RBI की मौद्रिक नीति बैठक शुरू, ब्याज दरों में बदलाव की उम्मीद बेहद कम

भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की अहम बैठक आज 4 फरवरी से शुरू हो चुकी है, जो तीन दिनों तक चलेगी और 6 फरवरी को समाप्त होगी। इस बैठक के अंतिम दिन शुक्रवार को केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत घोषणाएँ (Policy Announcements) करेगा। वित्तीय बाजार और अर्थशास्त्री इस बैठक पर करीबी नजर रखे हुए हैं, क्योंकि इसके फैसलों का सीधा असर आम लोगों के कर्ज, होम लोन, ऑटो लोन और निवेश योजनाओं पर पड़ता है। हालांकि ज्यादातर बाजार विशेषज्ञ (Market Experts) का मानना है कि इस बार रेपो दर (Repo Rate) में किसी प्रकार का बदलाव होने की संभावना बहुत कम है।

 

रेपो दर में स्थिरता के संकेत

कई आर्थिक विश्लेषण संस्थाओं (Research Agencies) ने अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया है कि आरबीआई इस बार ब्याज दरों को यथावत (Unchanged) रख सकता है। नुवामा रिसर्च की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक फिलहाल अपनी पॉलिसी रेपो दर (Policy Repo Rate) को बिना बदलाव जारी रख सकता है और अपना रुख “तटस्थ” (Neutral Stance) ही रखेगा। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आरबीआई पहले ही उच्च स्तर से अब तक कुल 125 आधार अंक (Basis Points) की कटौती कर चुका है, जिससे रेपो दर घटकर 5.25 प्रतिशत तक आ चुकी है। ऐसे में अब केंद्रीय बैंक कुछ समय के लिए रुककर पहले से की गई कटौतियों के प्रभाव का आकलन (Assessment) करना चाहता है।

 

विश्लेषकों का कहना है कि बैंकिंग व्यवस्था में ब्याज दरों में कटौती का असर ग्राहकों तक पहुंचने में समय लगता है। अभी भी कई बैंकों की उधार दरें (Lending Rates) धीरे-धीरे कम हो रही हैं। दूसरी ओर बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) भी काफी हद तक स्थिर बनी हुई है, जिससे आरबीआई पर तुरंत दर बदलने का दबाव कम दिखाई देता है।

RBI monetary policy meeting begins

तरलता प्रबंधन पर बढ़ सकता है जोर

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि इस समय आरबीआई का मुख्य ध्यान ब्याज दरों की बजाय तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) पर हो सकता है। जब अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह संतुलित रहता है, तो बाजार में स्थिरता बनी रहती है और महंगाई (Inflation) को नियंत्रित करना आसान हो जाता है। इसलिए संभावना है कि केंद्रीय बैंक दरों में बदलाव किए बिना वित्तीय प्रणाली में नकदी की उपलब्धता और नियंत्रण पर ज्यादा ध्यान दे।

 

चालू वित्त वर्ष में कई बार कट चुकी हैं दरें

अगर पूरे वित्त वर्ष (Financial Year) पर नजर डालें तो आरबीआई पहले ही चार मौकों पर रेपो दर में कटौती कर चुका है। कुल मिलाकर 1.25 प्रतिशत की कमी की जा चुकी है। वर्ष की शुरुआत में फरवरी की बैठक में दरें 6.5 प्रतिशत से घटाकर 6.25 प्रतिशत की गई थीं। यह कटौती लगभग पांच साल बाद की गई थी, इसलिए इसका विशेष महत्व था।

 

इसके बाद अप्रैल में फिर 0.25 प्रतिशत की कमी की गई। जून की बैठक में सबसे बड़ी राहत दी गई जब आधा प्रतिशत यानी 0.50 प्रतिशत की कटौती हुई। वर्ष के अंत में दिसंबर में एक बार फिर 0.25 प्रतिशत की कमी की गई। इन चार चरणों में कुल मिलाकर 1.25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिसने कर्ज लेने वालों को बड़ी राहत दी।

 

अंतरराष्ट्रीय कारकों का भी असर

आर्थिक रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि हाल में अमेरिका और भारत के बीच हुए व्यापार समझौते (Trade Agreement) से विदेशी पूंजी प्रवाह (Foreign Capital Inflow) बढ़ सकता है। इससे भारतीय रुपये को मजबूती मिलने की संभावना है। यदि विदेशी निवेश बढ़ता है, तो आरबीआई के पास घरेलू वित्तीय हालात को संतुलित रखने के लिए ज्यादा विकल्प होंगे। यह स्थिति केंद्रीय बैंक को नीतिगत फैसले लेने में अतिरिक्त लचीलापन (Flexibility) देती है।

 

आर्थिक स्थिति अभी पूरी तरह संतुलित नहीं

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मिश्रित संकेत मिल रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में सुधार दिखाई दे रहा है, लेकिन यह सुधार अभी व्यापक (Broad-Based) नहीं है। कई उद्योग और सेवा क्षेत्र अभी भी धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर भी अनिश्चितता (Uncertainty) बनी हुई है, शेयर बाजारों में अस्थिरता (Volatility) अधिक है और भू-राजनीतिक तनाव भी असर डाल रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए आरबीआई संभवतः जल्दबाजी में कोई बड़ा कदम नहीं उठाएगा और “प्रतीक्षा-और-देखो नीति” (Wait and Watch Approach) अपनाए रखेगा।

 

केंद्रीय बैंक ब्याज दरें क्यों बदलता है?

किसी भी देश का केंद्रीय बैंक ब्याज दरों का उपयोग अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के एक शक्तिशाली साधन के रूप में करता है। जब महंगाई तेजी से बढ़ने लगती है, तो केंद्रीय बैंक नीतिगत दर (Policy Rate) बढ़ाता है। इससे बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाता है और वे अपने ग्राहकों के लिए भी लोन महंगे कर देते हैं। परिणामस्वरूप बाजार में खर्च कम होता है, मांग (Demand) घटती है और महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।

 

इसके उलट जब अर्थव्यवस्था मंदी (Recession/Slowdown) के दौर से गुजरती है, तब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है। इससे कर्ज सस्ता होता है, लोग ज्यादा खर्च और निवेश करते हैं और बाजार में आर्थिक गतिविधियाँ (Economic Activities) तेज होती हैं। यही प्रक्रिया आर्थिक विकास को गति देने में सहायक बनती है।

 

मौद्रिक नीति समिति की संरचना

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति में कुल छह सदस्य होते हैं। इनमें तीन सदस्य आरबीआई की ओर से होते हैं, जबकि तीन सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। यह समिति हर दो महीने में बैठक करती है और देश की मौद्रिक नीति से जुड़े अहम फैसले लेती है। हाल ही में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 की बैठकों का पूरा कार्यक्रम (Schedule) भी जारी किया था, जिसमें कुल छह बैठकें तय की गई हैं। वर्तमान बैठक चालू वित्त वर्ष की अंतिम बैठक मानी जा रही है, जबकि पहली बैठक 7 से 9 अप्रैल के बीच आयोजित की गई थी।

 

कुल मिलाकर इस बार बाजार की नजर इस बात पर टिकी है कि आरबीआई स्थिरता को प्राथमिकता देता है या फिर किसी अप्रत्याशित कदम (Unexpected Move) से सभी को चौंकाता है। फिलहाल संकेत यही हैं कि केंद्रीय बैंक सतर्क रुख अपनाते हुए ब्याज दरों को स्थिर रख सकता है।