी किया जा चुका है।
पनडुब्बी से इस मिसाइल को समुद्र के भीतर लगभग 40 से 50 मीटर की गहराई से भी छोड़ा जा सकता है। पनडुब्बी से लॉन्च होने वाले इस वर्जन का परीक्षण 2013 में किया गया था।
ब्रह्मोस-II पर भी काम जारी
भारत और रूस मिलकर ब्रह्मोस के अगले संस्करण ब्रह्मोस-II पर भी काम कर रहे हैं।
माना जा रहा है कि यह मिसाइल पहले से ज्यादा तेज और लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम होगी। इसकी संभावित रेंज लगभग 1500 किलोमीटर तक हो सकती है।
ब्रह्मोस नाम कैसे पड़ा?
ब्रह्मोस नाम को लेकर दो तरह की बातें कही जाती हैं।
कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह नाम भगवान ब्रह्मा के शक्तिशाली अस्त्र ‘ब्रह्मास्त्र’ से प्रेरित है।
वहीं कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी के नाम को मिलाकर रखा गया है।
एक मिसाइल सिस्टम में क्या होता है?
ब्रह्मोस का एक पूरा सिस्टम कई हिस्सों से मिलकर बनता है।
एक सिस्टम में आमतौर पर दो मिसाइल लॉन्चर, एक रडार और एक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर शामिल होता है।
इस सिस्टम के जरिए बहुत कम समय में दुश्मन के ठिकानों पर हमला किया जा सकता है। बताया जाता है कि दो ब्रह्मोस मिसाइलों को केवल 10 सेकेंड के भीतर लॉन्च किया जा सकता है।
क्या बढ़ेगा भारत का रक्षा निर्यात?
पिछले कुछ वर्षों में भारत अपने रक्षा उपकरणों के निर्यात पर खास ध्यान दे रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया के सबसे तेज एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों में से एक माना जाता है।
फिलीपींस के बाद अगर इंडोनेशिया भी इस मिसाइल को खरीद लेता है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक बड़ी सफलता होगी।

