सुप्रीम कोर्ट ने EPF वेतन सीमा की समयबद्ध समीक्षा का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) को कर्मचारी भविष्य निधि योजना (EPFS) के तहत वेतन सीमा में संशोधन के संबंध में चार महीने के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है।

EPFO

ईपीएफ वेतन सीमा की वर्तमान स्थिति

  • कर्मचारी भविष्य निधि योजना (EPFS) भारत में कर्मचारियों के लिए एक वैधानिक सेवानिवृत्ति बचत प्रणाली है, जिसे कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के तहत संचालित किया जाता है। इस योजना में कर्मचारी और नियोक्ता दोनों मूल वेतन और महंगाई भत्ते का निर्धारित प्रतिशत हर माह जमा करते हैं। यही योगदान आगे चलकर कर्मचारी पेंशन योजना (EPS), 1995 के तहत पेंशन लाभ सुनिश्चित करता है। इस पूरी व्यवस्था में वेतन सीमा (Wage Ceiling) एक महत्वपूर्ण नियम है, क्योंकि यह तय करती है कि किस अधिकतम वेतन तक अनिवार्य रूप से ईपीएफ जमा किया जाना चाहिए। इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफ में शामिल होना स्वचालित नहीं होता।
  • ईपीएफ की वेतन सीमा को कई दशकों में बहुत कम बार संशोधित किया गया। योजना के प्रारंभिक वर्षों में सीमा केवल ₹500 प्रतिमाह थी, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाया गया। वर्ष 2001 में यह सीमा ₹6,500 हुई और सितंबर 2014 में ₹15,000 प्रतिमाह कर दी गई। 2014 के बाद पिछले 11 वर्षों में इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया, जबकि देश में महंगाई, वेतन संरचना और जीवन–यापन लागत लगातार बढ़ती रही। इस लंबे अंतराल ने मौजूदा सीमा को आज के आर्थिक स्तर की तुलना में काफी कम प्रभावी बना दिया है।
  • प्रारंभिक 2026 तक ईपीएफ की अनिवार्य वेतन सीमा अभी भी ₹15,000 प्रतिमाह बनी हुई है। जो कर्मचारी इस सीमा से अधिक मूल वेतन प्राप्त करते हैं, उन्हें स्वतः ईपीएफ या ईपीएस के तहत कवर नहीं किया जाता। वे केवल स्वैच्छिक विकल्प के माध्यम से शामिल हो सकते हैं। यह स्थिति उन लाखों कर्मचारियों को प्रभावित करती है, जिनकी आय ₹15,000 से अधिक है लेकिन वे उच्च–मध्य वर्ग के वेतन स्तर तक नहीं पहुँचते। इस कारण यह वर्ग अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज से बाहर रह जाता है।
  • 2014 से वेतन सीमा में संशोधन न होने से कई व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव सामने आए हैं। औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत बड़ी संख्या में कर्मचारी, जिनका मूल वेतन ₹15,000 से कुछ अधिक होता है, अनिवार्य सेवानिवृत्ति बचत के दायरे से बाहर हो जाते हैं। इससे उनकी दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा कमजोर होती है और पेंशन लाभ सीमित हो जाते हैं। महंगाई बढ़ने से ₹15,000 की वर्तमान क्रय शक्ति पहले जैसी नहीं रही, जिससे इस सीमा की व्यावहारिक प्रासंगिकता काफी घट गई है। नतीजतन, भविष्य निधि का कवरेज घटा है जबकि औपचारिक रोजगार बढ़ा है।

 

