मुंबई में मराठा समुदाय ने आरक्षण की मांग को लेकर आजाद मैदान में बड़ा प्रदर्शन किया। इस आंदोलन का नेतृत्व मनोज जरांगे कर रहे हैं। मार्च मानखुर्द चौकी से शुरू होकर आजाद मैदान तक पहुंचा, जहां जरांगे ने अनशन शुरू किया। प्रशासन ने मैदान में केवल 5,000 लोगों के एकत्रित होने की अनुमति दी थी, लेकिन प्रदर्शन में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से इससे ज्यादा लोग शामिल हुए।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि सरकार इस आंदोलन के खिलाफ नहीं है क्योंकि पहले ही 10% आरक्षण मराठा समुदाय को दिया जा चुका है। वहीं, प्रदर्शनकारी इसे अपर्याप्त मानते हैं और मांग कर रहे हैं कि मराठा समुदाय को OBC कोटे में शामिल किया जाए।
मनोज जरांगे की भूख हड़ताल और संघर्ष:
मनोज जरांगे की भूख हड़ताल का यह दूसरा दिन है। उन्होंने जालना से मुंबई के लिए मार्च किया और 29 अगस्त को आजाद मैदान में अनशन शुरू किया। जरांगे ने स्पष्ट किया कि जब तक समुदाय की मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे।

मनोज जारंगे कौन हैं?
मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जारंगे पाटिल मूल रूप से महाराष्ट्र के बीड जिले के मातोरी गांव के रहने वाले हैं। वर्तमान में वे अपने परिवार के साथ जालना में रहते हैं। साल 2010 में जब वे 12वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और आंदोलनों से जुड़ गए। अपने जीवन-यापन के लिए उन्होंने होटल में भी काम किया। जारंगे की पारिवारिक स्थिति आर्थिक रूप से मजबूत नहीं रही।
साल 2016 से 2018 तक उन्होंने जालना में आरक्षण आंदोलन का नेतृत्व किया। इसके बाद उन्होंने आरक्षण से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए ‘शिवबा’ नामक संगठन की स्थापना की। शुरुआत में वे कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में सक्रिय थे, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपने आंदोलन पर फोकस किया।
मनोज जरांगे की प्रमुख मांग:
मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे की मुख्य मांग है कि सभी मराठों को कुनबी के रूप में मान्यता दी जाए, जो ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के तहत आने वाली एक कृषि जाति है। इस मान्यता के मिलने से मराठा समुदाय के लोग सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के पात्र बनेंगे।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम:
विरोध प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने आजाद मैदान और उसके आसपास सुरक्षा बढ़ा दी है। अधिकारियों के अनुसार, दक्षिण मुंबई में 20,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों के आने की संभावना है।
केंद्रीय बलों की तैनाती: स्थानीय पुलिस के साथ-साथ सीआरपीएफ, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और महाराष्ट्र सुरक्षा बल (MSF) की टीमें भी प्रदर्शन स्थल पर तैनात की गई हैं। इसका उद्देश्य किसी भी अप्रिय घटना को रोकना और शांति बनाए रखना है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और इतिहास:
मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे का यह आंदोलन नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से वे मराठा समुदाय के सामाजिक और शैक्षणिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जरांगे पहले भी इसी आरक्षण मुद्दे को लेकर भूख हड़ताल कर चुके हैं, जिस पर उस समय सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया था।
हालांकि, उस आश्वासन के बाद भी सरकार की धीमी कार्रवाई के चलते जरांगे ने फिर से आंदोलन शुरू कर दिया। उनका कहना है कि मराठा समुदाय के हितों के लिए यह आंदोलन ज़रूरी है और वे पीछे नहीं हटेंगे।
- मुख्य मांगें और कानूनी पृष्ठभूमि:
सरकार ने 2018 में मराठा आंदोलन को देखते हुए समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) घोषित किया और 16% आरक्षण प्रदान किया। लेकिन इस आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं। मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने यह आरक्षण रद्द कर दिया।
वर्तमान में जरांगे और उनके समर्थक स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्हें SEBC आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
- मराठाओं को ओबीसी में शामिल किया जाए, ताकि वे सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के पात्र बन सकें।
- पूरे समुदाय कोकुनबी जाति में शामिल किया जाए, जो पहले से ही ओबीसी श्रेणी में शामिल है।
- सगे-सोयरे की नीति लागू की जाए, ताकि किसी का कुनबी प्रमाण पत्र बनने पर उसके सगे संबंधियों का भी प्रमाण पत्र बन सके।
