गैर-जीवन और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2025 में रिकॉर्ड संख्या में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम सेटल किए। क्लेम सेटलमेंट का रेशियो बढ़ा और रिजेक्शन की दर घटी, हालांकि कैशलेस ट्रीटमेंट के बढ़ते इस्तेमाल के बीच हर क्लेम पर औसत पेमेंट कम हो गया।
क्लेम सेटलमेंट में बड़ा सुधार
इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, इंश्योरेंस कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025 में रजिस्टर हुए कुल क्लेम में से करीब 87 फीसदी यानी 3.26 करोड़ क्लेम सेटल किए, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 83 फीसदी था। रिजेक्ट किए गए क्लेम का हिस्सा करीब 11 फीसदी से घटकर 8 फीसदी रह गया। साथ ही पेंडिंग क्लेम मार्च के अंत तक 6 फीसदी से घटकर 5 फीसदी पर आ गए। इसका मतलब है कि क्लेम की प्रोसेसिंग तेज हुई और फैसलों पर नजर भी सख्त हुई।
कुल पेमेंट पिछले साल के 83,493 करोड़ रुपये से बढ़कर इस साल 94,248 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन हर क्लेम पर औसत पेमेंट 31,086 रुपये से घटकर 28,910 रुपये हो गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रिटेल और ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ी और छोटी रकम वाले क्लेम ज्यादा आए।
कैशलेस सेटलमेंट का दबदबा
कैशलेस सेटलमेंट का दबदबा बना रहा। वित्त वर्ष 2025 में कुल क्लेम अमाउंट का करीब 66.35 फीसदी कैशलेस तरीके से पेमेंट हुआ, जो 2023-24 में 66.17 फीसदी था। हॉस्पिटल में कैशलेस ट्रीटमेंट की ज्यादा रकम होने की वजह से यह हिस्सा ज्यादा रहा। रीइम्बर्समेंट क्लेम का हिस्सा एक साल पहले के 31.35 फीसदी से घटकर 29.34 फीसदी हो गया। करीब 3 फीसदी क्लेम दोनों तरीकों से मिलकर सेटल किए गए।
रेगुलेटर के प्रयास
यह सुधार इसलिए आया क्योंकि रेगुलेटर ने इंडस्ट्री को तेज और पारदर्शी सेटलमेंट की तरफ धकेला। जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने कॉमन हॉस्पिटल एंपैनलमेंट और सही रेट पर बातचीत करके कैशलेस कवरेज बढ़ाने की कोशिश की।
इसी साल IRDAI ने इंश्योरेंस कंपनियों को 100 फीसदी कैशलेस क्लेम प्रोसेसिंग की तरफ बढ़ने का आदेश दिया। इसमें टाइट टाइमलाइन दी गई – एक घंटे में प्री-ऑथराइजेशन और तीन घंटे में डिस्चार्ज अप्रूवल। रेगुलेटर ने कहा कि कोई देरी होती है तो इंश्योरेंस कंपनी को अपने शेयरहोल्डर के फंड से भरना होगा।
इसके अलावा, रेगुलेटर ने रिजेक्शन को लेकर गवर्नेंस सख्त कर दी। अब सभी रिजेक्शन को प्रोडक्ट मैनेजमेंट कमेटी या क्लेम रिव्यू कमेटी से क्लियर करवाना जरूरी है।
थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर की भूमिका
थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) ने ज्यादातर क्लेम हैंडल करना जारी रखा, हालांकि उनका शेयर थोड़ा घटा। वित्त वर्ष 2025 में करीब 69 फीसदी क्लेम TPA के जरिए सेटल हुए, जो पिछले साल 72 फीसदी थे। इन-हाउस सेटलमेंट 28 फीसदी से बढ़कर 31 फीसदी हो गया, क्योंकि इंश्योरेंस कंपनियों ने अपनी इंटरनल क्लेम कैपेबिलिटी में निवेश किया।
निष्कर्ष:
इन आंकड़ों से साफ है कि भारत में हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में अच्छे बदलाव हो रहे हैं। क्लेम सेटलमेंट बढ़ना और रिजेक्शन घटना कस्टमर्स के लिए अच्छी खबर है। रेगुलेटर की सख्त गाइडलाइन और टाइमलाइन ने इंडस्ट्री को ज्यादा जिम्मेदार और कस्टमर फ्रेंडली बनाया है।
हर क्लेम पर पेमेंट कम होना चिंता की बात नहीं है। यह दिखाता है कि इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ी है और छोटे क्लेम ज्यादा आ रहे हैं। कैशलेस सुविधा बढ़ना पॉलिसीधारकों के लिए फायदेमंद है क्योंकि इलाज के समय पैसे की टेंशन नहीं होती।
आने वाले सालों में 100 फीसदी कैशलेस प्रोसेस और तेज सेटलमेंट से हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में और सुधार की उम्मीद है।
