अमेरिका की राजनीति, न्यायपालिका और वैश्विक व्यापार-तीनों के बीच शुक्रवार को ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए व्यापक ग्लोबल टैरिफ को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट का साफ कहना था कि संविधान के अनुसार टैक्स और टैरिफ तय करने की शक्ति कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
लेकिन फैसले के महज तीन घंटे के भीतर ट्रम्प ने एक नया आदेश जारी कर दुनिया के सभी देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया। यह नया टैरिफ 24 फरवरी से लागू होगा। इस तेजी से लिए गए फैसले ने कानूनी बहस को और गहरा कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं। इनमें से 6 जजों ने बहुमत से फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति को एकतरफा तरीके से वैश्विक स्तर पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है, इसलिए आपात शक्तियों का इतना व्यापक उपयोग उचित नहीं माना जा सकता।
फैसले से असहमत तीन जज-सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ-ने अलग राय रखी। जस्टिस कैवनॉ ने कहा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन कानूनी रूप से इसे वैध माना जा सकता था। उन्होंने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर लगाए गए टैरिफ का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसे कदम कभी-कभी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े होते हैं।
ट्रम्प की तीखी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रम्प ने खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने इसे “बहुत निराशाजनक” बताया और कहा कि कुछ जजों में देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वे राष्ट्रपति को मिले अधिकारों के तहत टैरिफ लागू कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत नहीं है।
ट्रम्प ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार पहले वसूले गए टैरिफ की रकम कंपनियों को वापस नहीं करेगी। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने रिफंड पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है।

सेक्शन 122 का सहारा
पहले जिन टैरिफ को कोर्ट ने रद्द किया था, वे 1977 के “इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट” (IEEPA) के तहत लगाए गए थे। अदालत ने इसी कानूनी आधार पर सवाल उठाए थे।
अब ट्रम्प ने 1974 के “ट्रेड एक्ट” के सेक्शन 122 का सहारा लिया है। इस प्रावधान के तहत यदि अमेरिका को अचानक व्यापार घाटा या आर्थिक संकट का खतरा हो, तो राष्ट्रपति अस्थायी तौर पर आयात पर टैरिफ लगा सकते हैं। यह टैरिफ आमतौर पर 150 दिनों तक लागू रह सकता है, जिसके बाद सरकार समीक्षा करती है।
रिपोर्टों के अनुसार, सेक्शन 122 का पहले कभी इस्तेमाल नहीं हुआ था। इसलिए यह भी साफ नहीं है कि यदि इसे फिर अदालत में चुनौती दी गई तो न्यायपालिका इसका कैसे आकलन करेगी।
नया 10% ग्लोबल टैरिफ क्या है?
ट्रम्प के नए आदेश के तहत दुनिया के लगभग सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर 10% का एक समान टैरिफ लगाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि जिन देशों पर पहले ज्यादा दर से टैरिफ लगाया गया था, उनकी दर घटकर 10% रह जाएगी।
कुछ उत्पादों को इस टैरिफ से छूट दी गई है। इनमें कुछ कृषि उत्पाद जैसे बीफ, टमाटर और संतरा शामिल हैं। इसके अलावा जरूरी खनिज, दवाइयां, कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान और यात्री वाहन भी छूट की सूची में हैं।
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि यह कदम अमेरिका के उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए जरूरी है।
कौन से टैरिफ रद्द हुए?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सभी टैरिफ खत्म नहीं हुए। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए टैरिफ अलग कानूनों के तहत लागू थे, इसलिए वे अभी भी जारी हैं।
हालांकि दो बड़े वर्ग के टैरिफ पर रोक लगी:
- रेसिप्रोकल टैरिफ-जिनमें चीन पर 34% और बाकी दुनिया के लिए 10% बेसलाइन टैरिफ शामिल थे।
- 25% टैरिफ-जो कनाडा, चीन और मैक्सिको से आने वाले कुछ उत्पादों पर लगाए गए थे, खासकर फेंटेनाइल तस्करी को लेकर।
इन टैरिफ को कोर्ट ने अमान्य कर दिया।
200 अरब डॉलर और रिफंड की दुविधा
रिपोर्टों के अनुसार, पिछले साल की शुरुआत से ट्रम्प प्रशासन 200 अरब डॉलर से अधिक का टैरिफ वसूल चुका है। अब यह बड़ा सवाल है कि यदि अदालतें अंतिम रूप से टैरिफ को अवैध ठहराती हैं, तो क्या सरकार को यह रकम कंपनियों को लौटानी पड़ेगी?
ट्रम्प ने कहा है कि सरकार किसी भी कंपनी को टैरिफ के रूप में वसूला गया पैसा वापस नहीं करेगी। लेकिन यदि अदालत रिफंड का आदेश देती है, तो अमेरिका को भारी वित्तीय बोझ झेलना पड़ सकता है।
12 राज्यों की चुनौती
ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ अमेरिका के 12 राज्यों-एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू मेक्सिको, न्यूयॉर्क, ओरेगन और वर्मोंट-ने छोटे कारोबारियों के साथ मिलकर मुकदमा दायर किया था। उनका आरोप था कि राष्ट्रपति ने अपनी संवैधानिक सीमा से बाहर जाकर आयात पर नए टैरिफ लगाए।
निचली अदालतों ने भी पहले टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी प्रक्रिया का अंतिम चरण था।
भारत पर क्या असर?
ट्रम्प ने साफ कहा है कि भारत के साथ होने वाले व्यापार समझौते पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना “अच्छा दोस्त” बताया और कहा कि डील पहले की तरह आगे बढ़ेगी।
रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिटेन, भारत और यूरोपीय संघ जैसे देशों को अब 10% ग्लोबल टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। इसका मतलब यह हो सकता है कि भारत पर पहले तय 18% की दर घटकर 10% रह जाए।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह 10% पहले की दर में समायोजित होगा या अलग से जोड़ा जाएगा।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्या असर?
