Mohan Bhagwat Gen Z Dialogue: जंतर-मंतर आंदोलन से लेकर आरक्षण और AI तक… जानिए RSS प्रमुख ने युवाओं के साथ किन मुद्दों पर की बात?

Mohan Bhagwat Gen Z Dialogue

Mohan Bhagwat Speech on Gen Z : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार को मुंबई में पहली बार बड़ी संख्या में Gen Z और Gen Alpha के छात्रों के साथ करीब एक घंटे तक खुलकर संवाद किया। इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ पर आयोजित इस कार्यक्रम में 11 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 2,000 छात्र शामिल हुए। कार्यक्रम ऐसे समय हुआ, जब देश हाल ही में NEET पेपर लीक, छात्रों के लंबे आंदोलन, शिक्षा व्यवस्था, आरक्षण और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस देख चुका है।

इसी वजह से इस संवाद को केवल एक प्रेरक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हाल के छात्र आंदोलनों और युवाओं की राजनीति पर RSS की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है। भागवत ने छात्रों के सवालों के जवाब देते हुए आंदोलन, शिक्षा, बेरोजगारी, आरक्षण, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), महिलाओं की भागीदारी, LGBTQ, चीन-पाकिस्तान, पर्यावरण और लोकतंत्र जैसे कई संवेदनशील विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी।

 

छात्रों के आंदोलन पर बोले- संवाद नहीं होगा तो आंदोलन होगा

कार्यक्रम की शुरुआत ही हाल के छात्र आंदोलनों से जुड़े सवाल से हुई। एक छात्र ने कहा कि यदि सरकार पहले ही युवाओं से बातचीत कर लेती, तो आंदोलन की नौबत शायद नहीं आती।

इस पर मोहन भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन भी संवाद का एक माध्यम है। जब सामान्य बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तब लोग अपनी बात आंदोलन के जरिए रखते हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन को केवल विरोध के रूप में नहीं, बल्कि संवाद की एक प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार संविधान ने दिया है। यदि किसी समूह को लगता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वह लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि आंदोलन हमेशा मर्यादित और शांतिपूर्ण होना चाहिए तथा उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए।

भागवत ने कहा कि यदि संवाद लगातार चलता रहे तो अधिकांश विवाद आंदोलन तक पहुंचने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं।

 

जंतर-मंतर आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा- युवा बिना वजह नहीं बोलते

हाल के छात्र आंदोलनों, विशेषकर जंतर-मंतर पर हुए लंबे प्रदर्शन के संदर्भ में भागवत ने कहा कि यदि आज की युवा पीढ़ी आवाज उठा रही है तो उसके पीछे कोई वास्तविक समस्या जरूर होगी।

उन्होंने कहा कि हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि युवा विरोध कर रहे हैं, बल्कि यह समझना चाहिए कि आखिर वे विरोध करने पर मजबूर क्यों हुए। किसी भी आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मान लेना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद कारणों को भी समझना जरूरी होता है।

उन्होंने कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति, सरकार या संगठन के खिलाफ नहीं होना चाहिए बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में होना चाहिए।

यही कारण है कि उन्होंने छात्रों और सरकार दोनों के बीच नियमित संवाद को लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया।

 

Gen Z और Gen Alpha पर भागवत की सबसे बड़ी टिप्पणी

कार्यक्रम के दौरान भागवत ने वर्तमान युवा पीढ़ी को लेकर अपनी सोच भी साझा की। उन्होंने कहा कि उनकी पीढ़ी और आज की पीढ़ी में सबसे बड़ा अंतर सवाल पूछने की आदत का है।

उन्होंने कहा कि जब वे स्वयं युवावस्था में थे, तब बड़े जो कहते थे, उसे बिना अधिक प्रश्न किए स्वीकार कर लिया जाता था। लेकिन आज की Gen Z हर बात पर तर्क चाहती है। वह केवल आदेश नहीं मानती बल्कि कारण भी जानना चाहती है।

भागवत ने कहा कि यह बदलाव नकारात्मक नहीं है। बल्कि यदि युवा सही प्रश्न पूछ रहे हैं तो समाज और व्यवस्था को उनके प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि केवल उत्तर देना पर्याप्त नहीं है। युवाओं को अपनापन, विश्वास और स्नेह भी महसूस होना चाहिए। यदि समाज केवल उपदेश देगा और संवाद नहीं करेगा तो पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ेगी।

उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि उन्हें लगता है कि आज की Gen Z और Gen Alpha उनकी पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं और उनमें देशभक्ति भी अधिक दिखाई देती है।

प्रदर्शन करने वालों को एंटी-नेशनल कहना ठीक नहीं

कार्यक्रम में एक छात्र ने पूछा कि जब भी युवा आंदोलन करते हैं, तब उन्हें अक्सर “एंटी-नेशनल” कह दिया जाता है।

इस पर भागवत ने स्पष्ट कहा कि केवल आंदोलन करने से कोई राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाता।

उन्होंने कहा कि जो युवा आंदोलन कर रहे हैं, वे भी इसी समाज और देश के लोग हैं। वे हमारी अगली पीढ़ी हैं। इसलिए सबसे पहले उनकी बात समझने की कोशिश होनी चाहिए।

भागवत ने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि युवा हमारी बात समझें, तो हमें भी उनकी समस्याओं और सोच को समझना होगा। लोकतंत्र में संवाद दोनों दिशाओं से चलता है।

 

जंतर-मंतर में लाठीचार्ज और पैलेट गन पर क्या बोले

छात्रों ने हाल के आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल पूछा।

भागवत ने इस विषय पर सीधे किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करने के बजाय कहा कि पहले पूरी परिस्थिति समझना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि यह जानना जरूरी है कि ऐसी स्थिति आखिर बनी क्यों और किन परिस्थितियों में पुलिस को ऐसा कदम उठाना पड़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास भी वही जानकारी है जो मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से उपलब्ध हुई है।

उनका कहना था कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पूरी जानकारी होना जरूरी है।

 

शिक्षा व्यवस्था पर बोले- केवल सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार

देश में शिक्षा व्यवस्था, सरकारी स्कूलों की स्थिति और शिक्षकों की कमी पर भी छात्रों ने कई सवाल पूछे।

भागवत ने कहा कि शिक्षा को कभी भी केवल व्यापार नहीं बनना चाहिए। हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचे, इसके लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा होना जरूरी है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार पर डाल देना भी उचित नहीं होगा।

उनके अनुसार समाज के सक्षम लोगों, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों को भी शिक्षा व्यवस्था सुधारने में भागीदारी निभानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे गांव देखे हैं जहां लोगों ने स्वयं स्कूलों की स्थिति सुधारी, कहीं स्थानीय लोगों ने कंप्यूटर उपलब्ध कराए और कहीं समाज ने मिलकर बेहतर शिक्षा का वातावरण तैयार किया।

भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी का भविष्य केवल सरकारी योजनाओं से सुरक्षित नहीं होगा। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

 

शिक्षा बजट बढ़ाने और सुधार की मांग का समर्थन

एक छात्र ने पूछा कि लंबे समय से शिक्षा बजट बढ़ाने और विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग की जाती रही है, लेकिन पर्याप्त सुधार दिखाई नहीं देता।

भागवत ने कहा कि वे शिक्षा बजट बढ़ाने के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि शिक्षा पर अधिक निवेश होना चाहिए।

हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल बजट बढ़ा देने से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। जब तक समाज शिक्षा को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं मानेगा, तब तक अपेक्षित बदलाव नहीं आएगा।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले शिक्षा सभी के लिए सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बननी चाहिए। पाठ्यक्रम में बदलाव बाद का विषय है।

 

शिक्षा व्यवस्था में सुधार को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया

कार्यक्रम में छात्रों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों पर विस्तार से सवाल किए। एक छात्र ने बताया कि देश के लगभग 15 लाख स्कूलों में से करीब एक लाख स्कूल ऐसे हैं, जहां छात्राओं के लिए शौचालय तक उपलब्ध नहीं हैं और कई जगह पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। इस पर भागवत ने कहा कि शिक्षा किसी भी स्थिति में व्यावसायिक कारोबार नहीं बननी चाहिए। इसे सभी के लिए सुलभ बनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि केवल सरकार के भरोसे शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधर सकती। समाज को भी इसमें अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्होंने ऐसे गांवों के उदाहरण दिए, जहां स्थानीय लोगों ने मिलकर स्कूलों की स्थिति सुधारी, जबकि कई जगह शहर के लोगों ने अपने स्तर पर स्कूलों में कंप्यूटर और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराईं।

भागवत ने यह भी कहा कि वे शिक्षा बजट बढ़ाने के पक्षधर हैं। हालांकि केवल बजट बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। समाज को भी शिक्षा सुधार के लिए आगे आना होगा। उनके अनुसार, नई पीढ़ी का भविष्य केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

