मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने एक बेहद अहम मामले की सुनवाई शुरू की, जो ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा से जुड़ा हुआ है। यह मामला सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि किन संस्थाओं पर श्रम कानून लागू होंगे और किन पर नहीं। इस सुनवाई का असर सरकारी विभागों, अस्पतालों, स्कूलों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) तक पड़ सकता है।
कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या इन संस्थाओं को ‘उद्योग’ माना जाए या इन्हें इस दायरे से बाहर रखा जाए। अगर इन संस्थाओं को उद्योग माना जाता है, तो वहां काम करने वाले कर्मचारियों को श्रम कानूनों के तहत मिलने वाले कई अधिकार मिलेंगे, जैसे वेतन सुरक्षा, नौकरी से हटाने के नियम और यूनियन बनाने का अधिकार।
9 जजों की बड़ी बेंच क्यों बनी
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 जजों की बड़ी संविधान पीठ बनाई है। इस पीठ की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत कर रहे हैं। उनके साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं।
इससे पहले फरवरी में कोर्ट ने तय किया था कि इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई के लिए बड़ी बेंच बनाई जाएगी, क्योंकि इसका असर पूरे देश के श्रम कानूनों और कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ सकता है।

1978 के फैसले से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ 1978 के एक ऐतिहासिक फैसले में है, जिसे ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा’ केस के नाम से जाना जाता है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ शब्द की बहुत व्यापक व्याख्या की थी।
इस फैसले में कहा गया था कि जहां भी नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संबंध है और कोई काम या सेवा दी जा रही है, वहां उसे ‘उद्योग’ माना जा सकता है। इस परिभाषा के कारण अस्पताल, स्कूल, विश्वविद्यालय और यहां तक कि चैरिटी संस्थाएं भी उद्योग की श्रेणी में आने लगीं।
कोर्ट अब क्या जांच कर रहा है
अब सुप्रीम कोर्ट यह देख रहा है कि 1978 में दी गई यह व्यापक परिभाषा सही थी या नहीं। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या इस परिभाषा को सीमित किया जाए या पहले की तरह ही रखा जाए।
कोर्ट ने साफ किया है कि वह फिलहाल इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 की परिभाषा पर विचार नहीं करेगा। न्यायालय का कहना है कि उस कानून को अलग से चुनौती दी जा सकती है, इसलिए इस मामले में केवल पुराने फैसले की सही या गलत व्याख्या पर ही ध्यान दिया जाएगा।
सरकार और अन्य पक्षों की दलीलें
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि 1978 के फैसले की समीक्षा जरूरी है और बाद के कानूनों को ध्यान में रखकर इसकी व्याख्या की जानी चाहिए। उनका कहना था कि अगर किसी कानून में अस्पष्टता हो, तो बाद में बने कानून उसकी समझ को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
वहीं, दूसरी ओर कुछ वकीलों ने 1978 के फैसले का समर्थन किया। उनका कहना है कि यह फैसला कर्मचारियों के हित में था और इससे उन्हें ज्यादा सुरक्षा मिली। उन्होंने यह भी बताया कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 को चुनौती देने की तैयारी भी चल रही है।
‘ट्रिपल टेस्ट’ क्या है
1978 के फैसले में ‘उद्योग’ तय करने के लिए एक ‘ट्रिपल टेस्ट’ भी दिया गया था। इसके तहत तीन बातें देखी जाती हैं:
- काम व्यवस्थित तरीके से हो रहा है या नहीं
- नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग है या नहीं
- लोगों की जरूरतों के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन हो रहा है या नहीं
अगर ये तीनों शर्तें पूरी होती हैं, तो उस गतिविधि को ‘उद्योग’ माना जा सकता है।
2020 का नया कानून और बदलाव
बाद में इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 लाया गया, जिसे नवंबर 2025 में लागू किया गया। इसके बाद फरवरी 2026 में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 को खत्म कर दिया गया।
इस नए कानून में ‘उद्योग’ की परिभाषा कुछ हद तक पहले जैसी ही रखी गई, लेकिन इसमें कुछ छूट भी दी गई है। जैसे:
- चैरिटी और सामाजिक सेवा से जुड़ी संस्थाएं
- सरकार के संप्रभु (sovereign) कार्य जैसे पुलिस और रक्षा
- घरेलू सेवाएं
इन गतिविधियों को ‘उद्योग’ की श्रेणी से बाहर रखा गया है।
जजों की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जजों ने कई अहम बातें कही। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि 1970 के दशक के बाद देश में आर्थिक बदलाव हुए हैं, जैसे निजीकरण और वैश्वीकरण। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि ‘उद्योग’ की परिभाषा को सीमित किया जाए या बढ़ाया जाए या फिर संतुलन बनाया जाए।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि ‘उद्योग’ शब्द की भाषा ही इतनी खुली है कि इससे कई सालों तक भ्रम और मुकदमे चलते रहे। वहीं, CJI सूर्यकांत ने कहा कि सरकार के संप्रभु कार्यों को ‘उद्योग’ नहीं माना जा सकता।
कौन-कौन से बड़े सवालों पर फैसला होगा
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कई अहम सवालों के जवाब देगा:
- ‘उद्योग’ की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए
- क्या सरकारी विभागों को उद्योग माना जाए
- क्या NGO और चैरिटी संस्थाएं उद्योग हैं
- नियोक्ता-कर्मचारी संबंध कितना जरूरी है
- सरकार के कौन से काम ‘संप्रभु कार्य’ माने जाएंगे
- क्या 1978 के फैसले में बदलाव जरूरी है
इस फैसले का आम लोगों पर असर
इस फैसले का असर सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लाखों कर्मचारियों की जिंदगी पर पड़ेगा। अगर ज्यादा संस्थाओं को ‘उद्योग’ माना जाता है, तो वहां काम करने वाले लोगों को श्रम कानूनों का फायदा मिलेगा।
वहीं, अगर परिभाषा को सीमित किया जाता है, तो कुछ संस्थाएं इन कानूनों से बाहर हो सकती हैं, जिससे कर्मचारियों के अधिकार कम हो सकते हैं।
आगे क्या होगा
फिलहाल सुनवाई जारी है और कोर्ट इस मामले पर विस्तार से विचार कर रहा है। यह मामला लंबे समय से लंबित है और अब जाकर इस पर अंतिम फैसला आने की उम्मीद है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित दो बड़े मामलों में से एक है। दूसरा मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई अप्रैल में होनी है।