ट्रम्प ने साफ कहा है कि भारत के साथ होने वाले व्यापार समझौते में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता पहले की तरह आगे बढ़ेगा।
भारत और अमेरिका के बीच एक “अंतरिम व्यापार समझौता” फरवरी के अंत तक अंतिम रूप ले सकता है। मार्च में इस पर हस्ताक्षर होने की संभावना है और अप्रैल से इसके लागू होने की उम्मीद जताई जा रही है।
23 फरवरी से दोनों देशों के अधिकारी अमेरिका में तीन दिनों की अहम बैठक करेंगे। इस बैठक का मकसद 7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान के आधार पर कानूनी ड्राफ्ट को अंतिम रूप देना है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य मंत्रालय के मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन करेंगे।
रिपोर्टों के अनुसार, टैक्स दर को 25% से घटाकर 18% करने की दिशा में बातचीत चल रही है। अब यदि 10% का नया ग्लोबल टैरिफ लागू होता है, तो यह देखना होगा कि भारत पर कुल प्रभाव क्या पड़ेगा। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, जिन देशों ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते किए हैं, उन पर अब 10% की समान दर लागू होगी। इसका मतलब यह हो सकता है कि भारत पर कुल टैरिफ 18% से घटकर 10% रह जाए।
हालांकि इस बात पर अभी स्पष्टता नहीं है कि नया 10% टैरिफ पहले तय दर में समायोजित होगा या अलग से लागू किया जाएगा।
किन भारतीय क्षेत्रों को फायदा हो सकता है?
यदि कुल टैरिफ दर घटती है, तो भारत के कुछ प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है। इनमें शामिल हैं:
- कपड़ा उद्योग
- चमड़ा और जूता उद्योग
- रत्न और आभूषण क्षेत्र
- कुछ कृषि उत्पाद
इन क्षेत्रों के लिए अमेरिका एक बड़ा बाजार है। टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में सस्ते हो सकते हैं, जिससे निर्यात बढ़ने की संभावना है।
वैश्विक बाजार पर असर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद ट्रम्प के नए टैरिफ ने बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है।
यदि टैरिफ हटते हैं तो आयातित सामान सस्ता हो सकता है, जिससे उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। इससे शेयर बाजारों में तेजी आ सकती है।
लेकिन नए 10% टैरिफ के कारण फिर अनिश्चितता बढ़ सकती है। कंपनियों को यह समझने में समय लगेगा कि आगे की कानूनी स्थिति क्या होगी। यदि सेक्शन 122 के तहत लगाए गए टैरिफ को भी अदालत में चुनौती दी जाती है, तो मामला फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया में जा सकता है।
IEEPA और कानूनी बहस
ट्रम्प ने पहले जो टैरिफ लगाए थे, वे 1977 के “इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट” (IEEPA) के तहत थे। इस कानून का मकसद था कि यदि देश को किसी बड़े विदेशी खतरे या असाधारण संकट का सामना करना पड़े, तो राष्ट्रपति तुरंत आर्थिक कदम उठा सकें।
IEEPA का 80 से ज्यादा बार इस्तेमाल किया जा चुका है, लेकिन टैरिफ लगाने के लिए इसका उपयोग पहली बार ट्रम्प ने किया। अदालत ने सवाल उठाया कि इस कानून में “टैरिफ” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा भी तय नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपात शक्तियों का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की मंजूरी के व्यापक टैक्स लगा दें।
इतिहास से तुलना: निक्सन का फैसला
साल 1971 में अमेरिका गंभीर व्यापार असंतुलन से जूझ रहा था। उस समय राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भी 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाया था। उस दौर में डॉलर पर दबाव था और अमेरिका आयात ज्यादा कर रहा था।
बाद में 1974 में ट्रेड एक्ट पारित किया गया ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति आने पर राष्ट्रपति के पास कानूनी साधन हों। अब ट्रम्प उसी कानून के सेक्शन 122 का उपयोग कर रहे हैं।
लेकिन अंतर यह है कि उस समय आर्थिक संकट स्पष्ट था, जबकि अब अदालत इस बात पर सवाल उठा रही है कि क्या मौजूदा स्थिति को आपात स्थिति कहा जा सकता है।
क्या कानूनी लड़ाई खत्म हुई?
नहीं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सेक्शन 122 के तहत लगाए गए नए टैरिफ को भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
यदि ऐसा होता है, तो मामला फिर निचली अदालतों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति और न्यायपालिका में चर्चा का विषय बना रहेगा।
आगे क्या हो सकता है?
- कानूनी चुनौती – नए टैरिफ को अदालत में चुनौती मिल सकती है।
- व्यापार वार्ता तेज – अमेरिका अपने व्यापारिक साझेदारों से जल्दी समझौते करने की कोशिश कर सकता है।
- बाजार में उतार-चढ़ाव – शेयर बाजार और मुद्रा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
- भारत के लिए अवसर – यदि टैरिफ दर घटती है, तो भारत के निर्यातकों को बड़ा फायदा मिल सकता है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके तुरंत बाद ट्रम्प द्वारा 10% ग्लोबल टैरिफ लागू करने का कदम अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति और न्यायपालिका के बीच टकराव को दिखाता है। यह केवल कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार, निवेश और देशों के आपसी संबंधों से जुड़ा मामला है।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। यदि व्यापार समझौता तय समय पर होता है और टैरिफ दर कम रहती है, तो भारतीय निर्यातकों को लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि कानूनी लड़ाई लंबी चलती है, तो अनिश्चितता बनी रह सकती है।