 

आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन मर्यादा भी जरूरी

छात्रों ने हालिया छात्र आंदोलनों, विशेषकर जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल पर भी सवाल किए।

भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन भी संवाद का एक तरीका है। यदि बातचीत सफल नहीं होती, तब लोग आंदोलन का रास्ता अपनाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि पहले ही बातचीत हो जाती, तो आंदोलन की आवश्यकता नहीं पड़ती।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि युवाओं को आंदोलन नहीं करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि आंदोलन की अपनी मर्यादा होनी चाहिए और उसका उद्देश्य व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नफरत फैलाना।

जंतर-मंतर में पैलेट गन और लाठीचार्ज के सवाल पर भागवत ने कहा कि किसी भी घटना पर राय बनाने से पहले यह जानना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि इस मामले में उनकी जानकारी भी मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है, इसलिए बिना पूरी जानकारी के निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि यदि Gen Z अपनी आवाज उठा रही है, तो उसके पीछे निश्चित रूप से कोई वास्तविक समस्या होगी। इसलिए युवाओं की बात सुनना जरूरी है। उनके अनुसार, यदि नई पीढ़ी चिल्ला रही है तो उसकी तकलीफ समझनी चाहिए, न कि उसे तुरंत गलत ठहरा देना चाहिए।

 

Gen Z को एंटी-नेशनल कहना गलत

एक छात्र ने सवाल पूछा कि आंदोलनों में शामिल युवाओं को अक्सर “एंटी-नेशनल” कहा जाता है। इस पर भागवत ने स्पष्ट कहा कि केवल आंदोलन करने से कोई देश विरोधी नहीं हो जाता।

उन्होंने कहा कि Gen Z हमारी अपनी अगली पीढ़ी है। उनसे हमारा पारिवारिक और सामाजिक रिश्ता है। जैसे युवाओं को बड़ों की बात समझनी चाहिए, वैसे ही बड़ों को भी युवाओं की बात समझनी होगी।

उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तिगत अनुभव में Gen Z और Gen Alpha उनकी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार हैं और उनमें देशभक्ति भी अधिक है।

भागवत ने यह भी कहा कि उनकी पीढ़ी जब युवावस्था में थी, तब बड़े जो कहते थे, उसे बिना सवाल किए मान लिया जाता था। लेकिन आज की पीढ़ी हर बात पर तार्किक जवाब चाहती है। यह बदलाव गलत नहीं बल्कि सकारात्मक है। युवाओं को केवल उत्तर ही नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन भी चाहिए।

 

सोशल मीडिया, AI और फेक कंटेंट पर दी चेतावनी

कार्यक्रम में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी लंबी चर्चा हुई। छात्रों ने बताया कि सोशल मीडिया की वजह से समाज में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है और कई देशों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध भी लगाया है।

इस पर भागवत ने कहा कि केवल नियम बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी। नियमों का पालन भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर जिन लोगों के लाखों फॉलोअर्स हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके व्यवहार का असर दूसरों पर पड़ता है। इसलिए कंटेंट बनाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा कोई संदेश न दें, जिससे समाज गलत दिशा में जाए।

उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में फर्जी वीडियो और फेक कंटेंट के बढ़ते खतरे पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अब किसी भी जानकारी पर आंख बंद करके विश्वास नहीं किया जा सकता। हर सूचना का वेरिफिकेशन जरूरी हो गया है।

उनके अनुसार, डिजिटल अनुशासन केवल सरकार या सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक और विशेष रूप से नई पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है।

 

रोजगार का मतलब केवल सरकारी नौकरी नहीं

रोजगार और बेरोजगारी पर पूछे गए सवाल के जवाब में भागवत ने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी नहीं होता।

उन्होंने कहा कि देश के सभी युवाओं को सरकारी नौकरी देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए युवाओं को स्वरोजगार, उद्यमिता और छोटे व्यवसायों की ओर भी देखना चाहिए।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक पान विक्रेता भी मेहनत के दम पर लाखों रुपये की संपत्ति खड़ी कर सकता है। इसलिए किसी भी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि समाज हर काम को सम्मान देगा, तभी बेरोजगारी जैसी समस्या का स्थायी समाधान निकल सकेगा। सरकारी नौकरी को ही सफलता का एकमात्र रास्ता मानना सही सोच नहीं है।

 

