हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत डूबा, 80 से ज्यादा नाविकों की मौत, भारत के लिए क्यों अहम है यह घटना?

4 मार्च को ईरान से जुड़े युद्ध ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसने भारत के रणनीतिक क्षेत्र तक हलचल पैदा कर दी। जिस समय भारत में होली का त्योहार मनाया जा रहा था, उसी दौरान हिंद महासागर में एक बड़ी सैन्य घटना सामने आई। अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के एक युद्धपोत को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। इस हमले में 80 से अधिक नाविकों की मौत हो गई, जबकि लगभग 100 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।


डूबने वाला जहाज ईरान की नौसेना का युद्धपोत IRIS Dena था। यह जहाज हाल ही में भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित दो बड़े समुद्री अभ्यासों में हिस्सा लेकर वापस लौट रहा था। इसी वजह से इस घटना ने भारत में भी राजनीतिक और रणनीतिक बहस छेड़ दी है। विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा है कि भारत अपने ही क्षेत्र में प्रभाव खोता जा रहा है। हालांकि कई सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।


क्यों अहम है यह घटना
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया युद्ध अब सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसका असर अब हिंद महासागर तक पहुंच गया है, जिसे भारत अपने रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है।


भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी बड़े सैन्य टकराव का होना भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

Iranian warship sinks Indian Ocean

IRIS Dena भारत क्यों आया था

ईरान की नौसेना का यह फ्रिगेट जहाज 16 फरवरी को विशाखापट्टनम पहुंचा था। यहां वह International Fleet Review (IFR) और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास MILAN-2026 में भाग लेने आया था। इन दोनों कार्यक्रमों का आयोजन भारतीय नौसेना ने किया था।

 

जब यह जहाज विशाखापट्टनम पहुंचा, तब भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान ने उसका स्वागत किया था। भारत ने इसे दोनों देशों के बीच पुराने सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों का प्रतीक बताया था।

 

इस नौसैनिक अभ्यास में लगभग 74 देशों ने हिस्सा लिया था। हालांकि अमेरिका इसमें शामिल नहीं हुआ था। अमेरिकी नौसेना का गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर USS Pinckney इसमें भाग लेने वाला था, लेकिन उसने आखिरी समय में अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया।

 

यह अभ्यास 25 फरवरी को समाप्त हुआ। इसके तीन दिन बाद अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध का माहौल बन गया।

 

हिंद महासागर में कैसे हुआ हमला

नौसैनिक अभ्यास खत्म होने के बाद IRIS Dena विशाखापट्टनम से अपने देश लौट रहा था। 4 मार्च को श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास, अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में इस जहाज पर हमला हुआ।

 

अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर इस जहाज को डुबो दिया। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में की गई।

 

इस बयान ने विवाद को और बढ़ा दिया क्योंकि ईरान का कहना है कि यह जहाज बिना किसी चेतावनी के निशाना बनाया गया।

 

ईरान की प्रतिक्रिया

ईरान ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि यह जहाज भारतीय नौसेना का मेहमान था और इसमें करीब 130 नाविक सवार थे।

 

उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में बिना चेतावनी के इस तरह हमला करना गंभीर मामला है और अमेरिका को इसके लिए पछताना पड़ेगा।

 

ईरान का यह बयान इस घटना को और संवेदनशील बना देता है क्योंकि जहाज भारत में आयोजित अभ्यास से लौट रहा था।

 

भारत की चुप्पी और विपक्ष का हमला

इस पूरे मामले पर भारत सरकार ने अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं दिया है। सरकार ने केवल इतना कहा है कि अमेरिका द्वारा भारत के बंदरगाहों का उपयोग ईरान पर हमला करने के लिए किए जाने की खबरें सही नहीं हैं।

 

हालांकि सरकार की इस चुप्पी को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने कहा कि भारत अपने ही क्षेत्र में प्रभाव खो रहा है।

 

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत की चुप्पी देश की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही है।

 

पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि भारत को कम से कम यह कहना चाहिए था कि इस क्षेत्र में इस तरह की कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।

 

क्या भारत को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस घटना के लिए भारत को जिम्मेदार माना जा सकता है।

 

रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों का मानना है कि भारत को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

 

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ संदीप उन्नीथन के अनुसार भारत की जिम्मेदारी तब तक होती है जब तक कोई जहाज उसके क्षेत्रीय जल में मौजूद होता है। जैसे ही कोई जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में चला जाता है, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस देश की नहीं रहती जिसने उसे आमंत्रित किया था।

 

उनका कहना है कि ईरान का जहाज युद्ध के समय समुद्र में यात्रा कर रहा था, इसलिए उसे अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए थी।

 

भारत का अधिकार क्षेत्र कितना है

समुद्री कानून के अनुसार किसी भी देश का विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी Exclusive Economic Zone (EEZ) उसकी तटरेखा से लगभग 200 नॉटिकल मील या करीब 370 किलोमीटर तक होता है।

 

जानकारी के अनुसार IRIS Dena इस क्षेत्र से बाहर डूबा था। इसका मतलब यह है कि घटना अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में हुई, जहां किसी एक देश का सीधा नियंत्रण नहीं होता।

 

इसी वजह से भारत कानूनी रूप से इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।

 

नौसेना से सुरक्षा क्यों नहीं मांगी गई

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान चाहता तो वह भारतीय नौसेना से सुरक्षा या एस्कॉर्ट मांग सकता था।

 

पूर्व सेना अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने कहा कि जहाज ने भारतीय नौसेना से किसी प्रकार की सुरक्षा या सहायता नहीं मांगी थी। इसलिए भारत की भूमिका सीमित हो जाती है।

 

उनका कहना था कि जब कोई जहाज किसी देश के समुद्री क्षेत्र से बाहर निकल जाता है, तो उस देश की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है।

 

नैतिक जिम्मेदारी पर बहस

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर कानूनी जिम्मेदारी भले ही न हो, लेकिन नैतिक स्तर पर सवाल उठ सकते हैं।

 

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि ईरानी जहाज उस इलाके में इसलिए मौजूद था क्योंकि उसे भारत ने नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। इसलिए इस घटना को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।

 

LEMOA समझौता भी चर्चा में

इस घटना के बाद भारत और अमेरिका के बीच हुए LEMOA समझौते की भी चर्चा हो रही है। LEMOA यानी Logistics Exchange Memorandum of Agreement पर भारत और अमेरिका ने 2016 में हस्ताक्षर किए थे।

 

इस समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों और लॉजिस्टिक सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं। हालांकि यह सुविधा तभी दी जाती है जब दोनों देशों की सहमति हो।

 

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत किसी भी युद्ध में अपने आप शामिल हो जाएगा।

 

आगे क्या हो सकता है

हिंद महासागर में हुई इस घटना ने साफ कर दिया है कि मिडिल-ईस्ट का संघर्ष अब दूर का मामला नहीं रहा। इसका असर भारत के रणनीतिक क्षेत्र तक पहुंच चुका है।

 

भारत के सामने अब चुनौती यह है कि वह अपने कूटनीतिक संतुलन को बनाए रखे। भारत के अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों के साथ अलग-अलग तरह के संबंध हैं। ऐसे में भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है।