- आरक्षण की सीमा को50% से अधिक किया जाए, ताकि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का जोखिम न रहे।
मनोज जारंगे के हालिया आंदोलन और पिछला अनुभव:
- पहला आंदोलन:सितंबर 2023 में जालना के अंतरवली-सारथी गांव में जारंगे ने भूख हड़ताल की; सरकार ने कुनबी समाज के रिकॉर्ड और प्रमाणपत्र तैयार करने का वादा किया।
- पद यात्रा:26 जनवरी 2024 से मराठा क्रांति मोर्चा और सकल मराठा समाज के बैनर तले जालना से मुंबई आजाद मैदान तक पदयात्रा की।
- मुख्य मांग:मराठाओं को कुनबी प्रमाणपत्र दिलाना, ताकि उन्हें ओबीसी श्रेणी के तहत 27% आरक्षण का लाभ मिले।
- अनिश्चितकालीन उपवास:आंदोलन की गूंज बढ़ने पर जारंगे ने वाशी में उपवास शुरू किया; 27 जनवरी 2024 को मुख्यमंत्री आश्वासन मिलने पर उपवास समाप्त किया।
- विधेयक पारित:फरवरी 2024 में विधानसभा ने 10% मराठा आरक्षण विधेयक पास किया।
मराठा आरक्षण समितियों का कार्यकाल बढ़ाया
महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण समितियों का कार्यकाल 30 जून 2026 तक बढ़ा दिया है। ये समितियां कुनबी जाति के पात्र मराठाओं को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का काम करती हैं। पहले यह कार्यकाल 30 जून 2025 तक था। इन समितियों का गठन 25 जनवरी 2024 को किया गया था और पहले उनका कार्यकाल 30 जून 2025 तक निर्धारित किया गया था। अब इसे एक साल और बढ़ा दिया गया है ।
भारत में मराठा समुदाय के बारे में:
मराठा समुदाय मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाया जाता है और ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय योद्धा और शासक के रूप में जाना जाता है। 17वीं शताब्दी में शिवाजी द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य के तहत मराठों ने अपने सैन्य कौशल और नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया।
सामाजिक संरचना: समय के साथ मराठे कृषि, व्यापार और राजनीति सहित विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हो गए। समाज में ऊपरी वर्ग में देशमुख, भोंसले, मोरे, शिर्के, जाधव जैसे क्षत्रिय शामिल हैं, जबकि अन्य वर्ग मुख्य रूप से कुणबी नामक कृषक उपजाति से संबंधित हैं। मराठों को कुल 96 कुलों (शाहन्नो कुली) में विभाजित किया गया है, जो क्षत्रिय वर्ण से जुड़े हैं।
सांस्कृतिक महत्व: सांस्कृतिक रूप से मराठों को हिंदू धर्म के रक्षक और विजेता के रूप में देखा जाता है। महाराष्ट्र की सीमाओं के बाहर भी मराठों का प्रभाव रहा है। उदाहरण के तौर पर, गायकवाड़ (बड़ौदा, गुजरात), सिंधिया (ग्वालियर, मध्य प्रदेश) और भोंसले (तंजावुर, तमिलनाडु) जैसे मराठा राजवंश महाराष्ट्र के बाहर अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
मराठा आरक्षण विधेयक का संवैधानिक आधार:
मराठा आरक्षण विधेयक भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों पर आधारित है। इसे अनुच्छेद 342A(3) के तहत मराठा समुदाय को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) के रूप में निर्दिष्ट किया गया है। इसके माध्यम से इस वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) के तहत सुनिश्चित किया गया है।
- अनुच्छेद 342A(3) के अनुसार, प्रत्येक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश अपने क्षेत्र में सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची तैयार कर सकता है और इसका उपयोग कर सकता है। ये सूचियाँ केंद्रीय सूची से अलग हो सकती हैं।
- अनुच्छेद 15(4) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान कर सके। अनुच्छेद 15(5) राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के आरक्षण का अधिकार देता है (अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर)।
- अनुच्छेद 16(4) राज्य को पिछड़े वर्ग के नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं और पदों में आरक्षण की व्यवस्था करने का अधिकार देता है, यदि वह वर्ग राज्य की सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता।
- इस प्रकार, मराठा आरक्षण विधेयक संविधान के ये प्रावधानों का उपयोग करके समुदाय के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण सुनिश्चित करता है।
निष्कर्ष:
मनोज जारंगे के आंदोलन ने मराठा समुदाय के आरक्षण मुद्दे को फिर से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उनके लगातार संघर्ष और भूख हड़ताल जैसी सक्रियताओं ने सरकार को कदम उठाने के लिए बाध्य किया। जारंगे की रणनीति पद यात्रा, अनिश्चितकालीन उपवास और संगठित आंदोलन ने मराठा समुदाय के लिए ओबीसी आरक्षण और कुनबी प्रमाणपत्र सुनिश्चित करने की दिशा में असर दिखाया है।