देश की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति और रणनीति ‘PRAHAAR’ जारी, क्या ‘प्रहार’ से आतंकवाद पर और कसी जाएगी लगाम?

केंद्र सरकार ने सोमवार को देश की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी नीति और रणनीति जारी की। इस नई नीति को ‘प्रहार’ नाम दिया गया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आठ पन्नों के इस दस्तावेज में आतंकवाद के खिलाफ भारत के रुख को स्पष्ट करते हुए “जीरो टॉलरेंस” यानी किसी भी तरह की नरमी न बरतने की बात दोहराई गई है। सरकार का कहना है कि यह नीति सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे समाज की भागीदारी पर आधारित होगी।

 

आतंकवाद से दशकों की लड़ाई

नीति के शुरुआती हिस्से में कहा गया है कि भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ अग्रिम पंक्ति में खड़ा देश रहा है। दस्तावेज में यह भी लिखा है कि कुछ पड़ोसी देशों ने आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति के औजार की तरह इस्तेमाल किया है। हालांकि, भारत आतंकवाद को किसी धर्म, जाति, देश या सभ्यता से जोड़कर नहीं देखता। सरकार ने साफ किया है कि आतंकवाद को किसी भी धार्मिक या वैचारिक आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

 

‘PRAHAAR’ का क्या मतलब है?

नई नीति का आधार ‘PRAHAAR’ सिद्धांत है। यह शब्द अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बना है, जो आतंकवाद से निपटने की पूरी रणनीति को दर्शाता है।

  • Prevention (रोकथाम): आतंकी हमलों को पहले ही रोकना और भारतीय नागरिकों व हितों की सुरक्षा करना।
  • Response (प्रतिक्रिया): खतरे के मुताबिक तेज और संतुलित जवाब देना।
  • Aggregation of Capacities (क्षमताओं का एकीकरण): अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाना।
  • Human Rights and Rule of Law (मानवाधिकार और कानून): कार्रवाई कानून और मानवाधिकारों के दायरे में रहकर करना।
  • Attenuating Radicalisation (कट्टरपंथ कम करना): उन हालात को घटाना जो लोगों को कट्टर सोच की ओर ले जाते हैं।
  • Aligning International Efforts (अंतरराष्ट्रीय सहयोग): दुनिया के देशों के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ना।
  • Recovery and Resilience (पुनर्वास और मजबूती): हमले के बाद समाज को संभालना और फिर से मजबूत बनाना।

सरकार का कहना है कि यह ढांचा रोकथाम से लेकर हमले के बाद की स्थिति तक हर चरण को कवर करता है।

PRAHAAR anti terrorism policy

बदलता खतरा, नई चुनौतियां
नीति में कहा गया है कि आतंकवाद का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद अभी भी बड़ी चुनौती है। दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि विदेशी जमीन से भारत में हिंसा फैलाने की साजिशें रची जाती रही हैं। ड्रोन जैसी नई तकनीकों के जरिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर में गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिशों का जिक्र भी किया गया है।


अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों का खतरा भी बताया गया है। सरकार ने चेतावनी दी है कि आतंकी अब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, डार्क वेब और क्रिप्टो वॉलेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। साइबर हमले और CBRNED यानी रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, परमाणु, विस्फोटक और डिजिटल खतरों को भी गंभीर माना गया है।


अपराध और आतंक का गठजोड़
नीति में कहा गया है कि आतंकी संगठन अब संगठित आपराधिक गिरोहों की मदद ले रहे हैं। इन गिरोहों के जरिए लॉजिस्टिक सपोर्ट, भर्ती और फंडिंग की जाती है। सोशल मीडिया और इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग प्रचार और संपर्क के लिए किया जा रहा है। इसलिए सरकार ने वित्तीय नेटवर्क और “ओवर ग्राउंड वर्कर्स” पर सख्त कार्रवाई को रणनीति का अहम हिस्सा बताया है।


खुफिया तंत्र और तालमेल
सरकार ने कहा है कि आतंकवाद से लड़ाई खुफिया जानकारी पर आधारित होगी। मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) के जरिए रियल टाइम सूचना साझा की जाएगी। इंटेलिजेंस ब्यूरो के तहत जॉइंट टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस (JTFI) का भी जिक्र है, जो देशभर में एजेंसियों के बीच तालमेल बनाए रखने का काम करती है।


हमले की स्थिति में स्थानीय पुलिस को पहली जिम्मेदारी दी गई है। बड़े मामलों में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) को तैनात किया जाएगा, जबकि जांच का नेतृत्व राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) करेगी। गृह मंत्रालय मानक प्रक्रिया के तहत पूरे ऑपरेशन का समन्वय करेगा। नीति में यह भी कहा गया है कि NIA की सजा दर (कन्विक्शन रेट) को एक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जाता है।


सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की योजना
दस्तावेज में सीमा सुरक्षा, आधुनिक हथियारों और नई तकनीक से लैस बलों की जरूरत पर जोर दिया गया है। बिजली, रेलवे, विमानन, बंदरगाह, रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों की सुरक्षा बढ़ाने की बात कही गई है। राज्यों की एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) को भी अधिक सक्षम बनाने की योजना है।


ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट और NSG के जरिए विशेष प्रशिक्षण देने की बात भी शामिल है, ताकि सुरक्षा बल नई चुनौतियों से निपट सकें।


कानून और मानवाधिकार
सरकार ने दोहराया है कि आतंकवाद विरोधी कार्रवाई कानून और मानवाधिकारों के दायरे में होगी। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 यानी UAPA को मुख्य कानून बताया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि कानूनी प्रक्रिया के कई स्तर मौजूद हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट तक अपील की सुविधा है। भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समझौतों का भी पालन करता है।


कट्टरपंथ से निपटने पर जोर
नीति मानती है कि सिर्फ सुरक्षा कार्रवाई काफी नहीं है। युवाओं को कट्टरपंथ से दूर रखने के लिए समुदाय और धार्मिक नेताओं की भागीदारी जरूरी है। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने की भी बात कही गई है। जेलों में भी कट्टर सोच फैलने से रोकने के उपाय शामिल किए गए हैं।


अंतरराष्ट्रीय सहयोग
दस्तावेज में पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों, प्रत्यर्पण समझौतों और संयुक्त राष्ट्र में आतंकियों को सूचीबद्ध कराने जैसे प्रयासों का जिक्र है। सरकार का कहना है कि वैश्विक सहयोग के बिना आतंकवाद से प्रभावी लड़ाई संभव नहीं है।


विशेषज्ञ की टिप्पणी
देश को एक स्पष्ट सुरक्षा सिद्धांत की जरूरत थी, लेकिन नई नीति सामान्य बयान से ज्यादा नहीं लगती। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने आतंकवाद की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। उनके मुताबिक लोगों को यह जानने का हक है कि खतरा कितना बड़ा है और एजेंसियां किस तरह काम कर रही हैं।


आगे की राह
सरकार का दावा है कि ‘प्रहार’ एक संगठित और बहु-स्तरीय ढांचा तैयार करता है, जिसमें रोकथाम, कार्रवाई, कानूनी प्रक्रिया, पुनर्वास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग सब शामिल हैं। अब असली चुनौती इस नीति को जमीन पर लागू करने की है।