संसद का बजट सत्र अब एक बार फिर से गरमाने वाला है। बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होकर 2 अप्रैल तक चलेगा और माना जा रहा है कि इस दौरान संसद में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है। इस चरण में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, खासकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव को लेकर।
इस संभावित बहस को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने अपने लोकसभा सांसदों को 9 से 11 मार्च तक सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। दोनों दलों ने अपने सांसदों के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी किया है, जो पार्टी अनुशासन के लिहाज से सबसे सख्त निर्देश माना जाता है।
क्यों जारी हुआ तीन लाइन व्हिप
कांग्रेस ने अपने सांसदों से कहा है कि वे 9 से 11 मार्च के बीच लोकसभा में मौजूद रहें, क्योंकि इन दिनों लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्ष के कई दलों ने मिलकर स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है।
दूसरी ओर भाजपा ने भी अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। माना जा रहा है कि यदि इस मुद्दे पर चर्चा होती है तो सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार बहस हो सकती है।
स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव
विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया है। इस प्रस्ताव पर विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।
हालांकि इस प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने हस्ताक्षर नहीं किए। तृणमूल कांग्रेस के 29 सांसद इस नोटिस में शामिल नहीं थे, लेकिन बाद में पार्टी के अंदर यह चर्चा सामने आई कि वह इस प्रस्ताव का समर्थन कर सकती है।
सूत्रों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के सांसद अपनी पार्टी नेतृत्व के निर्देश के अनुसार मतदान के समय स्पीकर के खिलाफ वोट कर सकते हैं।
क्या हैं विपक्ष के आरोप
विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही चलाने के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती। विपक्षी दलों का कहना है कि कई मौकों पर विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
विपक्ष के अनुसार, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान भी विपक्ष की आवाज को दबाया गया। इसी वजह से उन्होंने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया।

बजट सत्र के दूसरे चरण का कार्यक्रम
बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होकर 2 अप्रैल तक चलेगा। इस दौरान कुल 17 बैठकें होने की संभावना है।
9 मार्च से 25 मार्च तक विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर चर्चा की जाएगी। इसके बाद 26 मार्च से 31 मार्च के बीच इन मांगों पर मतदान होगा और विनियोग विधेयक तथा वित्त विधेयक पर भी चर्चा और पारित करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
2 अप्रैल को बजट सत्र समाप्त होने की संभावना है।
प्रस्ताव पारित होना मुश्किल क्यों
हालांकि विपक्ष ने स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इसके पास होने की संभावना कम मानी जा रही है।
लोकसभा में फिलहाल एनडीए गठबंधन के पास लगभग 290 से ज्यादा सांसदों का समर्थन है। ऐसे में साधारण बहुमत से पारित होने वाले इस प्रस्ताव के सफल होने की संभावना बहुत कम दिखाई देती है।
यदि प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो उस दौरान लोकसभा अध्यक्ष स्वयं सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे। लेकिन उन्हें सदन में बोलने और अपने पक्ष को रखने का पूरा अधिकार रहेगा। साथ ही वे एक सामान्य सदस्य की तरह मतदान भी कर सकते हैं।
पहले चरण में भी दिखा था टकराव
बजट सत्र के पहले चरण में भी सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला था। कई दिनों तक संसद में हंगामा हुआ और कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी।
राहुल गांधी को बोलने देने को लेकर विवाद
सत्र के दौरान एक दिन लोकसभा की कार्यवाही केवल 13 मिनट ही चल पाई थी। उस दिन विपक्ष लगातार मांग कर रहा था कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का मौका दिया जाए।
राहुल गांधी ने भी कहा था कि स्पीकर ने उन्हें पहले आश्वासन दिया था कि बजट चर्चा से पहले उन्हें बोलने दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अडाणी और एपस्टीन फाइल्स का जिक्र
बजट चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने अमेरिकी एपस्टीन फाइल्स और अडाणी से जुड़े मामलों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा था कि अमेरिका में चल रहा केस दरअसल प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने का तरीका हो सकता है।
इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाब देते हुए विपक्ष के आरोपों को गलत बताया था।
जीएसटी पर भी हुई बहस
तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने भी जीएसटी को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक हर चीज पर जीएसटी दे रहे हैं।
इस पर वित्त मंत्री ने जवाब देते हुए कहा कि दूध और पढ़ाई जैसी चीजों पर जीएसटी नहीं लगाया गया है और इस तरह की बातें गलत जानकारी पर आधारित हैं।
स्पीकर के खिलाफ नोटिस पहले ही दिया जा चुका
लोकसभा की कार्यवाही के दौरान 10 फरवरी को विपक्ष ने आधिकारिक रूप से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश किया था। उस समय भी यह मुद्दा काफी चर्चा में रहा था।
संसद में लगातार हंगामा
सत्र के दौरान कई बार संसद में हंगामा देखने को मिला। कुछ दिनों में तो कार्यवाही केवल कुछ मिनट ही चल पाई।
केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू ने राहुल गांधी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि वे प्रधानमंत्री की पाठशाला में शामिल हो जाएं तो जीवन में सफल हो सकते हैं।
धन्यवाद प्रस्ताव भी विवादों में
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव भी इस बार अलग परिस्थितियों में पारित हुआ। लोकसभा में यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री के भाषण के बिना ही पारित हो गया, जो 2004 के बाद पहली बार हुआ।
वहीं प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में लगभग 97 मिनट तक भाषण दिया था, लेकिन विपक्षी सांसदों ने वहां भी हंगामा किया और बाद में वॉकआउट कर दिया।
बजट भी रहा चर्चा में
इस बजट सत्र में 2026-27 का केंद्रीय बजट भी पेश किया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगभग 85 मिनट का भाषण दिया।
सरकार ने रक्षा बजट में लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी की, जबकि आयकर दरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। साथ ही रेलवे परियोजनाओं और नए आयुर्वेदिक संस्थानों की भी घोषणा की गई।
राष्ट्रपति के अभिभाषण से हुई थी शुरुआत
संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण से हुई थी। उन्होंने लगभग 45 मिनट के भाषण में सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का जिक्र किया था।
उन्होंने कहा था कि देश में वंदे भारत ट्रेनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और भारत अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष को सदन के बहुमत से पारित प्रस्ताव के जरिए हटाया जा सकता है।
इसके लिए कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना होता है। यह नोटिस लोकसभा के महासचिव को दिया जाता है।
जब प्रस्ताव सदन में लाया जाता है तो उसे चर्चा के लिए स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है।
यदि सदन के कुल सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित हो जाता है तो अध्यक्ष को तुरंत पद छोड़ना पड़ता है।
प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान क्या होता है
जब स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव सदन में विचाराधीन होता है, तब वे सदन की अध्यक्षता नहीं करते। उस दौरान कोई अन्य सदस्य कार्यवाही चलाता है।
हालांकि स्पीकर को सदन में बोलने और बहस में हिस्सा लेने का अधिकार होता है। वे मतदान भी कर सकते हैं, लेकिन बराबरी की स्थिति में निर्णायक वोट नहीं दे सकते।
इतिहास में क्या हुआ
अब तक भारतीय संसद के इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव केवल तीन बार लाया गया है।
1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ, 1966 में हुकम सिंह के खिलाफ और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन तीनों ही मामलों में प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया।
व्हिप क्या होता है
संसद में व्हिप राजनीतिक दलों द्वारा अपने सांसदों को जारी किया गया निर्देश होता है। इसमें उन्हें बताया जाता है कि किसी मुद्दे पर सदन में उपस्थित रहना है या किस तरह मतदान करना है।
तीन लाइन का व्हिप सबसे सख्त माना जाता है। इसमें सांसदों को सदन में उपस्थित रहना और पार्टी के निर्देश के अनुसार वोट देना अनिवार्य होता है।
यदि कोई सांसद इस व्हिप का पालन नहीं करता तो उसके खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई भी हो सकती है।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर बजट सत्र के दूसरे चरण पर है। यदि स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो संसद में तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
हालांकि मौजूदा संख्या बल को देखते हुए प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन राजनीतिक माहौल जरूर गर्म रह सकता है।

