भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी Moody’s Ratings ने चालू वित्त वर्ष (FY27) के लिए भारत की विकास दर का अनुमान घटा दिया है। पहले जहां 6.8% ग्रोथ का अनुमान था, अब इसे घटाकर 6% कर दिया गया है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण वेस्ट एशिया में जारी तनाव को बताया गया है, जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता दिख रहा है।
क्यों घटाया गया ग्रोथ का अनुमान?
रिपोर्ट के मुताबिक, वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल (crude oil) का करीब 55% और LPG (रसोई गैस) का 90% से ज्यादा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
ऐसे में जब सप्लाई में रुकावट आती है, तो इसका असर कई स्तरों पर दिखता है – ईंधन महंगा होता है, ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है और आखिरकार इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
महंगाई बढ़ने का खतरा क्यों?
Moody’s Ratings ने साफ कहा है कि फिलहाल महंगाई काबू में दिख रही है, लेकिन आने वाले समय में इसके बढ़ने का खतरा ज्यादा है। एजेंसी ने FY27 में औसत महंगाई दर 4.8% रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले साल के 2.4% से काफी ज्यादा है।
महंगाई बढ़ने की एक बड़ी वजह है LPG और उर्वरकों (fertilizers) की सप्लाई में रुकावट। भारत खेती के लिए काफी हद तक आयातित उर्वरकों पर निर्भर है। ऐसे में अगर इनकी कीमत बढ़ती है, तो खाद्य पदार्थ भी महंगे हो सकते हैं।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर ईंधन महंगा होता है, तो उसका असर हर चीज पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, तो सामान की कीमत भी बढ़ेगी। इससे घर का बजट बिगड़ सकता है।
इसके अलावा, अगर गैस की सप्लाई में दिक्कत आती है, तो घरेलू स्तर पर भी परेशानी हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो कुछ समय के लिए गैस की कमी भी देखने को मिल सकती है।
उद्योग और निवेश पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, महंगे कच्चे माल और बढ़ती लागत के कारण उद्योगों की रफ्तार धीमी हो सकती है। इससे उत्पादन पर असर पड़ेगा और नई परियोजनाओं में निवेश भी कम हो सकता है।
इसके साथ ही, निजी खपत (private consumption) में भी गिरावट आ सकती है, क्योंकि महंगाई बढ़ने पर लोग खर्च कम करने लगते हैं।
अन्य एजेंसियों का क्या कहना है?
सिर्फ Moody’s Ratings ही नहीं, बल्कि अन्य संस्थाओं ने भी भारत की ग्रोथ को लेकर सावधानी जताई है।
- OECD ने भी FY27 के लिए भारत की विकास दर 6.1% रहने का अनुमान लगाया है
- EY की रिपोर्ट के अनुसार, अगर तनाव जारी रहता है, तो GDP ग्रोथ 1% तक घट सकती है और महंगाई 1.5% तक बढ़ सकती है
- ICRA का अनुमान है कि ग्रोथ 6.5% तक रह सकती है
इन सभी अनुमानों से साफ है कि वैश्विक हालात का असर भारत पर पड़ रहा है।
सरकार के सामने क्या चुनौती है?
महंगे तेल, गैस और उर्वरकों के कारण सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है। अगर सरकार इनकी कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सब्सिडी देती है, तो खर्च बढ़ेगा।
वहीं दूसरी तरफ, टैक्स से होने वाली कमाई भी प्रभावित हो सकती है। हाल ही में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकार की आमदनी पर असर पड़ा है।
इससे सरकार के लिए वित्तीय संतुलन (fiscal balance) बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) पर असर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। जब देश ज्यादा आयात करता है और निर्यात कम होता है, तो यह घाटा बढ़ता है।
महंगे तेल और गैस के कारण आयात बिल बढ़ेगा। साथ ही, वेस्ट एशिया में तनाव के कारण वहां भारत के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, फिलहाल भारत की स्थिति स्थिर मानी जा रही है, लेकिन अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो दबाव बढ़ सकता है।
रेमिटेंस पर भी खतरा
भारत को विदेशों से आने वाली रकम (remittance) का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 40% रेमिटेंस इसी क्षेत्र से आता है।
अगर वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो इसका असर भारत आने वाले पैसों पर भी पड़ सकता है।
क्या कोई सकारात्मक पहलू भी है?
हालांकि चुनौतियां बढ़ रही हैं, लेकिन कुछ सकारात्मक बातें भी हैं। सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस और व्यापार में सुधार के प्रयास निवेश को सहारा दे सकते हैं।
इसके अलावा, भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। 2025 में भारत की GDP ग्रोथ 7.5% रही, जो G-20 देशों में सबसे ज्यादा थी।
आगे क्या हो सकता है?
रिपोर्ट के अनुसार, अगर वेस्ट एशिया का तनाव जल्दी कम हो जाता है, तो स्थिति संभल सकती है। लेकिन अगर यह लंबा खिंचता है, तो महंगाई और ग्रोथ दोनों पर दबाव बना रहेगा।
ब्याज दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। अगर महंगाई बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक को दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं या उन्हें लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है।