EPF वेतन सीमा की पुनःसमीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

  • जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने Employees’ Provident Fund Scheme (EPFS) की वेज सीलिंग पर एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने इससे संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की, जिसमें यह दावा किया गया था कि पुरानी सीमा आज की आर्थिक परिस्थितियों से मेल नहीं खाती और कामगारों का बड़ा हिस्सा इसके कारण सामाजिक सुरक्षा से वंचित हो रहा है। कोर्ट ने माना कि लंबे समय से रुकी यह समीक्षा श्रमिक कल्याण पर प्रतिकूल असर डाल रही है।
  • याचिका अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी, जो नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर जाने की अनुमति देता है। याचिकाकर्ता डॉ. नवीन प्रकाश नौटियाल ने तर्क दिया कि वेज सीलिंग में बदलाव न होना अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के जीवन एवं गरिमा के अधिकार का हनन है। उनका कहना था कि स्थिर वेज लिमिट के कारण ऐसे लाखों कर्मचारी EPF और EPS जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से दूर रह गए हैं, जिनका उद्देश्य ही श्रम बाजार में सुरक्षा प्रदान करना है। 
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 2014 से वेज सीलिंग में कोई बदलाव न होना बदलते आर्थिक परिदृश्य में तर्कसंगत नहीं है। कोर्ट ने उल्लेख किया कि इस स्थिर सीमा के कारण संगठित क्षेत्र में काम करने वाले कई कर्मचारी EPF और EPS की अनिवार्य कवरेज से बाहर रह गए हैं। न्यायाधीशों ने जोर दिया कि सरकार और EPFO को यह देखना चाहिए कि वर्तमान वेतन संरचना, महंगाई, और मजदूरी वृद्धि के अनुसार नई सीमा क्या होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि सामाजिक सुरक्षा हर कर्मचारी का अधिकार है, और नीति की स्थिरता कार्यबल के हितों को प्रभावित नहीं कर सकती।
  • अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर अपनी नई प्रतिनिधि-याचिका केंद्र सरकार को सौंपें। साथ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति भी भेजी जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार इस प्रतिनिधित्व को औपचारिक रूप से स्वीकार करे और सभी पहलुओं पर विचार करते हुए निर्णय ले। 
  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और EPFO को आदेश दिया कि वेज सीलिंग की समीक्षा पर निर्णय चार महीने के भीतर अवश्य लिया जाए। यह समयसीमा तय और बाध्यकारी है। कोर्ट ने कहा कि बिना समय सीमा के निर्णय टलते रहते हैं, जिससे कर्मचारियों को लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। 

 

EPF वेतन सीमा परिवर्तन पर पूर्व सिफारिशें

  • वर्ष 2022 में EPFO ने कवरेज बढ़ाने और लंबित मुकदमों को सुव्यवस्थित करने के लिए एक विशेष उप-समिति का गठन किया। इस समिति ने वेज सीलिंग के प्रभाव का विस्तार से अध्ययन किया और पाया कि सीमित कवरेज के कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि कवरेज थ्रेशोल्ड को घटाया जाए और संशोधित वेतन सीमा तक के सभी कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से EPF और EPS में शामिल किया जाए। समिति की रिपोर्ट को जुलाई 2022 में EPF केंद्रीय बोर्ड ने औपचारिक स्वीकृति दी। इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने अब तक इन सिफारिशों पर कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया। 
  • 16वीं लोकसभा की लोक लेखा समिति ने भी वेज सीलिंग से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की। समिति ने पाया कि EPFS की वेतन सीमा वर्षों में अनियमित रूप से संशोधित होती रही है और किसी निश्चित आर्थिक सूत्र से नहीं जुड़ी रही। PAC ने उल्लेख किया कि महंगाई दर, न्यूनतम मजदूरी या मजदूरी वृद्धि के साथ वेज सीलिंग को जोड़ने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनाई गई। समिति ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को नियत अवधि वाली समीक्षा प्रणाली अपनानी चाहिए, जिसमें हर कुछ वर्षों में वेतन सीमा का पुनर्मूल्यांकन अनिवार्य हो। 
  • पिछले कुछ वर्षों में श्रम मंत्रालय ने भी वेज सीलिंग बढ़ाने को लेकर कई आंतरिक प्रस्ताव तैयार किए। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान यह चर्चा तेज हुई कि वेतन सीमा को ₹21,000 प्रति माह तक बढ़ाया जा सकता है। मंत्रालय का तर्क था कि वेज सीलिंग बढ़ने से कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति निधि मजबूत होगी और EPS-95 के तहत पेंशन राशि में भी वृद्धि होगी। मंत्रालय के आकलन के अनुसार, वेज सीमा में इस संभावित बढ़ोतरी से 1 करोड़ से अधिक नए कर्मचारियों को अनिवार्य EPF और EPS कवरेज के दायरे में लाना संभव हो जाता। इससे संगठित क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा की पहुंच काफी विस्तृत हो जाती।

 

