पत्रकार छत्रपति मर्डर केस में बड़ा मोड़: हाईकोर्ट से राम रहीम बरी, 3 दोषियों की सजा बरकरार, जानिए क्या है मामला?

करीब दो दशक पुराने पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को इस मामले में बरी कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने इस केस में दोषी ठहराए गए तीन अन्य आरोपियों-कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल-की सजा को बरकरार रखा है।

 

इससे पहले वर्ष 2019 में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम सहित चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस फैसले को चुनौती देते हुए सभी आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अब हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद राम रहीम को इस केस से मुक्त कर दिया है।

 

हाईकोर्ट ने क्यों दिया राम रहीम को राहत

फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस हत्याकांड में राम रहीम की साजिश से जुड़ी पर्याप्त और ठोस गवाही अदालत के सामने नहीं रखी जा सकी। अदालत के अनुसार, उपलब्ध सबूतों से यह साबित नहीं होता कि हत्या की साजिश में उनकी सीधी भूमिका थी।

 

हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि तीन अन्य आरोपियों के खिलाफ मौजूद गवाह और सबूत उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं। इसी आधार पर अदालत ने कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल की सजा को कायम रखा।

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परिवार ने जताई नाराजगी

फैसले के बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने अदालत के निर्णय पर निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने इस केस में पूरी मजबूती से पैरवी की और कई अहम सबूत अदालत में पेश किए थे।

 

अंशुल का कहना है कि उनके पिता की हत्या के मामले में राम रहीम को बरी करना सही नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि अब वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

 

राम रहीम के खिलाफ तीन बड़े केस

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम कई गंभीर मामलों में आरोपी रहे हैं। इनमें साध्वी यौन शोषण मामला, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और डेरा मैनेजर रणजीत सिंह हत्याकांड शामिल हैं।

 

साध्वी यौन शोषण मामले में वर्ष 2017 में अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था। इस केस में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई थी और जुर्माना भी लगाया गया था। इसी सजा के चलते राम रहीम अभी जेल में ही हैं।

 

पत्रकार छत्रपति हत्या केस में पहले उन्हें उम्रकैद की सजा हुई थी, लेकिन अब हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है। वहीं डेरा मैनेजर रणजीत सिंह हत्या मामले में भी हाईकोर्ट पहले ही उन्हें राहत दे चुका है, हालांकि सीबीआई ने उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

 

बचाव पक्ष ने क्या तर्क दिए

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राम रहीम के वकील बसंत राय ने कई तर्क रखे। उन्होंने कहा कि इस मामले में पेश किए गए सबूतों में कई सवाल खड़े होते हैं।

 

वकील ने बताया कि पत्रकार को जिस गोली से मारा गया था, वह ‘सॉफ्ट लेड’ की बनी हुई थी। उनका कहना था कि ऐसी गोलियां आमतौर पर विशेष हथियारों या सैन्य उपकरणों में इस्तेमाल होती हैं।

 

उन्होंने यह भी कहा कि घटना को लगभग 23 साल बीत चुके हैं, इसलिए गोली पर मौजूद निशान या पहचान से जुड़े संकेत अब साफ दिखाई नहीं देते।

 

गोली की जांच पर उठे सवाल

बचाव पक्ष ने अदालत में यह भी कहा कि जिस डब्बे में गोली रखी गई थी, उस पर एम्स अस्पताल की सील लगी हुई थी और फोरेंसिक विशेषज्ञों के हस्ताक्षर भी थे। अदालत में भी वह डब्बा सील बंद स्थिति में ही पेश किया गया।

 

वकील ने सवाल उठाया कि अगर डब्बे की सील कभी खोली ही नहीं गई, तो फिर फोरेंसिक लैब में उस गोली की जांच कैसे की गई। यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि विशेषज्ञों के हस्ताक्षर गोली पर थे या केवल डब्बे पर।

 

अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि गोली पर कोई स्पष्ट निशान दिखाई नहीं दे रहे हैं।

 

कोर्ट ने शिकायत पक्ष के वकील से पूछा कि फोरेंसिक विशेषज्ञों ने गोली पर हस्ताक्षर किए थे या कंटेनर पर। इस पर जवाब दिया गया कि कंटेनर पर विशेषज्ञों के हस्ताक्षर मौजूद थे, लेकिन अब गोली पर निशान साफ दिखाई नहीं देते।

 

अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों में सबूतों को पूरी तरह भरोसेमंद मानना मुश्किल है।

 

कौन थे पत्रकार रामचंद्र छत्रपति

रामचंद्र छत्रपति हरियाणा के सिरसा जिले के निवासी थे। उन्होंने वकालत का पेशा छोड़कर पत्रकारिता शुरू की थी और सिरसा से एक अखबार निकालते थे।

 

साल 2002 में उन्हें एक गुमनाम चिट्ठी मिली थी। इस पत्र में डेरा सच्चा सौदा के अंदर साध्वियों के साथ कथित यौन शोषण का जिक्र किया गया था।

 

छत्रपति ने 30 मई 2002 को इस चिट्ठी को अपने अखबार में प्रकाशित कर दिया। इसके बाद उन्हें लगातार धमकियां मिलने लगीं, लेकिन उन्होंने डेरे से जुड़े मुद्दों पर लिखना बंद नहीं किया।

 

2002 में हुई थी हत्या

19 अक्टूबर 2002 की रात रामचंद्र छत्रपति अपने घर के बाहर मौजूद थे। उसी दौरान कुछ लोगों ने उन पर गोलियां चला दीं। बताया जाता है कि उन्हें करीब पांच गोलियां लगी थीं।

 

घटना के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन 21 अक्टूबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उनकी मौत हो गई।

 

इस घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी और मामले की जांच को लेकर काफी विवाद हुआ था।

 

कैसे शुरू हुई सीबीआई जांच

शुरुआत में इस केस की जांच स्थानीय पुलिस कर रही थी, लेकिन परिवार को जांच पर भरोसा नहीं था। दिसंबर 2002 में छत्रपति के परिवार ने सरकार से मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की।

 

इसके बाद जनवरी 2003 में उनके बेटे अंशुल छत्रपति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और डेरा प्रमुख की भूमिका की जांच की मांग की।

 

10 नवंबर 2003 को हाईकोर्ट ने पत्रकार छत्रपति और रणजीत सिंह हत्याकांड को जोड़ते हुए सीबीआई को मामला दर्ज करने का आदेश दिया।

 

हालांकि कुछ समय के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जांच पर रोक लगा दी थी, लेकिन नवंबर 2004 में यह रोक हटा दी गई और सीबीआई ने दोबारा जांच शुरू की।

 

अदालतों में लंबी सुनवाई

करीब कई साल तक चली जांच और सुनवाई के बाद 11 जनवरी 2019 को सीबीआई की विशेष अदालत ने राम रहीम सहित चार आरोपियों को दोषी करार दिया।

 

इसके बाद 17 जनवरी 2019 को अदालत ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उसी फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी।

 

अब 7 मार्च 2026 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले में नया फैसला सुनाते हुए राम रहीम को बरी कर दिया है।

 

आगे क्या होगा

इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पत्रकार संगठन और कई सामाजिक कार्यकर्ता भी इस केस पर नजर बनाए हुए हैं।

 

अब छत्रपति परिवार सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में यह मामला आगे भी कानूनी बहस का विषय बना रह सकता है।