मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या ईरान दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को बंद कर देगा। अब इस पर खुद ईरान की ओर से स्थिति साफ कर दी गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि फिलहाल होर्मुज जलमार्ग को बंद करने का कोई इरादा नहीं है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब एक दिन पहले अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद आशंका जताई जा रही थी कि ईरान कड़ा कदम उठा सकता है। अगर होर्मुज बंद होता, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता।

क्यों अहम है होर्मुज जलमार्ग?
होर्मुज स्ट्रेट करीब 167 किलोमीटर लंबा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। इसके दोनों मुहाने लगभग 50 किलोमीटर चौड़े हैं, जबकि सबसे संकरा हिस्सा करीब 33 किलोमीटर का है। जहाजों के लिए करीब 3 किलोमीटर चौड़ी शिपिंग लेन तय की गई है।

दुनिया के कुल पेट्रोलियम सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन करीब 1.78 से 2.08 करोड़ बैरल कच्चा तेल और ईंधन इस मार्ग से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है।
ईरान के अलावा सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश भी अपने तेल निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। खुद ईरान रोज करीब 17 लाख बैरल तेल इसी रूट से बाहर भेजता है।
भारत की बात करें तो देश अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से करीब 50% सप्लाई होर्मुज के रास्ते आती है। यही वजह है कि इस मार्ग को लेकर भारत की चिंता भी बढ़ जाती है।
अगर बंद होता तो क्या होता?
पहले जब होर्मुज बंद होने की खबरें सामने आई थीं, तब एक्सपर्ट्स का अनुमान था कि कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर तक पहुंच सकते हैं।
अगर ऐसा होता तो भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में तेज उछाल आता। अनुमान लगाया जा रहा था कि दिल्ली में पेट्रोल 105 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकता है।
लेकिन अब विदेश मंत्री के बयान के बाद विशेषज्ञ मान रहे हैं कि कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। इसके आधार पर पेट्रोल-डीजल में 4-5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।
दिल्ली में पेट्रोल फिलहाल लगभग 95 रुपये है, जो बढ़कर 100 रुपये तक जा सकता है। डीजल 88 रुपये से बढ़कर 92 रुपये तक पहुंच सकता है। अन्य शहरों में भी इसी तरह असर दिख सकता है।
हालांकि अंतिम फैसला तेल कंपनियों और सरकार की नीति पर निर्भर करेगा।
फिर भी क्यों बना हुआ है खतरा?
भले ही होर्मुज को आधिकारिक रूप से बंद न किया जाए, लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसकी तीन बड़ी वजहें हैं।
- ऑयल टैंकर पर हमले
ईरान जलमार्ग बंद किए बिना भी दबाव बना सकता है। हाल ही में पर्शियन गल्फ के मुहाने पर तीन जहाजों पर हमले की खबर आई थी। अगर ऐसे हमले बढ़ते हैं, तो शिपिंग कंपनियां उस रास्ते से गुजरने में हिचकेंगी।
इस स्थिति में रास्ता खुला रहेगा, लेकिन जहाज कम जाएंगे। इससे सप्लाई घट सकती है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
अगर अमेरिका और इजराइल के साथ तनाव लंबा चलता है, तो इस तरह के हमलों की आशंका बनी रहेगी।
- इंश्योरेंस और शिपिंग लागत
जब किसी इलाके में युद्ध जैसे हालात होते हैं, तो वहां से गुजरने वाले जहाजों के लिए ‘वॉर रिस्क इंश्योरेंस’ महंगा हो जाता है। शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त सुरक्षा और बीमा खर्च जोड़ती हैं।
यह बढ़ी हुई लागत आखिरकार कच्चे तेल की कीमत में जुड़ जाती है। यानी भले ही सप्लाई बंद न हो, लेकिन खर्च बढ़ने से दाम ऊपर जा सकते हैं।
- बाजार में डर
ग्लोबल मार्केट भविष्य की आशंकाओं पर चलता है। अगर निवेशकों को लगता है कि हालात बिगड़ सकते हैं, तो वे पहले से ही कीमतें बढ़ा देते हैं।
जब तक मिडिल ईस्ट में हालात पूरी तरह सामान्य नहीं होते, तब तक कच्चे तेल में तेजी बनी रह सकती है।
आम लोगों पर असर
पेट्रोल-डीजल
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकारी तेल कंपनियां तय करती हैं। ये कंपनियां पिछले 15 दिनों की अंतरराष्ट्रीय औसत कीमत और डॉलर-रुपये की स्थिति के आधार पर बेस प्राइस तय करती हैं।
हालांकि अंतिम कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स का बड़ा हिस्सा होता है।
यानी कंपनियां दाम बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन सरकार चाहे तो टैक्स घटाकर आम लोगों को राहत दे सकती है। युद्ध जैसे हालात में सरकार कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश भी कर सकती है।
सोना-चांदी
तनाव के समय निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर बढ़ते हैं। कमोडिटी एक्सपर्ट अजय केडिया के मुताबिक, सोना 1.60 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 1.90 लाख रुपये तक जा सकता है।
चांदी 2.67 लाख रुपये प्रति किलो से बढ़कर 3.50 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
युद्ध के समय सोने में निवेश बढ़ता है, जिससे कीमतों में तेजी आती है।
शेयर बाजार
इन्फोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मनोरंजन शर्मा के अनुसार, हालिया तनाव का असर बाजार पर दिख सकता है। बाजार गिरावट के साथ खुल सकता है और 1 से 1.5% तक की कमी आ सकती है।
ऑटोमोबाइल, बैंकिंग और FMCG सेक्टर पर दबाव रह सकता है। ऐसे समय में निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोना या सुरक्षित बॉन्ड में निवेश करते हैं।
ईरान भी क्यों नहीं चाहेगा बंद करना?
होर्मुज स्ट्रेट को बंद करना ईरान के लिए भी जोखिम भरा कदम होगा। क्योंकि अगर वह ऐसा करता है, तो उसका खुद का तेल निर्यात भी रुक जाएगा।
ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। अगर सप्लाई बाधित होती है, तो चीन के साथ उसके रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लग सकते हैं।
क्या हैं वैकल्पिक रास्ते?
सऊदी अरब के पास ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ है, जो करीब 746 मील लंबी है और रेड सी तक जाती है। इसके जरिए रोजाना लगभग 50 लाख बैरल तेल भेजा जा सकता है।
हालांकि यह पूरी तरह से होर्मुज का विकल्प नहीं है, लेकिन संकट के समय कुछ राहत दे सकता है।
भारत की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, भारत खाड़ी देशों के बाहर के सप्लायर्स से भी तेल खरीद बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर भारत अपने ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ से भी तेल निकाल सकता है।
भारत अपने नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट का भी बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से भेजता है, जिसमें बासमती चावल, चाय, मसाले और इंजीनियरिंग सामान शामिल हैं। इसलिए भारत स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
आगे क्या?
फिलहाल ईरान ने साफ किया है कि होर्मुज को बंद करने की योजना नहीं है। इससे बाजार को कुछ राहत मिली है।
लेकिन हमले, बीमा लागत और बाजार की घबराहट जैसे कारक अभी भी बने हुए हैं।