EPF वेतन सीमा संशोधन की चुनौतियाँ

  • EPF वेज सीलिंग को समय-समय पर संशोधित करने के लिए देश में कोई औपचारिक और निश्चित तंत्र मौजूद नहीं है। वर्तमान कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो वेतन सीमा की समीक्षा को महंगाई, न्यूनतम मजदूरी, या अन्य आर्थिक सूचकांकों से जोड़ सके। वेज सीलिंग में बदलाव लंबे अंतरालों के बाद किए गए हैं, और कई बार यह अंतराल 10 से 12 वर्ष तक रहा है। इस असंगत पद्धति के कारण वेतन सीमा वास्तविक मजदूरी वृद्धि और बढ़ती जीवन-यापन लागत के अनुरूप नहीं बढ़ पाई, जिससे बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रह गए।
  • वेज सीलिंग में संशोधन होने पर नियोक्ताओं पर वित्तीय भार बढ़ सकता है। या सीमा बढ़ने से अधिक कर्मचारियों के लिए नियोक्ताओं को EPF और EPS योगदान बढ़ाना होगा। बड़े उद्योग इन लागतों को संभाल सकते हैं, लेकिन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण कदम बन सकता है। आर्थिक अनिश्चितता और प्रतिस्पर्धी बाजार स्थितियों में कई छोटे नियोक्ता इन अतिरिक्त योगदानों को वहन करने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। इससे रोजगार सृजन और उद्योगों की स्थिरता पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
  • भारत की श्रम संरचना अत्यंत विविध है। इसमें संगठित क्षेत्र के नियमित कर्मचारी, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, गिग वर्कर्स, संविदा कर्मचारी और कई अस्थायी रोजगार मॉडल शामिल हैं। वेज सीलिंग के संशोधन से अनिवार्य कवरेज का दायरा काफी बढ़ जाएगा, जिससे क्रियान्वयन और निगरानी की चुनौती बढ़ेगी। विभिन्न रोजगार श्रेणियों में EPF अनुपालन सुनिश्चित करना अपने आप में एक जटिल कार्य है। इस व्यापक कवरेज को व्यवहारिक रूप देने के लिए EPFO को डिजिटल बुनियादी ढांचे और प्रवर्तन क्षमता को भी मजबूत करना होगा।

 

आइए जानते हैं कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के बारे में 

    • कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) देश के वेतनभोगी वर्ग के लिए सबसे व्यापक और विश्वसनीय सामाजिक सुरक्षा संस्थान है। 
    • यह संगठन पूरी तरह भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को वृद्धावस्था में वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने का प्रमुख माध्यम है। 
    • EPFO की स्थापना 1952 में कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य श्रमिकों के दीर्घकालिक बचत तंत्र को मजबूत करना और उनकी आय का एक संरक्षित हिस्सा सुरक्षित भविष्य के लिए संचित करना है।
    • EPFO का संचालन एक त्रिपक्षीय ढाँचे पर आधारित है, जिसमें सरकार, नियोक्ता और कर्मचारी, तीनों समान रूप से भागीदार होते हैं। 
    • यह संस्था और अधिनियम उन प्रतिष्ठानों पर लागू होती है जहाँ 20 या अधिक कर्मचारी कार्यरत हों। वर्तमान नियमों के अनुसार, ₹15,000 प्रति माह तक वेतन पाने वाले कर्मचारी अनिवार्य रूप से EPF के अंतर्गत आते हैं, जबकि इससे अधिक वेतन वाले कर्मचारी नियोक्ता की सहमति से स्वैच्छिक रूप से जुड़ सकते हैं। 
    • वर्ष 2025 तक EPFO के 30 करोड़ से अधिक सदस्य इसके विभिन्न प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं। EPFO का प्रबंधन केंद्रीय न्यासी मंडल (CBT) द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय श्रम मंत्री करते हैं।
    • EPFO भारत के औपचारिक क्षेत्र के लिए वृद्धावस्था सुरक्षा का मुख्य स्तंभ है। यह संगठन नियमित बचत को प्रोत्साहित करता है, जिससे कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद स्थिर आय उपलब्ध हो सके। 

 

EPFO द्वारा संचालित प्रमुख योजनाएँ:

  • कर्मचारी भविष्य निधि योजना (EPFS), 1952 – इस योजना के तहत कर्मचारी और नियोक्ता दोनों मासिक अंशदान करते हैं, जो सेवानिवृत्ति के समय एकत्र होकर कर्मचारी को एकमुश्त राशि के रूप में प्राप्त होता है।
  • कर्मचारी पेंशन योजना (EPS), 1995 – यह योजना सेवानिवृत्ति के बाद मासिक पेंशन देती है। कर्मचारी की मृत्यु होने पर परिवार को पेंशन लाभ मिलता है।
  • कर्मचारी जमा-लिंक बीमा योजना (EDLI), 1976 – EPF सदस्य के लिए बीमा सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे मृत्यु की स्थिति में परिवार को वित्तीय सहायता मिलती है।

 

आगे की राह 

वेज सीलिंग में संशोधन एक संवेदनशील आर्थिक और सामाजिक निर्णय है, जिसे केवल सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि बहु-हितधारक संवाद के माध्यम से ही अंतिम रूप दिया जा सकता है। इसमें श्रमिक संगठनों, नियोक्ता संघों, उद्योग चैंबर्स, राज्य सरकारों और विशेषज्ञ समितियों की भागीदारी आवश्यक है। सरकार को एक ऐसा समाधान तलाशना होगा जो कर्मचारियों की दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करे और साथ ही उद्योगों की व्यापारिक व्यवहार्यता को भी संतुलित रखे। नियोक्ता संगठनों की यह मांग भी विचारणीय हो सकती है कि संशोधन को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए ताकि लागत का दबाव अचानक न बढ़े। कुछ उद्योगों में अस्थायी रियायतें या विशेष प्रावधान भी विकल्प के रूप में सामने आ सकते हैं।