देश की राजधानी दिल्ली हमेशा राजनीतिक गतिविधियों, विकास और भीड़भाड़ के लिए जानी जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में एक और गंभीर मुद्दा तेजी से उभरकर सामने आया है-लोगों का लापता होना। यह केवल एक पुलिस रिकॉर्ड का विषय नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक चिंता का कारण बन चुका है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि राजधानी में हर दिन कई लोग अचानक गायब हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। यह स्थिति परिवारों, प्रशासन और समाज सभी के लिए चिंताजनक है।
जनवरी 2026 के शुरुआती दिनों ने बढ़ाई चिंता
जनवरी 2026 के पहले पंद्रह दिनों के आंकड़ों ने सबका ध्यान खींचा। इस छोटी सी अवधि में 807 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन लगभग 54 लोग दिल्ली से गायब हो रहे थे। यह संख्या केवल उन्हीं मामलों की है जिनकी शिकायत पुलिस तक पहुँची। असल में कितने लोग बिना रिपोर्ट के गायब हुए, इसका कोई सटीक अंदाजा नहीं है।
इन 807 मामलों में 509 महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, जबकि 298 पुरुष थे। यह अंतर खुद बताता है कि समस्या का सबसे ज्यादा असर कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। हालांकि राहत की बात यह रही कि इन्हीं पंद्रह दिनों के भीतर पुलिस ने 235 लोगों को ढूंढ निकाला, लेकिन 572 लोग अभी भी लापता बताए गए। इतनी बड़ी संख्या किसी भी महानगर के लिए चिंता का विषय है।
2025 का वार्षिक चित्र और भी गंभीर
यदि पूरे वर्ष 2025 पर नजर डालें तो तस्वीर और भी ज्यादा डराने वाली दिखती है। पूरे साल में 24,508 लोगों के गुम होने के मामले सामने आए। इसका दैनिक औसत 60 से अधिक बैठता है। इन मामलों में लगभग 14,870 महिलाएँ थीं, यानी कुल गुमशुदा लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत रही।
पुलिस ने साल भर में 15,407 लोगों को खोज निकाला, लेकिन 9,087 लोग अभी भी लापता रहे। यह आंकड़ा बताता है कि हर मामला सुलझ पाना संभव नहीं हो पा रहा। राजधानी जैसे शहर में हजारों लोगों का बिना सुराग गायब रह जाना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दस वर्षों का लंबा आंकड़ा
यदि पिछले एक दशक का रिकॉर्ड देखा जाए तो स्थिति और भी चिंताजनक नजर आती है। 2016 से 2026 के बीच कुल लगभग 2 लाख 32 हजार लोग दिल्ली से लापता हुए। इनमें से करीब 52 हजार लोगों का अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है।
नाबालिगों के मामले भी कम नहीं हैं। इसी अवधि में लगभग 60,694 बच्चे लापता हुए, जिनमें से लगभग 53 हजार बच्चों को ढूंढ लिया गया, लेकिन करीब 7 हजार बच्चे अभी भी गुमशुदा सूची में हैं। इसका मतलब यह है कि औसतन रोज़ाना 13 बच्चे दिल्ली में गायब हो रहे हैं। यह तथ्य समाज और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी जैसा है।
राजनीतिक बहस बनाम असली समस्या
जैसे ही ये आंकड़े सार्वजनिक हुए, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने लगे। लेकिन असली सवाल यह है कि यह समस्या केवल एक सरकार या एक साल की नहीं है। यह वर्षों से जारी है। हर साल कुछ लोग मिल जाते हैं, लेकिन हजारों लोग ऐसे रह जाते हैं जिनका कोई पता नहीं चलता।
इसलिए जरूरी है कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक समस्या के रूप में देखा जाए।
फिल्मों से अलग सच्चाई
जब भी किसी के लापता होने की खबर आती है, लोगों के मन में सबसे पहले अपराध से जुड़े दृश्य आते हैं-अपहरण, मानव तस्करी, गैंग या शोषण। यह सच है कि ऐसे अपराध मौजूद हैं, लेकिन हर गुमशुदगी के पीछे यही कारण हो, ऐसा जरूरी नहीं। कई बार कारण बेहद सामान्य लेकिन गंभीर होते हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं।
घर छोड़कर चले जाना – सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग खुद अपनी मर्जी से घर छोड़ देते हैं। पारिवारिक झगड़े, पढ़ाई या करियर को लेकर दबाव, प्रेम संबंधों में असहमति या आर्थिक तनाव जैसे कारण युवाओं को घर से दूर जाने पर मजबूर कर देते हैं।