पड़ोसी देशों से रिश्तों पर बोले- युद्ध हमेशा स्थायी नहीं होता

कार्यक्रम में छात्रों ने भारत के पड़ोसी देशों, विशेषकर पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी सवाल पूछा। छात्रों ने जानना चाहा कि जब दोनों देशों के साथ तनाव या युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तब लोगों के बीच संवाद क्यों रुक जाता है।

इस पर मोहन भागवत ने कहा कि जब देश युद्ध जैसी स्थिति में हो, तब नागरिकों को सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध हमेशा के लिए नहीं होते। जब संघर्ष समाप्त हो जाए, तब बातचीत का रास्ता तलाशना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि राजनीति और कूटनीति के अपने अलग आयाम होते हैं, लेकिन मानवता सबसे ऊपर है। इसलिए भविष्य में संबंध सामान्य बनाने के लिए संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए।

 

महिलाओं की भागीदारी पर बोले- बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए

महिलाओं की नेतृत्व भूमिका और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उनकी भागीदारी को लेकर भी सवाल पूछा गया।

भागवत ने कहा कि महिलाओं को बराबरी का अवसर और समान अधिकार मिलना चाहिए। यह केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का विषय है।

उन्होंने बताया कि संघ परिवार में महिलाओं के लिए अलग संगठन कार्य कर रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं लगातार आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि नेतृत्व केवल किसी पद से तय नहीं होता बल्कि काम और विचारों से तय होता है। महिलाओं की भागीदारी समाज के हर क्षेत्र में बढ़नी चाहिए।

 

LGBTQ समुदाय पर क्या कहा

सेम-सेक्स मैरिज और LGBTQ समुदाय को लेकर भी छात्रों ने सवाल पूछा।

भागवत ने कहा कि LGBTQ समुदाय भी समाज का हिस्सा है और उन्हें समाज से अलग नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने विवाह को एक अलग सामाजिक संस्था बताया।

उनके अनुसार विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं बल्कि परिवार और अगली पीढ़ी से जुड़ी संस्था है। उन्होंने कहा कि यदि समाज में कोई नया सामाजिक ढांचा लाना है, तो पहले समाज को उसके लिए तैयार करना होगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी बदलाव को समाज की व्यापक सहमति और सामाजिक तैयारी के साथ ही लागू किया जाना चाहिए।

 

पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर से करने की सलाह

एक छात्र ने कहा कि Gen Z और Gen Alpha पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी सक्रिय हैं, लेकिन सरकार उनकी बात नहीं सुनती।

इस पर भागवत ने कहा कि सरकारों पर कई प्रकार के दबाव होते हैं और उनसे भी गलतियां हो सकती हैं। इसलिए केवल सरकार की ओर देखने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर और आसपास से बदलाव शुरू करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं होगा। यदि हर परिवार अपने स्तर पर छोटे-छोटे बदलाव करेगा, तभी बड़ा परिवर्तन दिखाई देगा।

 

आरक्षण पर राजनीति नहीं होनी चाहिए

कार्यक्रम के सबसे चर्चित सवालों में से एक आरक्षण व्यवस्था को लेकर था। एक छात्र ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी शायद नहीं सोचा होगा कि आरक्षण इतने लंबे समय तक जारी रहेगा और सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव महसूस किया जाता है।

इस पर भागवत ने कहा कि वे इस विषय पर सीधा उत्तर नहीं देना चाहते, क्योंकि यह बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा है।

उन्होंने कहा कि इस विषय को समझने के लिए डॉ. अंबेडकर की मूल सोच को समझना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार जब किसी विषय पर राजनीतिक लाभ-हानि की सोच हावी हो जाती है, तब समाज में विभाजन बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि समाज में एकता और सामाजिक समरसता सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी नीति पर चर्चा हो तो वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।

 

हिंसा करने वालों को आदर्श न बनाने की सलाह

कार्यक्रम में सोशल मीडिया पर हिंसक कंटेंट को अधिक लोकप्रियता मिलने पर भी चर्चा हुई।

भागवत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंसा करके लोकप्रिय हो रहा है, तो समाज को उसे आदर्श नहीं बनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के सामने ऐसे रोल मॉडल आने चाहिए जो समाज निर्माण, ज्ञान, विज्ञान, सेवा और सकारात्मक कार्यों से पहचान बनाएं, न कि हिंसा या विवाद से।

 

कार्यक्रम के अंत में Gen Z स्टाइल में किया ‘फिंगर क्लैप’

