सुप्रीम कोर्ट ने 8वीं कक्षा की एक नई सोशल साइंस किताब के एक चैप्टर पर कड़ा रुख अपनाते हुए उसके छापने और बांटने पर रोक लगा दी है। यह किताब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने जारी की थी। विवाद उस अध्याय को लेकर है, जिसमें ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ के तहत ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़ी बातें शामिल की गई थीं।
गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने न सिर्फ किताब के वितरण पर रोक लगाई, बल्कि पहले से भेजी गई प्रतियां वापस लेने और डिजिटल कॉपियां हटाने का भी आदेश दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला हल्के में नहीं लिया जाएगा और इसकी गहराई से जांच होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद लिया संज्ञान
यह मामला तब सामने आया जब एक अखबार में 24 फरवरी 2026 को इस चैप्टर को लेकर खबर छपी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने NCERT के डायरेक्टर और केंद्रीय शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही यह भी पूछा है कि सिलेबस तय करने वाली बैठकों में क्या चर्चा हुई, इस चैप्टर को लिखने वाले लेखक कौन हैं और उनकी योग्यता क्या है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि पहली नजर में यह एक सोची-समझी कोशिश लगती है, जिससे न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो NCERT के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है। अगली सुनवाई 11 मार्च को तय की गई है।

कोर्ट के चार बड़े निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम निर्देश दिए:
- केंद्र और राज्य के शिक्षा विभाग यह सुनिश्चित करें कि किताब चाहे स्कूलों में हो, गोदामों में हो या ऑनलाइन, उसे तुरंत लोगों की पहुंच से हटाया जाए।
- किताब का प्रिंट या डिजिटल वर्जन बांटना कोर्ट के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन माना जाएगा।
- सभी राज्यों के शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपें।
- रिपोर्ट मिलने के बाद कोर्ट एक कमेटी बनाएगा, जो पूरे मामले की जांच करेगी और जिम्मेदार लोगों की पहचान करेगी।
कोर्ट रूम में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) ने बिना शर्त माफी की पेशकश की। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि जो नोटिस भेजा गया, उसमें माफी का कोई जिक्र नहीं था। वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने इसे जानबूझकर किया गया कदम बताया।
चीफ जस्टिस ने कहा कि यह अदालत की जिम्मेदारी है कि वह जांच करे कि किताब में क्या छपा है और क्यों छपा है। उन्होंने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए जवाब में संबंधित प्राधिकरण ने अपने बचाव में बात कही, लेकिन असल मुद्दे पर स्पष्टता नहीं दी।
SG मेहता ने कहा कि जिन लोगों ने यह चैप्टर तैयार किया है, वे भविष्य में किसी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) या मंत्रालय के साथ काम नहीं करेंगे। इस पर CJI ने कहा कि ऐसा करने से वे बिना सजा के बच जाएंगे। उन्होंने सख्त शब्दों में कहा कि न्यायपालिका को चोट पहुंची है और इसे हल्के में नहीं लिया जाएगा।
जस्टिस बागची ने कहा कि किताब की सामग्री एकतरफा लगती है। इसमें न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में सही तरीके से पेश नहीं किया गया। कानूनी सहायता और सकारात्मक पहलुओं का भी जिक्र नहीं है।
किताब में क्या लिखा था?
NCERT ने 23 फरवरी को ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट-2’ नाम से 8वीं कक्षा की नई सोशल साइंस किताब जारी की थी। यह किताब शैक्षणिक सत्र 2026-27 से पढ़ाई जानी थी। इसी किताब के एक चैप्टर में न्यायपालिका की भूमिका के साथ-साथ भ्रष्टाचार और लंबित मामलों का जिक्र किया गया था।
किताब में लिखा था कि “Justice delayed is justice denied” यानी इंसाफ में देरी भी एक तरह की नाइंसाफी है। इसमें सुप्रीम कोर्ट में करीब 81 हजार, हाईकोर्ट्स में 62 लाख 40 हजार और जिला व अधीनस्थ अदालतों में करीब 4 करोड़ 70 लाख लंबित मामलों का जिक्र था।
किताब में यह भी बताया गया था कि जज एक आचार संहिता से बंधे होते हैं और उनके आचरण पर अंदरूनी निगरानी की व्यवस्था होती है। सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) के जरिए शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया का भी जिक्र था। 2017 से 2021 के बीच इस सिस्टम के जरिए 1,600 से ज्यादा शिकायतें मिलने की बात लिखी गई थी।
इसके अलावा, गंभीर मामलों में संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पास कर जज को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया भी समझाई गई थी। किताब में यह भी लिखा गया था कि लोग न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करते हैं, जिससे गरीब और जरूरतमंदों की न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।
CJI की आपत्ति
चीफ जस्टिस ने कहा कि चैप्टर का शीर्षक न्यायपालिका की भूमिका पर है, लेकिन उसमें भ्रष्टाचार पर ज्यादा जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अगर छात्रों को इस तरह बताया जाएगा कि न्यायपालिका में सैकड़ों शिकायतें हैं और कोई कार्रवाई नहीं होती, तो इससे पूरी संस्था पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के भाषण के कुछ अंश लेकर ऐसा दिखाया गया कि न्यायपालिका ने खुद संस्थागत भ्रष्टाचार स्वीकार किया है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की प्रस्तुति संतुलित नहीं है और इससे छात्रों के मन में गलत धारणा बन सकती है।
NCERT की सफाई और माफी
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद NCERT ने अपनी वेबसाइट से किताब हटा ली। संस्था ने बयान जारी कर कहा कि वह न्यायपालिका का सम्मान करती है और विवादित सामग्री अनजाने में शामिल हो गई।
NCERT ने कहा कि शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर किताब का वितरण रोक दिया गया है और विवादित चैप्टर को दोबारा लिखा जाएगा। संस्था ने यह भी कहा कि नई किताबों का मकसद छात्रों को संवैधानिक मूल्यों, संस्थाओं के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक भागीदारी के बारे में जानकारी देना है, न कि किसी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना।
सरकार और राजनीतिक प्रतिक्रिया
सरकारी सूत्रों ने कहा कि न्यायपालिका से जुड़े आंकड़े संसदीय अभिलेख और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड में उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें शामिल करने से पहले तथ्यों की दोबारा जांच और केंद्र से सलाह नहीं ली गई।
वहीं कांग्रेस ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पाठ्यपुस्तकों में बदलाव वैचारिक सोच से प्रेरित हैं। पार्टी नेता जयराम रमेश ने कहा कि पिछले दस साल में NCERT की किताबों में जिस तरह बदलाव हुए हैं, उनकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को सही बताया।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले को बंद नहीं करेगा। जांच के बाद एक कमेटी बनाई जाएगी, जो यह तय करेगी कि चैप्टर कैसे तैयार हुआ और किसकी जिम्मेदारी है।
यह विवाद शिक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन की बहस को भी सामने लाता है। एक ओर पाठ्यपुस्तकों में वास्तविक चुनौतियों का जिक्र जरूरी माना जाता है, तो दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि प्रस्तुति संतुलित और जिम्मेदार हो।