कई बार किशोर या युवा अपने निर्णयों में परिवार का साथ न मिलने पर बिना बताए निकल जाते हैं। बाद में परिवार पुलिस में शिकायत दर्ज कराता है और मामला “लापता” की श्रेणी में आ जाता है। ऐसे मामलों में समय के साथ कई लोग मिल भी जाते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य – छिपा हुआ बड़ा कारण
मानसिक स्वास्थ्य आज के समय की सबसे बड़ी लेकिन सबसे कम समझी जाने वाली समस्या बनती जा रही है। चिंता, अवसाद, अकेलापन और तनाव के कारण लोग अचानक सब कुछ छोड़कर चले जाते हैं।
एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली में मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन पर आने वाले कॉल्स में लगभग 26-27 प्रतिशत लोग एंग्जायटी यानी चिंता विकार से जूझ रहे होते हैं। इनमें 41 प्रतिशत पुरुष और 51 प्रतिशत महिलाएँ होती हैं, जिनकी उम्र अधिकतर 26 से 40 वर्ष के बीच होती है।
रिश्तों में तनाव, नौकरी का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ लोगों को मानसिक रूप से कमजोर बना देती हैं। कई बार व्यक्ति अचानक गायब हो जाता है और परिवार को पता भी नहीं चलता कि वह किस मानसिक स्थिति से गुजर रहा था।
मानव तस्करी और अपराध का पहलू
हालाँकि हर मामला स्वेच्छा से घर छोड़ने का नहीं होता। मानव तस्करी, जबरन श्रम, यौन शोषण और अन्य आपराधिक गतिविधियाँ भी वास्तविक खतरे हैं। कई बार संगठित गिरोह महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाते हैं।
2024 और 2025 में भी ऐसे मामले सामने आए जहाँ तस्करी के नेटवर्क सक्रिय पाए गए। यह समस्या कम दिखाई देती है, लेकिन इसके परिणाम बेहद गंभीर होते हैं।
किडनी तस्करी जैसी अवैध गतिविधियाँ
एक और चिंताजनक पहलू अंग तस्करी का है, विशेषकर किडनी से जुड़े मामले। गरीब और मजबूर लोगों को पैसे का लालच देकर या धोखे से उनकी किडनी निकलवा ली जाती है। कई बार उन्हें सही जानकारी भी नहीं होती कि उनके साथ क्या हो रहा है।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार दुनिया भर में होने वाले किडनी प्रत्यारोपण में एक हिस्सा अवैध तरीकों से होता है। भारत में भी समय-समय पर ऐसे घोटाले सामने आते रहे हैं, जहाँ बड़ी रकम के बदले अंगों की खरीद-फरोख्त की खबरें मिलती हैं। यह गतिविधियाँ गुमशुदगी के कुछ मामलों से भी जुड़ी हो सकती हैं।
शहरी जीवन और प्रवासन
दिल्ली एक बड़ा महानगर है जहाँ लाखों लोग काम की तलाश में आते-जाते रहते हैं। कई मजदूर मौसमी काम के लिए आते हैं और फिर दूसरे शहर चले जाते हैं। परिवार से संपर्क टूट जाने पर उन्हें भी लापता मान लिया जाता है।
प्रदूषण, भीड़भाड़ और महंगे जीवन के कारण भी लोग शहर छोड़ देते हैं। संपन्न वर्ग के लोग सर्दियों में दूसरे शहरों में अस्थायी रूप से रहने लगते हैं। इन सभी कारणों से भी गुमशुदगी के आंकड़े बढ़ते दिखाई देते हैं।
प्रशासन की सक्रियता और उसका प्रभाव
न्यायालय के निर्देशों के बाद पुलिस अब गुमशुदगी के मामलों में तुरंत कार्रवाई करती है। पहले 24 घंटे का इंतजार किया जाता था, लेकिन अब शुरुआती घंटे ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इससे रिपोर्टिंग बढ़ी है क्योंकि परिवार देर न करके तुरंत पुलिस को सूचना दे देते हैं।
इस सक्रियता का एक सकारात्मक पहलू यह है कि कई लोग जल्दी मिल जाते हैं, लेकिन आंकड़ों में वृद्धि भी दिखाई देती है।
पुलिस की पहल और तकनीकी मदद
दिल्ली पुलिस ने लापता लोगों को खोजने के लिए कई अभियान चलाए हैं। “ऑपरेशन मिलाप” के तहत परिवारों को उनके बिछड़े सदस्यों से मिलाने का प्रयास किया जाता है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने भी बच्चों के लिए सूचना केंद्र स्थापित किए हैं।
ज़ोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क (ZIPNET) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए जानकारी साझा की जाती है ताकि अलग-अलग थानों में समन्वय बना रहे।
नागरिकों की भूमिका भी जरूरी
समस्या केवल प्रशासन से हल नहीं होगी। आम नागरिकों को भी जागरूक रहना होगा।
- यात्रा के दौरान सतर्क रहें
- अनजान लोगों पर जल्दी भरोसा न करें
- बच्चों और बुजुर्गों पर खास ध्यान दें
- संदिग्ध स्थिति दिखे तो तुरंत पुलिस को सूचना दें
- आपातकालीन नंबर जैसे 100, 112 और महिला हेल्पलाइन 1091 हमेशा याद रखें।