संवाद समाप्त होने के बाद मोहन भागवत ने छात्रों के साथ Gen Z स्टाइल में ‘फिंगर क्लैप’ भी किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यह तरीका उन्होंने आज की युवा पीढ़ी से सीखा है।

फिंगर क्लैप या माइक्रो क्लैप में सामान्य ताली की बजाय उंगलियों से हल्की चुटकी जैसी आवाज निकालकर किसी वक्ता या प्रस्तुति की सराहना की जाती है।

बताया जाता है कि इसकी शुरुआत 1960 के दशक में न्यूयॉर्क की ब्लैक और लैटिनो LGBTQ+ कम्युनिटी में “साइलेंट अप्लॉज” के रूप में हुई थी। बाद में टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए यह दुनिया भर की Gen Z के बीच लोकप्रिय हो गया।

 

भाजपा और शशि थरूर को लेकर भी चर्चा

कार्यक्रम शुरू होने से पहले भाजपा विधायक राम कदम ने कहा कि मोहन भागवत वर्षों से युवाओं के साथ संवाद करते रहे हैं और यह कोई नई पहल नहीं है, बल्कि संघ की पुरानी परंपरा का हिस्सा है।

इसी कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ। इसके बाद थरूर ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि यह RSS का कार्यक्रम नहीं बल्कि छात्रों का मंच है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को संवाद के लिए आमंत्रित किया जाता है।

 

प्रधानमंत्री मोदी पहले भी छात्रों से संवाद कर चुके हैं

भागवत के इस कार्यक्रम की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि हाल ही में NEET पेपर लीक और छात्र आंदोलनों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी छात्रों के नाम कई वीडियो संदेश जारी कर चुके हैं। इनमें उन्होंने परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक रोकने के प्रयास और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों पर सरकार का पक्ष रखा था।

ऐसे में मोहन भागवत का यह संवाद भी युवाओं, शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संवाद को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

FAQ

1. मोहन भागवत ने Gen Z और Gen Alpha छात्रों से क्या कहा?

मोहन भागवत ने कहा कि Gen Z और Gen Alpha पुरानी पीढ़ियों की तुलना में अधिक ईमानदार, जिज्ञासु और देशभक्त हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं की बात ध्यान से सुननी चाहिए और अगर वे किसी मुद्दे पर आवाज उठा रहे हैं तो उसके पीछे कोई वास्तविक समस्या जरूर होगी। संवाद की कमी होने पर ही आंदोलन की नौबत आती है।

 

2. मोहन भागवत के भाषण का मुख्य संदेश क्या था?

उनके पूरे संबोधन का मुख्य संदेश था कि लोकतंत्र में संवाद सबसे महत्वपूर्ण है। सरकार, समाज और युवाओं के बीच लगातार बातचीत होनी चाहिए। शिक्षा, रोजगार, सोशल मीडिया, आरक्षण, महिलाओं की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे हर विषय पर उन्होंने संवाद और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

 

3. Gen Z और Gen Alpha किस पीढ़ी को कहा जाता है?

आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को Gen Z कहा जाता है, जबकि 2013 के बाद जन्मे बच्चों को Gen Alpha माना जाता है। IIMUN कार्यक्रम में 11 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 2,000 छात्र शामिल हुए थे, जिनसे मोहन भागवत ने सीधा संवाद किया।

 

4. छात्र आंदोलनों और जंतर-मंतर प्रदर्शन पर मोहन भागवत की क्या राय रही?

उन्होंने कहा कि आंदोलन लोकतंत्र में संवाद का एक माध्यम है और संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है। उनके अनुसार यदि सरकार पहले संवाद कर लेती तो कई बार आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से होना चाहिए।

 

5. आरक्षण, शिक्षा और रोजगार को लेकर मोहन भागवत ने क्या कहा?

आरक्षण पर उन्होंने कहा कि यह विषय राजनीति का नहीं होना चाहिए और डॉ. भीमराव आंबेडकर की मूल सोच को समझने की जरूरत है। शिक्षा को उन्होंने व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी बताया और शिक्षा बजट बढ़ाने का समर्थन किया। रोजगार के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी नहीं है तथा किसी भी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए।

 

6. सोशल मीडिया, AI और नई तकनीक पर RSS प्रमुख ने क्या संदेश दिया?

मोहन भागवत ने कहा कि सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत बड़ा है, इसलिए जो लोग कंटेंट बनाते हैं उनकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। उन्होंने AI के दौर में फेक कंटेंट से सावधान रहने, किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले उसका सत्यापन करने और युवाओं से डिजिटल अनुशासन अपनाने की अपील की।