चार दिन का भारत दौरा, नए समझौते और पुरानी दूरियां, क्या मार्क कार्नी की यात्रा से बदलेंगे भारत-कनाडा संबंध?

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी आज चार दिन की भारत यात्रा पर पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा है। ऐसे समय में यह यात्रा हो रही है जब पिछले एक साल में दोनों देशों के रिश्ते तनाव से गुजरे हैं। अब दोनों सरकारें रिश्तों को फिर से सामान्य करने और आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं। इस दौरे का मुख्य फोकस व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, रक्षा और निवेश पर रहेगा।

 

दौरे का कार्यक्रम और मुख्य बैठक

मार्क कार्नी 1 मार्च को नई दिल्ली पहुंचेंगे। 2 मार्च को उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता होगी। इस बैठक में लंबे समय से रुकी हुई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA की वार्ता को दोबारा शुरू करने पर चर्चा होगी। इसके अलावा सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर भी बात होगी। दोनों देशों ने व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।

 

भारत दौरे के बाद कार्नी ऑस्ट्रेलिया और जापान की यात्रा पर जाएंगे। उनका पूरा विदेश दौरा 27 फरवरी से 7 मार्च तक चलेगा। इस यात्रा का एक बड़ा मकसद कनाडा की अमेरिका पर आर्थिक निर्भरता कम करना और नए बाजार खोजना भी है।

Mark Carney India visit

मुंबई में बिजनेस लीडर्स से मुलाकात

भारत में निवेश बढ़ाने के लिए कार्नी मुंबई में बड़े उद्योगपतियों और निवेशकों से भी मिलेंगे। इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में संभावनाओं पर चर्चा होगी। कनाडा पहले से भारत में निवेश कर रहा है और अब इस हिस्सेदारी को और बढ़ाना चाहता है।

 

पुराने आरोपों से पीछे हटते संकेत

कार्नी की यात्रा से पहले कनाडा के कुछ अधिकारियों के बयान चर्चा में रहे। पहले कनाडा ने आरोप लगाया था कि भारत उसकी जमीन पर हस्तक्षेप कर रहा है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दखल दे रहा है। लेकिन हाल ही में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अगर ऐसा गंभीर खतरा होता, तो प्रधानमंत्री भारत की यात्रा नहीं करते। इससे संकेत मिलता है कि ओटावा अब रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

 

व्यापार और निवेश की तस्वीर

कनाडा के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार 21 अरब डॉलर से ज्यादा है। भारतीय आंकड़ों के अनुसार कुल द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये के आसपास है।

 

भारत से कनाडा को मुख्य रूप से दवाइयां, टेलीफोन उपकरण, ऑटो पार्ट्स, ज्वेलरी, कपड़े, इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स और समुद्री उत्पाद निर्यात होते हैं। वहीं कनाडा से भारत को कोयला, वुड पल्प, आयरन, दालें, लकड़ी, कागज और खनन से जुड़े उत्पाद मिलते हैं।

 

भारत में 600 से अधिक कनाडाई कंपनियां काम कर रही हैं। कनाडा के बड़े पेंशन फंड रियल एस्टेट और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में लगभग 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चुके हैं। अब दोनों देश इस निवेश को और बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

 

ऊर्जा सहयोग पर खास ध्यान

इस दौरे का सबसे अहम मुद्दा ऊर्जा माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच यूरेनियम सप्लाई समझौते पर बातचीत हो सकती है। लगभग 10 साल के लिए 2.8 अरब कनाडाई डॉलर का यूरेनियम सौदा होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को ईंधन मिल सके।

 

इसके अलावा भारी कच्चे तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और अन्य ऊर्जा उत्पादों में सहयोग बढ़ाने की योजना है। कनाडा प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, जबकि भारत को अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए भरोसेमंद और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की जरूरत है। 2024 में कनाडा के कुल ऊर्जा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी केवल 761.5 मिलियन डॉलर थी, जबकि भारत से आयात 206 मिलियन डॉलर रहा। अब इस हिस्सेदारी को बढ़ाने का लक्ष्य है।

 

सुरक्षा, तकनीक और शिक्षा में सहयोग

दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पहले ही उच्च स्तरीय बातचीत कर चुके हैं। कूटनीतिक और कानून-प्रवर्तन संपर्क अधिकारियों की नियुक्ति पर सहमति बनी है, ताकि सुरक्षा सहयोग मजबूत हो सके।

 

AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, शोध और शिक्षा के क्षेत्र में भी साझेदारी बढ़ाने की योजना है। इससे केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक सहयोग भी बढ़ेगा।

 

CEPA से क्या उम्मीद?

CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) समझौता वस्त्र, सेवाएं, निवेश, कृषि और डिजिटल व्यापार जैसे क्षेत्रों को कवर करेगा। पिछले साल जी-7 शिखर सम्मेलन में कार्नी और मोदी के बीच मुलाकात में इसे फिर से शुरू करने पर सहमति बनी थी। लक्ष्य है कि अगले लगभग 12 महीनों में इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाए और 2030 तक व्यापार को 50-70 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए।

 

तनाव का दौर और अब सुधार की कोशिश

2023 में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा में हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी खराब हो गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारतीय एजेंटों पर आरोप लगाए, जिसे भारत ने पूरी तरह खारिज कर दिया।

 

2024 में कनाडा ने छह भारतीय अधिकारियों को निष्कासित किया। भारत ने भी जवाबी कदम उठाए और वीजा सेवाएं अस्थायी रूप से रोक दीं। व्यापार मिशन रद्द हुए और CEPA वार्ता ठप पड़ गई।

 

मार्च 2025 में मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद रिश्तों को सुधारने की कोशिश शुरू हुई। भारत के कनाडा में उच्चायुक्त दिनेश पटनायक ने कहा है कि यह दौरा संबंधों को रीसेट करने का मौका है।

 

प्रवासी भारतीय और कनाडा

2021 की जनगणना के अनुसार, कनाडा में 83.6 लाख लोग विदेश में जन्मे हैं, जो कुल आबादी का करीब 23% है। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक, कनाडा में लगभग 16 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। पाकिस्तानी मूल के करीब 3 लाख लोग भी वहां बसे हैं।

 

निर्वासन (Exile) के आंकड़े

2025 के पहले दस महीनों में कनाडा ने 2,831 भारतीय नागरिकों को देश से बाहर निकाला। पिछले साल कुल 18,785 लोगों को निकाला गया, जिनमें भारतीय दूसरे नंबर पर थे। अभी 29,542 लोगों पर कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें 6,515 भारतीय शामिल हैं। सरकार के अनुसार, कई मामलों में आपराधिक गतिविधियां या शरण नियमों का उल्लंघन कारण रहे।

 

रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1947 में भारत की आजादी के बाद दोनों देशों के औपचारिक संबंध शुरू हुए। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद तनाव बढ़ा और परमाणु सहयोग रुका। 1985 में एअर इंडिया फ्लाइट 182 विस्फोट से भी रिश्तों पर असर पड़ा। 2010 में मनमोहन सिंह के दौरे के दौरान परमाणु सहयोग समझौता हुआ। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी के कनाडा दौरे में कई समझौते हुए। 2023 के बाद फिर तनाव आया, जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है।

 

आगे की राह

मार्क कार्नी का यह दौरा सिर्फ औपचारिक यात्रा नहीं है, बल्कि दोनों देशों के लिए एक नया मौका है। व्यापार, ऊर्जा और तकनीक में सहयोग बढ़ाने की संभावना है। साथ ही पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर भरोसा बहाल करने की भी जरूरत है।

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