मिडिल ईस्ट में युद्ध संकट के बीच रूस का बड़ा फैसला: भारत को 95 लाख बैरल कच्चा तेल भेजने की तैयारी

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने दुनिया के ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ गया है और इसका असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। इसी बीच खबर सामने आई है कि रूस भारत की मदद के लिए तैयार है और जरूरत पड़ने पर अपने कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ा सकता है।


सूत्रों के अनुसार, इस समय लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल ऐसे जहाजों में मौजूद है जो भारतीय समुद्री क्षेत्र के पास हैं। यदि भारत को जरूरत पड़ती है तो ये जहाज कुछ ही हफ्तों में भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकते हैं। इससे भारतीय रिफाइनरियों को तत्काल राहत मिल सकती है।


भारत के लिए क्यों गंभीर है स्थिति
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए चिंता का कारण बन जाती है।


मौजूदा समय में भारत के पास कच्चे तेल का भंडार बहुत ज्यादा नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास इतना कच्चा तेल है जो लगभग 25 दिनों की मांग को ही पूरा कर सकता है। इसके अलावा पेट्रोल, डीजल और एलपीजी जैसे तैयार उत्पादों का भंडार भी सीमित है।


इस कारण यदि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में लंबी बाधा आती है तो भारत को जल्दी ही वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं।


सरकार ने शुरू की वैकल्पिक आपूर्ति की तलाश
सरकारी सूत्रों के अनुसार नई दिल्ली पहले से ही इस संभावना को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक आपूर्ति के रास्ते तलाश रही है। अधिकारियों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में संघर्ष लंबा खिंचता है तो आने वाले 10 से 15 दिनों में तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।


इसी कारण भारतीय रिफाइनरियां और सरकार दोनों अन्य देशों से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।


हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा खतरा
इस संकट की सबसे बड़ी वजह हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती अस्थिरता है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन रास्तों में से एक माना जाता है।


भारत के लिए इसकी अहमियत और भी ज्यादा है क्योंकि देश के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात इसी रास्ते से होकर आता है।


हाल के दिनों में इस क्षेत्र में कई जहाजों पर हमले हुए हैं। यह घटनाएं अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुईं। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए समुद्री क्षेत्र में गतिविधियां तेज कर दीं।


इन परिस्थितियों के कारण कई तेल टैंकरों के लिए यह रास्ता असुरक्षित माना जा रहा है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत की तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।

Russia oil supply to India

भारत की रिफाइनरियों की क्षमता

भारत की रिफाइनरियां हर दिन लगभग 56 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करती हैं। इतनी बड़ी मांग को पूरा करने के लिए लगातार और स्थिर आपूर्ति जरूरी होती है।

 

यदि समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की कमी का खतरा पैदा हो सकता है। यही कारण है कि भारत पहले से वैकल्पिक आपूर्ति की योजना बना रहा है।

 

रूस ने जताई मदद की इच्छा

ऊर्जा बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि रूस भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है। यदि मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति कम हो जाती है तो रूस भारत की कुल जरूरत का करीब 40 प्रतिशत तक कच्चा तेल उपलब्ध करा सकता है

 

फिलहाल भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल बेचने वाले व्यापारियों के संपर्क में हैं। हालांकि रूस से आयात बढ़ाने का अंतिम फैसला सरकार के निर्देशों पर ही निर्भर करेगा।

 

रूसी तेल आयात में हाल के बदलाव

इस साल की शुरुआत में भारत द्वारा रूस से तेल आयात कुछ कम हुआ था। जनवरी में यह घटकर लगभग 11 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। यह नवंबर 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर था।

 

उस समय भारत अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव कम करने की कोशिश कर रहा था। इसी वजह से रूस की हिस्सेदारी भारत के कुल तेल आयात में घटकर 21.2 प्रतिशत तक आ गई थी।

 

हालांकि फरवरी में स्थिति थोड़ी बदली और रूस की हिस्सेदारी फिर से बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई।

 

अमेरिका के साथ संतुलन बनाने की कोशिश

रूस से तेल खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पहले भी चर्चा होती रही है। पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाए गए कुछ टैरिफ हटाने की घोषणा की थी।

 

उस समय उन्होंने कहा था कि भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है। लेकिन भारत ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।

 

भारत का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदता है और यह फैसला पूरी तरह बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के आधार पर लिया जाता है।

 

रूसी तेल की कीमतों में बदलाव

यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस अपने कच्चे तेल को वैश्विक कीमतों से कम दाम पर बेच रहा था। इसी वजह से कई देशों के लिए यह आकर्षक विकल्प बन गया था।

 

लेकिन अब स्थिति बदल सकती है। ऊर्जा बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व की आपूर्ति कम होती है तो रूसी तेल की मांग बढ़ सकती है।

 

ऐसी स्थिति में कीमतों में मिलने वाली छूट कम हो सकती है। एक विशेषज्ञ के शब्दों में, अब बाजार खरीदारों के बजाय विक्रेताओं के पक्ष में जा सकता है

 

गैस आपूर्ति पर भी असर

सिर्फ तेल ही नहीं, प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। खबरों के अनुसार मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के कारण कतर ने अस्थायी रूप से गैस उत्पादन रोक दिया है।

 

कतर भारत को एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का बड़ा आपूर्तिकर्ता है। उत्पादन रुकने के बाद भारत में कुछ कंपनियों ने औद्योगिक ग्राहकों को गैस की आपूर्ति कम कर दी है।

 

इसी बीच रूस ने संकेत दिया है कि वह भारत को एलएनजी की आपूर्ति भी बढ़ा सकता है यदि जरूरत पड़ी।

 

भारत और चीन की तुलना

एशिया में ऊर्जा की सबसे ज्यादा खपत करने वाले दो बड़े देश चीन और भारत हैं। दोनों ही देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करते हैं।

 

लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि चीन के पास तेल का भंडार भारत की तुलना में काफी ज्यादा है। इसलिए अचानक आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत पर असर ज्यादा पड़ सकता है।

 

इसके अलावा रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका का दबाव भी भारत के लिए एक चुनौती बना रहता है।

 

अमेरिका की समुद्री सुरक्षा योजना

मौजूदा संकट के बीच अमेरिका ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ने पर उसकी नौसेना हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों को सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

 

इसके साथ ही अमेरिकी सरकार ने खाड़ी क्षेत्र में जहाजरानी के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और अन्य वित्तीय सुरक्षा उपायों की भी घोषणा की है।

 

आगे क्या हो सकता है

मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष यदि लंबे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कई देशों के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा।