AI से बने सबूतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा– ऐसे आधार पर फैसला देना गलत, बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस क्यों?

देश की सबसे बड़ी अदालत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। Supreme Court of India ने साफ कहा है कि अगर किसी अदालत का फैसला ऐसे कथित निर्णयों पर आधारित है जो असल में मौजूद ही नहीं हैं और जिन्हें AI की मदद से तैयार किया गया है, तो यह सामान्य गलती नहीं मानी जाएगी, बल्कि इसे गंभीर कदाचार समझा जाएगा।

 

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 27 फरवरी 2026 के आदेश में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की साख पर सीधा असर डालने वाले ऐसे मामलों की विस्तार से जांच जरूरी है। अदालत ने इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को इस मामले में न्यायालय की सहायता के लिए नियुक्त किया गया है। अगली सुनवाई 10 मार्च को होगी।

 

मामला क्या है?

यह विवाद एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें आंध्र प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2025 में आदेश पारित किया था। यह मामला विवादित संपत्ति से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने एक एडवोकेट-कमिश्नर नियुक्त किया था, जिसे जमीन की भौतिक स्थिति का निरीक्षण कर रिपोर्ट देनी थी।

 

याचिकाकर्ताओं ने उस रिपोर्ट पर आपत्ति जताई। ट्रायल कोर्ट ने आपत्तियों को खारिज करते हुए कुछ पुराने फैसलों का हवाला दिया। बाद में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि जिन फैसलों का जिक्र किया गया, वे असल में मौजूद ही नहीं हैं और संभव है कि वे AI टूल की मदद से तैयार किए गए हों।

 

इस आदेश को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने माना कि जिन फैसलों का जिक्र किया गया था, वे AI से तैयार सामग्री हो सकते हैं। उसने चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में सावधानी बरती जाए, लेकिन उसने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी।

 

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब सर्वोच्च अदालत ने इसे संस्थागत चिंता का विषय माना है।

Supreme Court on AI generated evidence

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

पीठ ने कहा कि यदि किसी फैसले का आधार ऐसे कथित निर्णय हैं जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं, तो यह केवल निर्णय प्रक्रिया की त्रुटि नहीं है। यह न्यायिक कर्तव्य के साथ गंभीर लापरवाही या कदाचार है।

 

अदालत ने कहा कि न्याय देने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता सर्वोपरि है। अगर AI से तैयार नकली या कृत्रिम निर्णयों पर भरोसा किया जाएगा, तो इससे पूरी न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े होंगे।

 

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि विशेष अनुमति याचिका के अंतिम निपटारे तक ट्रायल कोर्ट एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई न करे।

 

बढ़ता ट्रेंड और अदालत की चिंता

यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च अदालत ने AI के दुरुपयोग पर चिंता जताई हो। 17 फरवरी 2026 को एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि वकीलों द्वारा AI टूल की मदद से तैयार याचिकाएं दाखिल करने का चलन बढ़ रहा है।

 

उस मामले में अदालत ने पाया कि कुछ याचिकाओं में ऐसे फैसलों का हवाला दिया गया था जो वास्तविक नहीं थे, जैसे “Mercy vs Mankind” नाम का कथित निर्णय। अदालत ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई थी।

 

अब ताजा मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा AI से बने कथित निर्णयों का इस्तेमाल किए जाने पर अदालत ने और कड़ा रुख अपनाया है।

 

AI सबूत क्यों जोखिम भरे हैं?

AI तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है। इससे तस्वीरें, वीडियो और दस्तावेज तैयार करना आसान हो गया है। लेकिन यही सुविधा खतरा भी बन सकती है।

 

  1. डीपफेक का खतरा – AI की मदद से ऐसी तस्वीरें और वीडियो बनाए जा सकते हैं जो असली लगते हैं, लेकिन असल में नकली होते हैं।
  2. फर्जी दस्तावेज – AI टूल पुराने फैसलों की तरह दिखने वाले नए दस्तावेज तैयार कर सकते हैं।
  3. सत्यापन की चुनौती – आम व्यक्ति या यहां तक कि पेशेवर भी कई बार असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते।

अगर अदालतें ऐसे दस्तावेजों पर बिना जांच भरोसा करेंगी, तो न्याय प्रक्रिया की नींव कमजोर पड़ सकती है।

 

भारत में AI को लेकर नियम क्या हैं?

फिलहाल भारत में AI के लिए अलग से कोई खास कानून नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और पेशेवर आचरण से जुड़े नियम लागू होते हैं।

 

वकीलों के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के आचार नियम हैं, जिनके तहत उन्हें अदालत में केवल प्रमाणिक और सत्यापित दस्तावेज पेश करने होते हैं। लेकिन AI के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा नियम पर्याप्त हैं।

 

क्या नई गाइडलाइन आ सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस मुद्दे के कानूनी और नैतिक पहलुओं की विस्तार से जांच करेगा। माना जा रहा है कि अदालत न्यायिक प्रक्रिया में AI के उपयोग को लेकर दिशा-निर्देश तय कर सकती है।

 

संभव है कि:

  • अदालत AI आधारित सामग्री के सत्यापन को अनिवार्य करे
  • वकीलों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी हों
  • डिजिटल फॉरेंसिक जांच को जरूरी बनाया जाए
  • पेशेवर आचरण नियमों में संशोधन हो

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका भी इस मामले में अहम मानी जा रही है।

 

न्यायपालिका और तकनीक: संतुलन कैसे?

तकनीक का उपयोग पूरी तरह से गलत नहीं है। अदालतों में ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और डिजिटल रिकॉर्ड पहले से चल रहे हैं। AI का इस्तेमाल रिसर्च या दस्तावेज व्यवस्थित करने में सहायक हो सकता है।

 

लेकिन अदालत ने साफ किया है कि AI को केवल सहायक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, निर्णय का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

 

अगर AI से तैयार सामग्री को बिना जांच के सबूत मान लिया जाएगा, तो इससे गलत फैसले हो सकते हैं और निर्दोष लोगों को नुकसान पहुंच सकता है।

 

आगे क्या होगा?

10 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत इस मामले पर विस्तार से चर्चा करेगी। यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे न्याय तंत्र के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

 

कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला आने वाले समय में अदालतों में तकनीक के इस्तेमाल की दिशा तय करेगा। अगर अदालत सख्त दिशा-निर्देश जारी करती है, तो यह वकीलों और निचली अदालतों दोनों के लिए स्पष्ट संकेत होगा कि AI के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।